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क्यों अटका है चुनाव सुधार PDF Print E-mail
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Tuesday, 11 February 2014 11:36

धर्मेंद्रपाल सिंह

जनसत्ता 11 फरवरी, 2014 : आम चुनाव सिर पर आते ही चुनाव सुधार का दिखावा फिर शुरू हो गया है।

पेड न्यूज (पैसे लेकर किसी प्रत्याशी के पक्ष में खबर छापने), स्टेट फंडिंग (सरकार द्वारा चुनाव खर्च उठाने), उम्मीदवारों द्वारा झूठे शपथपत्र दाखिल करने, चुनाव खर्च कम बताने, अदालत में आरोपित हो चुके व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने जैसे मुद्दों पर आम सहमति बनाने का प्रयास किया जा रहा है। पिछले ढाई दशक से चुनाव सुधार की कोशिश हो रही है लेकिन नतीजा टांय-टांय फिस्स रहा है। चुनाव सुधार विधेयक पिछले दो दशक से संसद की मंजूरी की बाट जोह रहा है। हर बार कुछ न कुछ बहाना बना कर उसे टाल दिया जाता है। नतीजा सामने है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की चुनाव व्यवस्था निरंतर बाहुबल और धन-बल के दलदल में धंसती चली जा रही है। इस दुखद स्थिति के लिए कमोबेश सभी बड़े दल दोषी हैं।

 

चुनाव सुधार के लिए उच्चतम न्यायालय में दायर जन-हित याचिका पर आगामी अप्रैल माह में सुनवाई होनी है। सुनवाई से पहले विधि आयोग को अदालत में अपनी सिफारिश दाखिल करनी है। यहां यह बताना जरूरी है कि चुनाव व्यवस्था में सुधार या संशोधन की जिम्मेदारी कानून मंत्रालय की होती है। वही चुनाव संचालन नियम, 1961 और जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में फेरबदल की पहल कर सकता है। विधि आयोग और चुनाव आयोग केवल सुझाव दे सकते हैं। उनकी सिफारिश मानना, न मानना सरकार पर निर्भर है।

निर्वाचन आयोग के साथ हुई बैठक में राजनीतिक दलों ने चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाने की मांग की है। फिलहाल लोकसभा उम्मीदवार के लिए चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा चालीस लाख रुपए और बड़े राज्यों में विधानसभा उम्मीदवार के लिए चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा सोलह लाख रुपए है। यह दिलचस्प है कि निन्यानबे फीसद प्रत्याशी चुनाव आयोग को दिए ब्योरों में अपना खर्च तय सीमा से आधा दिखाते हैं। ऐसे में सवाल है कि जब खर्च आधा भी नहीं होता तो उसकी अधिकतम सीमा बढ़ाने की मांग क्यों की जा रही है? आज यह बात सबको पता है कि बड़े दलों के प्रत्याशी अपने चुनाव पर लाखों नहीं करोड़ों रुपए खर्च करते हैं। कुछ नेता तो इस बात को सार्वजनिक मंच से भी स्वीकार कर चुके हैं।

पिछले साल कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और सांसद वीरेंद्र सिंह ने बयान दिया कि राज्यसभा की सीट सौ करोड़ रुपयों में खरीदी जा सकती है और रेलमंत्री का पद दान में मिलता है। बवाल मचने पर भले ही वे बाद में अपने बयान से मुकर गए, लेकिन पैसा लेकर टिकट देने का किस्सा अक्सर सामने आता रहता है। राजस्थान की राज्यपाल मार्गरेट अल्वा ने 2008 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों में पार्टी टिकट बेचे जाने का आरोप लगाया था। तब कांग्रेस में हंगामा तो हुआ लेकिन अल्वा के आरोप की जांच कराने का साहस पार्टी नहीं जुटा पाई।

कांग्रेस ही नहीं मुख्य, विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के नेता भी सार्वजनिक मंच से चुनावों में अपराधियों और पैसे के बढ़ते प्रभाव को मानते हैं। कुछ दिन पहले महाराष्ट्र भाजपा के कद्दावर नेता गोपीनाथ मुंडे ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपने चुनाव में निर्वाचन आयोग की तय सीमा का उल्लंघन कर दस करोड़ रुपए खर्च किए थे। मुंडे ने ऐसा सच बोला था जिसे जानते तो सब नेता हैं, लेकिन कहने का साहस कोई-कोई ही जुटा पाता है।

चुनाव में काले धन का खुल कर इस्तेमाल होता है। नंबर दो का पैसा कॉरपोरेट और अपराध जगत से मिलता है। इसी वजह से राजनीतिक दल और नेता अपने चंदे का स्रोत बताने को राजी नहीं हैं। पिछले साल मुख्य चुनाव आयुक्त ने सभी राष्ट्रीय दलों को सूचनाधिकार कानून के तहत लाने का फैसला सुनाया था, जिस पर आज तक अमल नहीं हो पाया है।

इस आदेश को निष्प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने एक संशोधन प्रस्ताव पेश किया जो अब संसद के विचाराधीन है। चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने में अधिकतर दलों की कोई रुचि नहीं है। ज्यादातर पार्टियां और नेता काले पैसे के बूते ही चुनाव लड़ते और जीतते हैं। उन्होंने मौजूदा कानून से बचने के रास्ते भी खोज रखे हैं।

चुनाव व्यवस्था में सुधार को लेकर राजनीतिक दल कितने गंभीर हैं इसका एक और प्रमाण है। विधि आयोग ने एक बरस पहले सभी पार्टियों से चुनाव प्रणाली में सुधार के सुझाव मांगे थे। अब तक केवल कांग्रेस और आठ सांसदों ने जवाब भेजा है। सुधार के लिए सबसे पहले 1990 में गोस्वामी समिति गठित की गई थी। इसके बाद 1993 में वोहरा समिति और 1998 में इंद्रजीत गुप्त समिति ने चुनाव व्यवस्था में सुधार के लिए महत्त्वपूर्ण सिफारिशें की। विधि और चुनाव आयोग भी समय-समय पर कारगर सुझाव देते रहे हैं। ये सभी रिपोर्टें और समस्त सुझाव बरसों से सरकारी फाइलों में धूल फांक रहे हैं।

अदालत से सजा प्राप्त जनप्रतिनिधियों की संसद और विधानसभा की सदस्यता समाप्त करने और उन्हें चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने का कानून भी सर्वोच्च न्यायालय की कृपा से बना है। सरकार ने तो इस कानून में फच्चर फंसाने की पूरी तैयारी कर ली थी, पर प्रबल जन-विरोध देख कर उसे अपना कदम पीछे लेना पड़ा।

हमारे देश के सांसदों की माली हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज दोनों सदनों


के सांसदों की घोषित संपत्ति दस हजार करोड़ रुपए (एक खरब) से अधिक है। चुनाव आयोग के अनुसार, वर्तमान लोकसभा के पांच सौ तैंतालीस में से तीन सौ पचास सांसद करोड़पति हैं और अठारह अरबपति। यहां हम सांसदों की घोषित संपत्ति की बात कर रहे हैं जबकि आरोप तो यह लगता है कि अधिकतर सांसदों के पास घोषित से अधिक अघोषित संपत्ति है।

सांसदों के वैभव के इस आंकड़े के साथ देश की दो तिहाई से ज्यादा आबादी का सच बताना भी जरूरी है। भारत सरकार द्वारा गठित एक आयोग के अनुसार, देश की अठहत्तर प्रतिशत आबादी की आमदनी बीस रुपए प्रतिदिन से भी कम है। जब ज्यादातर कानून निर्माता धनशालीहों और जनता वंचित, तब जनहित में कानून बनाने की कल्पना करना मुंगेरीलाल के हसीन सपनों जैसा होगा।

अब राजनीति सेवा नहीं, पैसा कमाने और प्रभाव बढ़ाने का जरिया बन गई है। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के अध्ययन निरंतर इसका खुलासा करते हैं। 2004 से अब तक संसद और विधानसभा के चुनावों में खड़े हुए प्रत्याशियों की घोषित औसत संपत्ति 1.37 करोड़ रुपए आंकी गई है। चुनावों में जीतने वाले उम्मीदवारों की औसत संपत्ति तो और भी अधिक (3.83 करोड़ रुपए) है। चुनाव जीतने वाले, आपराधिक आरोपों से घिरे उम्मीदवार ज्यादा संपन्न हैं। ऐसे सांसदों और विधायकों की औसत संपत्ति 4.30 करोड़ रुपए है। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान लोकसभा के 162 (तीस प्रतिशत) सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं जबकि पांच साल पहले यह संख्या चौबीस प्रतिशत थी।

चुनावों में दागियों के जीतने की संभावना भी ज्यादा होती है। तथ्य गवाह है कि जिन प्रतिनिधियों के खिलाफ मामले दर्ज हैं उनका विजय प्रतिशत चौहत्तर रहा। शायद इसीलिए ऐसे लोगों को टिकट देने से राजनीतिक दल बाज नहीं आते। 2004 से अब तक शिवसेना के पचहत्तर, राजद के छियालीस, जनता दल (एकी) के चौवालीस, भाजपा के इकतीस और कांग्रेस के इक्कीस फीसद दागी प्रत्याशी चुनावी समर में विजयी घोषित हुए हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि संसद या विधानसभा में प्रवेश के लिए पैसे के साथ-साथ बाहुबल भी जरूरी है। धनबल और बाहुबल के भरोसे चुनाव जीतने वाले अधिकतर जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में इजाफे की रफ्तार आसमान छूने लगती है।

राजनीति आज कमाई का सबसे अच्छा जरिया बन गई है। चुनाव लड़ने वाले नेताओं की संपत्ति में पांच वर्ष में औसत 134 प्रतिशत वृद्धि बड़े-बड़े उद्योगपतियों को चौंकाती है। कुछ मामलों में तो संपत्ति में वृद्धि की दर एक हजार प्रतिशत से ज्यादा देखी गई है। इसीलिए अब समृद्ध व्यापारी और उद्योगपति भी संसद में प्रवेश पाने के लिए हाथ-पैर मारते हैं।

चुनावों को काले धन के कुचक्र से बाहर निकालने के लिए चुनिंदा राजनीतिक दल, न्यायविद, शिक्षाविद और सिविल सोसायटी के सदस्य वर्षों से प्रयासरत हैं, लेकिन सरकार के कान पर अब तक जूं नहीं रेंगी है। कुछ बड़े दल और प्रभावशाली नेता इस सुझाव के प्रबल विरोधी हैं। उन्हें लगता है अगर राज्य की मदद मिलने लगी तो चुनाव लड़ने का उनका एकाधिकार समाप्त हो जाएगा। जहां एक चौथाई आबादी कंगाली की रेखा से नीचे हो वहां करोड़ों रुपए खर्च कर चुनाव लड़ना संपन्न तबके का शगल ही समझा जाएगा।

आज आम आदमी वोट तो दे सकता है, चुनाव में खड़े होने या जीतने का सपना नहीं देख सकता। चुनाव लड़ने के लिए जितना पैसा चाहिए उतना उसकी सात पुश्तें भी नहीं कमा सकतीं। लोकतंत्र को धनतंत्र से मुक्त कराने के लिए दुनिया के इकहत्तर देशों में सरकारी पैसे से प्रचार-खर्च (स्टेट फंडिंग) की व्यवस्था लागू है।

मौजूदा चुनाव प्रणाली छेदों से भरी पड़ी है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण काफी है। माना जाए कि देश में अस्सी करोड़ मतदाता हैं और आम चुनाव में साठ प्रतिशत वोट पड़े तो इसका अर्थ यह हुआ कि केवल अड़तालीस करोड़ लोगों ने मतदान में भाग लिया। मौजूदा स्थिति में पैंतीस फीसद वोट पाने वाला दल या गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब हो जाता है। यानी लगभग सत्रह करोड़ मत पाने वाले दल को देश पर पांच साल हुकूमत करने का हक मिल जाता है। सवा अरब की आबादी वाले देश में महज सत्रह करोड़ लोगों के समर्थन से सरकार बनाई जा सकती है। यह मजाक नहीं तो और क्या है? इसी कमजोरी को भांप कर कुछ जागरूक लोग हर पार्टी को प्राप्त वोट-प्रतिशत के आधार पर संसद और विधानसभाओं में सीट देने की मांग उठा रहे हैं।

एक सुझाव यह भी है कि चुनाव जीतने की खातिर किसी भी प्रत्याशी के लिए कम से कम इक्यावन फीसद वोट पाने की शर्त लागू कर दी जाए। फिलहाल कई उम्मीदवार महज बीस-पच्चीस प्रतिशत वोट अर्जित कर संसद और विधानसभा में पहुंच जाते हैं। अच्छे सुझाव तो और भी हैं, लेकिन इन सब पर अमल के लिए राजनीतिक दलों की आम सहमति जरूरी है। फिलहाल आम सहमति के आसार नजर नहीं आते। राजनीतिक दल जन-दबाव के आगे ही झुकते हैं। दबाव बनाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसे ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता।

 

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