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राजनीति के नए तेवर PDF Print E-mail
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Monday, 27 January 2014 11:23

गिरिराज किशोर

जनसत्ता 27 जनवरी, 2014 : दिल्ली ने क्या नया इतिहास लिखा है? तथाकथित अराजकता का इतिहास?

गांधी ने भी नमक कानून के विरोध में दांडी मार्च करके यह किया था। उनके पट्टशिष्य नेहरू और अन्य सहयोगियों तक ने उसका विरोध किया था। ब्रिटिश सरकार ने तो उन्हें गिरफ्तार करके जेल में ही डाल दिया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल धरने पर बैठे। बहुत जोर से सवाल उठ रहा है कि एक मुख्यमंत्री को अपने पद की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। दूसरे, क्या आम जन के समर्थन से उनके हित के लिए खड़े होने वाले व्यक्ति को उस वर्ग से अपने को काट कर सत्ता से जुड़ जाना चाहिए? तीसरे, किसके हित में व्यापकता है, सत्ता और शासन के, या जन के? इन सवालों पर सोचने का समय पुन: आ गया मालूम पड़ता है।

 

सत्ता-पक्ष और जन-पक्ष दो अलग अलग वर्ग नजर आने लगे हैं। जन से उठ कर जो सत्ता से जुड़ता है उसे क्या इतनी जल्दी बदल जाना चाहिए और सत्ता के नियमन को सर्वोच्च मान कर अपनी भूमिका को आमूल बदल लेना चाहिए? यह सवाल आज महत्त्वपूर्ण हो गया है। क्योंकि जनता ने जनप्रतिनिधियों को सत्तारूढ़ हो जाने पर अपनी जमीन और सतह से ऊपर उठते देखा है। इस खतरे को गांधी, लोहिया और जेपी ने बखूबी समझा था। उन्होंने अपनी सामान्य आदमी वाली स्वायत्तता को कभी नहीं छोड़ा।

यह पहली बार हुआ कि किसी ने सत्ता मिलने और पदारूढ़ होने के बाद भी जन-हित में अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ा। सामान्यता न कभी छोटी थी और न है। सामान्यता ही सत्ता की जननी है। सामान्यता को इस रूप में देखने का पहली बार मौका मिला है। अगर मैं कहूं कि आप ने सामान्यता को समझने का एक कोण विकसित किया है। आम आदमी ही आप है, वह न तुम है, न तू। जो तू-तड़ाक अब तक चलता आया उस पर रोक लगेगी।

लोहियाजी से जब एक समाजवादी मंत्री लंबी कार में बैठ कर मिलने पहुंचा, तो उन्होंने पूछा, तुम कल तक चप्पल पहने घूमते थे, अब चौंतीस फुट की कार में घूम रहे हो, इस तरह सरकार चलाओगे? यह कह कार छुड़वा दी और पैदल या रिक्शे पर भेजा था। उस मंत्री ने मंत्रियों को एक खास तरह से स्तरीय जीवन बिताते हुए देखा था। वह शुरू से उसी स्तर को मंत्री होना समझने लगा था। केजरीवाल ने उस मिथ को तोड़ने की पहल की है। मुख्यमंत्री और उनके मंत्री पहली बार (बीस जनवरी को) सड़क पर सोए हुए थे। हजारों की तादाद में जन उनकी तरह रहे थे तो वह अराजकता कैसे हो सकती है।

सवाल एक और है, जनतंत्र जब प्रतिष्ठान या मिथ बनने लगे तो उस मिथ को तोड़ने के लिए किसी ऐसे तंत्र की आवश्यकता होती है जो उसमें घुस सके। गांधी ने ब्रिटिश तंत्र को तब तोड़ा जब वे जन के साध जुड़े, नहीं तो कांग्रेस ब्रिटिश-कांग्रेस अधिक थी। भारतीय कांग्रेस गांधी के हस्तक्षेप के बाद बनी। उसकी तैयारी के लिए अपने गुरु के कहने पर वे कस्तूरबा के साथ तीसरे दर्जे में देश का भ्रमण करने निकले थे। 1947 के बाद भी वे देश की मानवीय समस्याओं को सुलझाने के लिए पूर्वी बंगाल में पैदल घूम रहे थे। लेकिन आज लोग बिना सोचे-समझे राजनीति में भी आ जाते हैं।

पहली बार नहीं ऐसा हुआ। उत्तर प्रदेश में तो संविद सरकार जेल से भी चली थी। रामस्वरूप वर्मा और प्रभुनारायण सिंह जेल में थे। फाइलें जेल में अधिकारी ले जाते थे, और वहीं से आदेश आते थे। बंगाल के गांधीवादी अजय बाबू ने भी संविद सरकार का मुख्यमंत्री रहते हुए अपने वामपंथी मंत्रियों के कारण सड़क पर धरना दिया था। जहां तक मुझे स्मरण है, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी भी मुख्यमंत्री के रूप में भूख हड़ताल कर चुके हैं। वह अराजकता थी या अनुशासन था, यह तो देश के दोनों प्रमुख दल ही बता सकते हैं!

गांधी तो सबसे बड़े अराजकतावादी थे। उन्होंने पार्टी के अंकुश को नहीं माना, न तत्कालीन सरकार के अनुशासन को माना, आजादी के दिन समारोह में सम्मिलित होने से मना कर दिया। किसी ने मुझे बताया था, जब गांधीजी ने घोषणा की कि मंत्रियों को छोटे घरों में रहना चाहिए और पांच सौ रुपए माहवार तनख्वाह लेनी चाहिए, तो किसी पत्रकार ने पूछा था कि पंडितजी का कहना है इतने बड़े देश का काम क्या मंत्री लोग झोपड़ियों में रह कर चलाएंगे।

तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष कृपालानीजी और कांग्रेस महासचिव आचार्य जुगल किशोर वहां मौजूद थे। गांधीजी बोले ‘छाया सरकार तो पंडितजी सड़कों से ही चलाते थे।’

कृपालानीजी भाषा से चोट करने में अपना सानी नहीं रखते थे। बोले ‘जवाहरलाल सड़कछाप बापू के साथ थे तो जगने-सोने से लेकर गोरी सरकार को भगाने का काम सड़क पर ही किया था, अब माउंटबेटन के साथ हैं...।’

इस देश की पुलिस, चाहे वह प्रदेश हो केंद्र, मंत्रियों के साथ बदसलूकी करती रही है। यह बात अलग है कि छोटे-मोटे मंत्री अपनी इज्जत बचाने के लिए पुराने जमाने की बलात्कार-पीड़ित औरत की तरह चुप लगा जाते हों। बड़े और ताकतवर मंत्री यह कह कर नजरअंदाज


करते हैं, मैं कस दूंगा। लेकिन आप का मंत्री तो ऐसी सरकार का मंत्री है जिसके पास न अपनी पुलिस है और न पूरे राज्य का दर्जा। ऐसे मंत्री को पुलिस अपनी गाड़ी पर बैठा कर ले भी जा सकती है और यह भी कह सकती है कि वे पुलिस की गाड़ी में स्वयं आकर बैठे। अगर कोई मंत्री पुलिस से कहे यहां गड़बड़ काम होता है, छापा मारो, तो वह बड़ी आसानी से कुछ भी कह कर टाल सकती है।

दूसरा मसला और भी ज्यादा संवेदनशील है, बलात्कार पर बलात्कार हो रहे हैं। चाहे वह दिल्ली हो या इटावा या कोई और शहर, पुलिस जांच करती रहती है जो कभी पूरी नहीं होती। ज्यादा जोर पड़ा तो दो-चार जरायमपेशा लोगों को पकड़ कर बंद कर दिया। अच्छे काम में इनामख्वारी हो गई। आज तक किसी मंत्री या अधिकारी ने इस अव्यवस्था के विरोध में आवाज उठाई? राजनीतिक मुद्दों पर भले हलचल हुई हो। यह संवेदनशील मुद्दा है। किसी भी महिला का बलात्कार हो, चाहे भारतीय हो या विदेशी, सबका इशारा हमारी-आपकी महिलाओं की तरफ  भी हो सकता है। सामान्य आदमी की तो कोई आवाज रही नहीं। वह तो बेसहारा हो गया। वही विरोध करने की स्थिति में हो सकता है जिसके कारण सत्ता में बैठे लोगों की हानि या लाभ हो सकता है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह स्थिति क्यों आने दी, अगर पहले ही तबादले कर देते तो हो सकता था यह मामला संभल गया होता। आग लगने से पहले पेशबंदी कर दी जाए तो घर नहीं जलता। जहां तक जनतंत्र को दूषित करने का सवाल है, जनतंत्र और बहुत-से कारणों से दूषित होता है, जिनकी पहले से बहुतायत है। जो उससे लाभान्वित होते हैं वे तो आंदोलन करेंगे नहीं, जो बचे हैं या इस खतरे को समझ रहे हैं अगर वे सत्ता में आते हैं तो उन्हें दुतरफा काम करना होगा। आंदोलन भी, समाहार भी। यह अंतत: जागृति लाएगा। और जनतंत्रात्मक अधिनायकवाद ने जो जड़ता दी है उसमें भी फर्क पड़ेगा। मैं जानता हूं कि जनतंत्र में पार्टियां आंतरिक स्वतंत्रता देने को विद्रोह समझती हैं इसका कारण हमारे अंदर पलता सामंतवाद है। नेहरू-काल के बाद यह प्रवृत्ति सब पार्टियों में विकसित हुई है; नई पार्टियों को इस मानसिकता से खबरदार रहना चाहिए।

यह जो बड़ी और मझोली पार्टियां अराजकता की चर्चा पर जोर दे रही हैं, उसका कारण यह है कि किसी को वर्तमान की चिंता है, तो किसी पार्टी को अपने भविष्य को लेकर भय सता रहा है। खासतौर से उन पार्टियों को, जिन्होंने पहले से ही अपने प्रतिनिधियों को अपना स्वाभाविक नेता चुनने की स्वतंत्रता को छीन कर उन्हें प्रतिबंधित कर दिया है, तुम्हारा भविष्य उसी से जुड़ा है। लेकिन आप की जीत और उसके द्वारा किए गए आंदोलन ने उनके मतदाताओं को एक नया विकल्प दिया है, अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने का यह भी तरीका है। दरअसल, इन बड़ी पार्टियों की अदल-बदल ने- एक बार तुम दूसरी बार हम- मतदाता को मूक और निराश कर दिया था। यही दो या तीन खूंटे हैं जहां तुम्हें बंधे रहना है। आप की जीत ने यह बता दिया कि आम आदमी निराश नहीं हुआ है। उसमें संघर्ष करने और नया विकल्प खोजने की शक्ति बचा हुई है।

बड़ी और पुरानी पार्टियों को इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। कांग्रेस ने फिलहाल लाभ उठाया है। आगे क्या स्थिति होती है यह वह जाने। लेकिन दूसरी पार्टी इस परिवर्तन के खिलाफ  बिस्तर बांध कर मैदान में उतर पड़ी है। वह बोल-अबोल बोल रही है। राजनीति में बोल ही सबसे अधिक भ्रम तोड़ते हैं। राजनीति में जिसका जितना भरम बना रहता है उसका उतना ही लाभ उसे मिलता है। नंगे सब हैं पर दूसरे के नंगेपन से नफरत होती है।

अंत में मैं अराजकता की बात करना चाहता हूं। कोई भी परिवर्तन बिना अराजकता के नहीं होता। गांधी के अहिंसक आयोजन में भी उतनी ही अराजकता थी जितनी किसी भी देश में परिवर्तन से पूर्व हुई होगी। हम अराजकता को सामान्यत: हिंसा से जोड़ देते हैं। अराजकता स्पेस यानी गुंजाइश पैदा करती है। दूसरी क्रांति होती है, चाहे वह वैचारिक क्रांति हो या राजनीतिक क्रांति। विचार सबके पीछे है। लेकिन दुर्भाग्य से हम उसे भी हिंसा से जोड़ कर परिवर्तन की संभावना को घटा देते हैं।

क्रांति का स्वरूप सुविचारित नियोजकों पर ज्यादा निर्भर करता है। हमें जब तक विचार के नकारात्मक पक्ष का अंदाजा न हो, विचार तत्त्व को नकार कर भविष्य की संभावनाओं की भ्रूण-हत्या करने जैसा है। अंतिम स्थिति यथास्थिति की है, जिसे सुरक्षित समझा जाता है। यथास्थिति गला देती है। जिन्होंने पान के संरक्षण को देखा है वे जानते हैं कि पान उगाने वाले सुबह-सुबह उठ कर उलटते-पलटते हैं, नहीं तो पान गल जाता है। यथास्थिति गलाने के साथ मानसिकता को जड़ कर देती है।

 

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