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Monday, 10 February 2014 10:57

अभिषेक कुमार सिंह

जनसत्ता 10 फरवरी, 2014 : इसे हमारी बदकिस्मती ही समझना चाहिए कि जिस क्षेत्रवाद को आजादी के साढ़े छह दशकों में एक पिछड़ी बात समझ कर भुला दिया जाना चाहिए था,

वह तमाम तरह की तरक्की के बावजूद हमारे समाज में फन निकाले खड़ा है और समाज के साथ-साथ सियासत का चलता सिक्का भी बन रहा है। इसका सबसे ताजा किस्सा दिल्ली के लाजपतनगर में मारपीट के बाद अरुणाचल प्रदेश के एक विधायक के बेटे की संदिग्ध हालात में हुई मौत है। उसकी मौत के लिए दुकानदारों के साथ हुए जिस झगड़े को अहम कारण बताया गया है, उसकी शुरुआत इस युवक के सिर के बालों और चेहरे-मोहरे परकसी गई फब्ती से हुई थी।

 

शिक्षा और रोजगार की तलाश में दिल्ली आए पूर्वोत्तर के युवाओं के साथ छींटाकशी, छेड़छाड़ और मारपीट की यह पहली घटना नहीं थी। वे अक्सर ऐसी बदतमीजी, अलगाव और एक तरह के नस्ली भेदभाव की शिकायत करते रहे हैं। राजनीतिक दल इसे दिल्ली जैसे राज्य-शहर की कानून-व्यवस्था का सवाल मान सकते हैं, लेकिन यह असल में एक सामाजिक प्रश्न है और ठीक वैसी ही समस्या का एक रूप है जो विदेशों में पढ़ाई या रोजगार के वास्ते गए भारतीय युवाओं को नस्ली व्यवहार के तौर पर झेलना पड़ता है। यह हमारे अंदर का नस्लवाद है जो दिल्ली में असम-नगालैंड के लोगों के खिलाफ, महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के खिलाफ, असम में बिहार के लोगों के खिलाफ और बंगलुरु में समूचे उत्तर और पूर्वोत्तर भारत के लोगों के खिलाफ जब-तब नजर आता रहा है।

दिल्ली, मुंबई या बंगलुरु जैसे शहर, जो आज शिक्षा और रोजगार के केंद्र बन चुके हैं, इस तरह की अशांति गवारा नहीं कर सकते, लेकिन एक-डेढ़ दशक में यहां जो क्षेत्रवादी या नस्ली भेदभाव उभर कर सामने आने लगा है, उसकी आंच हमारी सामाजिक समरसता को झुलसा रही है। शिक्षा और रोजगार की जरूरतों के मद््देनजर कायदे से तो क्षेत्रवादी भेदभाव को अब तक खत्म हो जाना चाहिए था। हमारे युवा सरहदें पार कर जिस तरह अपना लोहा मनवा रहे हैं और अपनी उपयोगिता साबित कर रहे हैं, उसके तहत उनकी प्रतिभा के ज्यादा मायने ठहरते हैं, वे कहां के रहने वाले हैं- यह बात बेमानी हो जाती है। शायद यह काम एक स्तर पर हो भी चुका है, लेकिन उस तरह नहीं, जैसी कि उम्मीद की जाती थी। इसकी वजह शायद यह है कि कुछ पुराने असर आसानी से खत्म नहीं होते। इसीलिए जिन शहरों और इलाकों को हमारी तरक्की का आईना बनने के साथ सामाजिक सद्भाव की बेजोड़ मिसालें बन जाना चाहिए था, वे अपनी इन पुरानी समस्याओं के चलते नस्ली भेदभाव की बुरी नजीरें पेश कर रहे हैं और सियासत को अपने खेल करने के मौके दे रहे हैं।

करीब से देखें तो हमें पता चलता है कि आज हमारे ज्यादातर साझा संस्कृति की नुमाइंदगी करते हैं। मुंबई सिर्फ मुंबईकरों का नहीं है, दिल्ली सिर्फ दिल्लीवालों की नहीं है। शिक्षा और रोजी-रोटी के लिए यहां महज उत्तर, पूर्वोत्तर या दक्षिण के लोग आकर नहीं बस गए हैं, बल्कि अब तो विदेशों से भी यहां बड़ी संख्या में लोग आ रहे हैं। इसी तरह इन बड़े शहरों की तरक्की अपनी अकेले की नहीं है। अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया जैसे मुल्कों की तरह ये शहर इसलिए कामयाब हुए और आगे बढ़े क्योंकि इन्होंने देश और दुनिया के हर कोने से आई प्रतिभा को अपने भीतर जगह दी और लोगों को अपना भविष्य संवारने का मौका दिया। दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों की किस्मत और भविष्य को लेकर आज भी कोई संदेह नहीं है, लेकिन जो क्षेत्रवादी आक्रामकता इनके कंधे पर आकर इधर सवार हो गई है वह इन्हें कहीं पतन की राह तो नहीं ले जाएगी- यही सबसे बड़ी चिंता की बात है। हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि क्षेत्रवादी आक्रामकता का जवाब बिना उग्र हुए दिया जाए। क्षेत्रवाद के जवाब में क्षेत्रवाद का नारा हमें कहीं नहीं ले जाता, यह बात उन नेताओं को याद रखनी चाहिए, जो बदले की बात कहते हैं, हालांकि क्षेत्रवाद के आधार पर रोजगार तय करने की कोशिश और क्षेत्रवाद का सियासी इस्तेमाल ही सबसे बड़ा पेच है जो शहरों के अमन को बर्बाद किए दे रहा है।

असल में जब अवसरों और सीमित संसाधनों में हिस्सेदारी का सवाल उठता है, तो यह क्षेत्रवाद अक्सर ही हिंसक संघर्ष की शक्ल ले लेता है। मुंबई में इसके लिए मुंबईकरों को तरजीह देने का सियासी फरमान जारी हो जाता है, तो रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं में बिहार के उम्मीदवारों की शिरकत को लेकर बावेला मचाया जाता है। ऐसे किस्सों में अलगाव के वे सभी सुर शामिल हो जाते हैं, जिन्होंने अतीत में देश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसक आंदोलनों को जन्म दिया था। सरकारी भर्तियों में क्षेत्र के हिसाब से विशेष कोटे रखने की मांग भी उठी है और इलाके से अलग दूसरे भाषाई लोगों से निकल जाने को कहा गया है।

तमाम क्षेत्रवादी संगठन यह चीख-पुकार भी करते रहे हैं कि बाकी देश उनके इलाके के लोगों का शोषण कर


रहा है, खास तौर से पूर्वोत्तर से ऐसी आवाजें अक्सर आती रही हैं। लेकिन तथाकथित बाहरी शोषण की यह भावना कम-ज्यादा हर क्षेत्र में मौजूद है, इसीलिए बिहार में इतनी तीखी प्रतिक्रिया होती है, इसीलिए कर्नाटक और तमिलनाडु कावेरी जल के मुद््दे पर गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा कर देते हैं और इसीलिए मुंबई में शिव सेना बार-बार गैर-मराठी लोगों पर पाबंदी के लिए मचल उठती है। ये सिर्फ कुछ बड़े उदाहरण हैं। व्यंग्य और नफरत के रूप में तो क्षेत्रवादी आग्रह हर जगह मौजूद है, जो मौका आने पर सतह पर फूट भी सकता है।

बहरहाल, दिल्ली में पूर्वोत्तर के युवाओं के साथ नस्ली भेदभाव के ताजा घटनाक्रम के संदर्भ में कुछ फौरी कदम उठाए जाने जरूरी हैं। निरपराध नागरिकों की हिफाजत के लिए जो जरूरी हो, वह राज्य सरकारों को करना चाहिए, ताकि आग फैलने न पाए। दोषियों के प्रति सख्ती से इस अराजकता पर काबू पाया जा सकता है। जरूरी यह भी है कि क्षेत्रवाद के इस उभार का फायदा उठाने से राजनेता परहेज करें और अखिल भारतीयता के लिए अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करने में कोई कसर न छोड़ें। इस सवाल पर दीर्घकालीन नजरिये से भी विचार करने की जरूरत है, क्योंकि अवसर और संसाधनों की कमी जब तक रहेगी, क्षेत्र, जाति या धर्म, किसी भी बहाने से संघर्ष की जमीन तैयार होती रहेगी। इस अभाव को रातोंरात दूर नहीं किया जा सकता, लेकिन जो और जैसा भी मौजूद है, उसे बांटने में पक्षपात नजर नहीं आना चाहिए।

असल में, यह आगे बढ़ते शहरों और समृद्ध होते इलाकों की सहनशीलता के इम्तहान का वक्त है। यह मान कर चलना होगा कि तरक्की की राह बढ़ते हमारे शहर इस किस्म की अशांति लंबे वक्त तक बर्दाश्त नहीं कर सकते और उन्हें जल्द ही क्षेत्रवाद नामक दशकों पुरानी समस्या का जड़ से इलाज ढूंढ़ना होगा। इन शहरों में रहने वालों को भी यह सियासत समझ लेनी चाहिए, क्योंकि क्षेत्रवाद सिर्फ दिल्ली या मुंबई की समस्या नहीं है। किसी न किसी स्तर पर हम सब इसके शिकार बनते हैं और हम सबको अपनी-अपनी जगह इससे निपटना है। ऐसी दिक्कतों के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार शांति और उदारता है। शांत रह कर और दूसरे इलाकों और दूसरे भाषाई इलाकों से आए लोगों को जितनी उदारता के साथ इन बड़े शहरों में अपनाया जाएगा, उतनी ही आसानी से इस समस्या का हल निकल आएगा, बशर्ते कि उसमें सियासत कोई रोड़े न अटकाए।

इन शहरों के समाज को यह बात अपने मन से निकालनी होगी कि शहर और उसके संसाधनों, रोजी-रोटी पर सिर्फ उन्हीं का हक है। दिल्ली-मुंबई-बंगलुरु आदि शहर देश के सभी नागरिकों के शहर हैं और कोई उन्हें इस अधिकार से बेदखल नहीं कर सकता है। ये शहर आज उन सभी के हैं जो यहां रहते हैं या रहने और काम करने के लिए यहां आ रहे हैं। इन शहरों को सभी अपनी मेहनत और अक्ल से अपने सपनों का शहर बनाने में योगदान दे रहे हैं। आज की तारीख में किसी एक शहर से किसी एक समुदाय को अलग करके देखेंगे तो पता चल जाएगा कि ऐसा करते ही उस शहर की चमक कितनी मंद पड़ जाती है।

क्षेत्रवाद के मुद््दे पर खास तौर पर सियासी चालों से सतर्क रहने की जरूरत है। विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों में नस्ल या अन्य भावनात्मक मुद््दों का नेता खूब दुरुपयोग करते रहे हैं। जैसे बढ़ती बेरोजगारी के लिए अन्य समुदायों की बढ़ती संख्या को जिम्मेदार बताना। यह प्रवृत्ति आज विदेशों में भी है और अपने देश में भी। लेकिन यह काल्पनिक डर है जिसे दिखा कर राजनीतिक लोग अपनी सियासी रोटियां सेंकते हैं। हमें पता है कि आज न तो दिल्ली का काम पूर्वोत्तर या उत्तर प्रदेश-बिहार के लोगों के बिना चल सकता है और न मुंबई का। जिस तरह अमेरिका को सस्ते श्रम के लिए भारतीय युवाओं की जरूरत है, उसी तरह हमारे बड़े शहरों को कम पैसे में पढ़े-लिखे युवा असम या उत्तर प्रदेश-बिहार से ही मिल सकते हैं।

दुनिया के कुछ मुल्कों के साथ अपने देश में भी क्षेत्रवाद का रुझान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि भूमंडलीकरण अपने साथ बंटवारे के नए बीज लेकर आया है। यह भी सही है कि संसाधनों में बंटवारे की फिक्र गरीबों को उतनी नहीं होती, जितनी अमीरों को। इसलिए अगर सरकारों ने इस रुझान पर सख्ती से रोक नहीं लगाई गई, तो असम या उत्तर प्रदेश-बिहार के घरेलू प्रवासियों को ही नहीं, उन बड़े शहरों को भी नुकसान उठाना होगा जहां रोजी-रोजगार के लिए वे जाते हैं। ऐसी घटनाएं दुनिया में कहीं भी होती हों, हमारे समाज के लिए चिंता की बात हैं।

 

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