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कभी-कभार : एक और मेला PDF Print E-mail
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Sunday, 09 February 2014 11:54

अशोक वाजपेयी

जनसत्ता 09 फरवरी, 2014 : बाकी मेले होने के बावजूद अपने को समारोह या उत्सव आदि कहते हैं। दिल्ली के कला-पंचांग में बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया भारतीय कला मेला अपने को सीधे मेला ही कहता है: अंग्रेजी में ‘फेयर’, फेस्टिवल नहीं। चार दिनों के इस मेले में हर रोज गया: और कहीं इतनी कम अवधि और इतने सुसज्जित स्पेस में इतनी सारी कला देखने को नहीं मिलती, जितनी इस मेले में। उसका प्रबंधन इस वर्ष सबसे अच्छा था। विदेशी गैलरियां शायद पहले की तुलना में कम आई हैं, लेकिन समकालीन भारतीय कला के शहराती पक्ष का यह अब सबसे बड़ा सम्मेलन हो गया है। एक ही छत के नीचे पिकासो, मार्क शगाल, ज्यां मीरो, हुसेन, रज़ा, रामकुमार, कृष्ण खन्ना आदि से लेकर बिल्कुल युवा भारतीयों और विदेशियों के काम देखने का अद्भुत और रोमांचक सुयोग जुड़ा। बड़ी संख्या में कलाकार, कलाविद और कलाप्रेमी भी जुड़ते हैं: बहुतों से अब मिलना ही इस मेले में हो पाता है। खासकर दूसरे शहरों में रहने वालों से। मेले का इस बार छठवां संस्करण था, जिसमें लगभग सौ बूथों में इक्कीस देशों की गैलरियों ने कलाकृतियां प्रदर्शित कीं।

दो बड़ी कमियां नजर आर्इं: भारत की विपुल लोक-आदिवासी कला और संकेंद्रित रूप से समकालीन अमूर्त-अरूप कला की कोई प्रस्तुतियां नहीं थीं, जबकि दोनों ही भारतीय कला-समकालीनता के मूल्यवान और गतिशील पक्ष हैं। यों यहां-वहां देशी-विदेशी अमूर्त कलाकृतियां थीं, पर बहुतायत उन्हीं कलाकृतियों की थी, जो तथाकथित यथार्थ से प्रेरित या उसकी कुछ न कुछ फैंटेसी रचती-खोजती हैं। यों यह सामान्यीकरण करना अनुचित न होगा कि जितना नवाचार आज भारतीय ललित कला में है उतना किसी अन्य कला में नहीं है। इस नवाचार में सामग्री, विधि, कौशल, टेक्नालजी, दृष्टि, विचार आदि की विलक्षण और कई बार विचित्र बहुलता है। कई बार लगता है कि कला का हर प्रतिमान, पारंपरिक और आधुनिक दोनों ही, प्रश्नांकित हो रहा है। फिर यह भी अलक्षित नहीं जा सकता कि सौंदर्य के समयसिद्ध प्रतिमान अब तक प्रासंगिक हैं। ऐसे कई दिलचस्प और शिक्षाप्रद अंतर्विरोध स्पष्ट थे और आपको किसी सामान्यीकरण में सब कुछ को समेटने की चेष्टा के अनिवार्य अधूरेपन की ओर इशारा करते थे।

बहुत सारे चित्र दीवारों और ईजल से उतर कर फर्श पर चले आए थे। ऐसे भी कई थे जो रंग-रेखाओं से नहीं, निहायत अकलात्मक सामग्री जैसे लोटे-गिलास, टायर, आलपिनों आदि से रचे गए थे। आम जिंदगी अपने सारे ब्योरों के साथ, बिना किसी परिष्कृति के, मानो सीधे कला में घुस आई है: कला वस्तु में नहीं, दृष्टि में होती है। दृष्टि ही निहायत साधारण को कुछ जतन और कुछ सूझ से कलावस्तु और विशिष्ट में बदल सकती है! यह बात भी बार-बार साफ हुई कि कितनी ही स्वत:स्फूर्त हो, प्रेरणा उसे आकार या रूप कौशल ही दे सकता है। बिना कौशल के कला संभव नहीं और कौशल का भूगोल आजकल बहुत फैल गया है।

समझ की मुश्किल

आधुनिकता ने शास्त्रीय और पारंपरिक विमर्श से अलग अपना विमर्श, बल्कि अपने कई विमर्श विकसित किए: इन विमर्शों की नई भाषा भी सामने आई। शुरू में उसे बरतने-समझने में कुछ मुश्किल भी हुई। पर अंतत: वह भाषा ही आधुनिक समय की सर्वमान्य और सर्वग्राह्य भाषा बन गई। फिर उत्तर-आधुनिकता आई: उसने आधुनिकता के कई अभिप्रायों और अवधारणाओं को प्रश्नांकित करते हुए उसे बहुलता, बहुविकल्पमयता की ओर खोला। अपने विमर्शों के लिए उसने नई भाषा भी गढ़ी। लेकिन आधुनिकता की तरह होने के बजाय उसकी यह भाषा कुल मिला कर खगभाषा बन कर रह गई है- जो लोग उस भाषा को बरतते हैं वही उसे समझते-सराहते हैं, बाकी के लिए वह उत्तर-आधुनिकता के कई दशक बीत जाने के बाद भी अबूझ और अग्राह्य बनी हुई है। इस नई विमर्श-भाषा ने दुनिया भर में कई बौद्धिक द्वीप बना लिए हैं: उनकी एक बिरादरी भी बन गई है। सीधे को टेढ़ा कर कहना और ऐसे कहना कि वह तुरंत समझ में न आए, इस बिरादरी की विशेषता है।

कला मेले में जो बौद्धिक विमर्श हुए उसके कुछ सत्र मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की। उसमें जिस तरह की भाषा बोली गई उसका अधिकांश अगर पल्ले नहीं पड़ा तो इसके लिए मेरा बौद्धिक पिछड़ापन एक कारण हो सकता है, पर वही मात्र नहीं। हिंदी के अलावा अंग्रेजी का थोड़ा-बहुत ज्ञान मेरे पास है। उत्तर-आधुनिकता के कई लटकों-झटकों से भी परिचय है। यह भले शर्मनाक है, पर सही है कि मुझे ऊब बहुत हुई। अगर आप एक सार्वजनिक आयोजन में कुछ कहते हैं तो आपको संप्रेषण के कुछ कायदे तो बरतने ही होंगे। आखिर आप दीवारों और उफक से नहीं, जिंदा और सामने मौजूद लोगों को संबोधित कर रहे हैं!

एक बात


और लगी। यों तो सारी आलोचना में अल्पपाठ, अतिपाठ और कुपाठ-अपाठ की समस्याएं होती ही हैं। पर लगता है कि यह अतिपाठ अंग्रेजी में लिखी-कही जाने वाली कला-आलोचना में अतिरेक के स्तर पर पहुंच चुका है। एक तरह का अतिचार हो रहा है। अनेक कलाकृतियों में राज्य, राजनीति, वर्चस्व, सरहद, वस्तुसत्ता, सम्मिश्रण आदि का जो आरोपण किया जाता है, उन्हें उनमें खोज पाना हम जैसे अल्पबुद्धि व्यक्तियों के लिए बहुत कठिन होता है। सही है कि कलाएं अपने समय, समाज, व्यक्ति, संस्कृति आदि से प्रतिकृत होती और उन्हें कई बार संबोधित भी होती हैं: यह कोई नई और बहुत जटिल बात नहीं है। पर यह संवाद और संबोधन अतिरंजित नहीं किया जा सकता: उसे प्रथमत: और अंतत: सीधे कलानुभव से ही उमगना-उपजना चाहिए। हममें से अधिकांश खग नहीं हैं, संभवत: और निचले स्तर के प्राणी या पशु होंगे और हमें खगभाषा समझ में नहीं आती। पर कला विशेषज्ञों का ही मामला नहीं हो सकती। अगर वह लोकवृत्त में है और हमें उसके रसास्वादन का सहज अधिकार और अवसर मिले हुए हैं तो हमें समझ का भी अधिकार है। यह नोट करना भी दिलचस्प था कि वह विमर्श जो पश्चिम के बौद्धिक विमर्श को प्रश्नांकित करने की ओर मुखातिब है, पश्चिम की भाषा और अभिप्रायों से ही यह कर रहा है। उसमें अब तक हमारी अंतर्ध्वनियां लगभग नहीं हैं।

यहां-वहां की

किरण नादार संग्रहालय में कलाकार विवान सुंदरम से बातचीत में संस्कृतिविद होमी भाभा ने किसी कलाकृति के उत्तर-जीवन का जिक्र किया और कहा कि अच्छी कृति अपने समय के बाद भी अगर महत्त्वपूर्ण बनी रहती है और उसका सिर्फ ऐतिहासिक महत्त्व नहीं होता तो यह उसका उत्तर-जीवन होता है, जो उसे अवसान या समाप्ति से बचाता है। एक और प्रसंग में भाभा ने यह भी कहा कि जब कलाकार किन्हीं उपयोगी वस्तुओं का अपनी कला में उपयोग करता है तो एक तरह से वह उन्हें उपयोगिता के बाड़े में महदूद रहने से मुक्त कर देता है: यह, उपयोग से अलग, उन वस्तुओं का अप्रत्याशित उत्तर-जीवन होता है।

कला मेले में विचरते हुए इसकी ओर ध्यान गया कि कई कलाकारों ने, जिनमें कुछ विदेशी भी शामिल हैं, गांधीजी को लेकर कलाकृतियां बनाई हैं। यह इसकी पुष्टि करता है कि भयावह भारतीय विस्मृति के बावजूद, एक स्वप्न, एक विकल्प के रूप में गांधीजी अब भी व्यापक दृश्य पर बने हुए हैं। मुंबई के नरेंद्र यादव ने अपने मूर्ति-शिल्प में एक गांधी-हथौड़ी बनाई है, जिसमें दोनों ओर गांधी की मूर्ति है और वह एक कठिन-कठोर पत्थर पर रखी हुई है, जिसका एक हिस्सा मानो इसी हथौड़ी से तोड़ा जा चुका है: कई आशय अंतर्ध्वनित होते हैं, जैसे यह कि गांधीजी की दृष्टि का सहारा लेकर अभेद्य-कठोर को भी तोड़ा जा सकता है। एक कोरियाई चित्रकार ने गांधीजी का एक विशाल व्यक्ति-चित्र नीले-बैंगनी रंग में बनाया है। अतुल डोडिया का एक चित्र आधा फोटोग्राफ है, जिसमें गांधीजी ट्रेन की एक खिड़की से हरिजनों के लिए एक व्यक्ति से चंदा ले रहे हैं और चित्र के दूसरे हिस्से में गायकोमेती के आधे हाथ के एक शिल्प की तस्वीर जड़ी हुई है। ‘रामायण’, ‘महाभारत’, बुद्ध की ही तरह गांधी एक असमाप्य कथा हैं।

इस बार मेले में सैयद हैदर रज़ा के भी बहुत सारे चित्र थे: लगभग दस गैलरियों ने उनके चित्र प्रदर्शित किए, जिनमें एकाधिक विदेशी गैलरी भी थीं। अच्छी-खासी संख्या उन चित्रों की थी, जो उन्होंने भारत लौटने के बाद यानी नब्बे बरस की उमर हो जाने के बाद बनाए हैं: रज़ा की रंग-जिजीविषा अद्भुत है। मानो राग वही है, लेकिन उसकी प्रस्तुति में कुछ नई भंगिमा, नई गंध हर बार जुड़ जाती है और उसका रूप बदल जाता है। उनके यहां रंग ऐसे खिलते रहते हैं जैसे कि उन्हें अपने अलावा कुछ और नहीं कहना है: वे रंग हैं- कुछ ऊर्जस्वित, शांत, विनम्र, क्षुब्ध, तरंगित और अपनी लय में विन्यस्त- मानवीय और प्राकृतिक संसार का एक और रंग-सत्यापन। उनसे अनुराग का एक और इजहार। मुझे इनमें से कई चित्र बनते हुए देखने का सौभाग्य मिला है: वे अक्सर अपनी नजर कमजोर पड़ जाने की शिकायत करते हैं, पर जैसे ही वे हर रोज कैनवस के सामने बैठते हैं, उनकी अंगुलियां उनकी आंखें हो जाती हैं- वे अपनी आंखों से नहीं, अपनी अंगुलियों से देखने लगते हैं!

 

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