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सुराज और अराजकता के बीच PDF Print E-mail
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Friday, 24 January 2014 11:03

अपूर्व जोशी

जनसत्ता 24 जनवरी, 2014 : कांग्रेस और भाजपा के सुर बहुत कम एक समान सुनने को मिलते हैं।

अधिकतर मुद्दों पर दोनों के विचारों में बड़ा अंतर रहता आया है। पर इन दिनों इन दोनों दलों समेत मुख्यधारा के सभी राजनेताओं की बोली कम से कम एक मुद्दे पर एक समान हो चली है। मुद्दा है आम आदमी पार्टी और उसकी राजनीतिक शैली। उनके सुर के साथ ताल मिलाता देश के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग भी है। इन सभी का मानना है कि केजरीवाल जिस तरीके की राजनीति करते आए हैं और अब दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते जिस अंदाज में सरकार चला रहे हैं, वह अराजकता की ओर ले जाता है। केजरीवाल के लिए बड़ा संकट यहीं से शुरू होने जा रहा है।

 

पिछले तीन बरसों में देश की जनता के एक बड़े हिस्से ने केजरीवाल के हर रूप को सराहा और उनका साथ दिया। वह रूप भले राजनीति से कोसों दूर एक एक्टिविस्ट का रहा हो, अण्णा के नेतृत्व में चलाए गए लोकपाल बनाओ आंदोलन का हो या फिर आम आदमी पार्टी के तौर पर सीधे राजनीति के अखाड़े में उतरना रहा हो। दरअसल, आज के प्रदूषित माहौल में अण्णा आंदोलन एक नई उम्मीद की किरण लेकर उभरा, जिसे हर आम हिंदुस्तानी ने अपना समर्थन देकर मजबूती प्रदान की, जो इस मुल्क की शासन-व्यवस्था में कैंसर की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार और काफी हद तक व्यभिचार से त्रस्त हो; उससे लड़ने की, उससे मुक्त होने की छटपटाहट रखता है। आम आदमी पार्टी को दिल्ली में मिली सफलता ने ऐसे सभी भारतीयों के भीतर उत्साह का संचार किया। पूरे मुल्क में आम आदमी पार्टी की चल पड़ी लहर वास्तव में इसी उत्साह का नतीजा है।

मगर अरविंद केजरीवाल सरकार के पिछले तीन सप्ताह इस उत्साह में गतिरोध पैदा करने वाले रहे हैं। केजरीवाल ने दिल्ली में सुशासन-सुराज के लिए जनता से उसका वोट मांगा था। केंद्र, दिल्ली की कांग्रेस सरकार और नगर निगमों में भाजपा के भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता ने आम आदमी पार्टी को वोट देकर जहां इन दोनों दलों को आईना दिखाया, वहीं आम आदमी पार्टी को एक बड़ा मौका दिया कि वह सत्ता में आकर न केवल अपने चुनावी वादे पूरे करे, बल्कि पूरे देश में आदर्श राजनीतिक व्यवस्था कायम करने की दिशा में मजबूत पहल करे। केजरीवाल सरकार ने अपने शासन के पहले सप्ताह में ऐसा कुछ कर दिखाने का संकल्प भी प्रदर्शित किया। पानी और बिजली के मुद्दे पर उसने त्वरित कदम उठाए। मगर उसके बाद इस सरकार और पार्टी का हर कदम लड़खड़ाता प्रतीत हुआ।

ऐसा नहीं कि पुलिस, एनडीएमसी और डीडीए जैसी संस्थाओं पर अधिकार किए बिना दिल्ली में सुशासन नहीं स्थापित किया जा सकता। केजरीवाल सरकार मोहल्लों और कॉलोनियों की नाना प्रकार की परेशानियों का हल अपने ‘डायरेक्ट एक्शन’ फार्मूले के जरिए निकालने का प्रयास कर सकती है। इसके लिए मंत्री और नौकरशाह पूरी दिल्ली में जनसंवाद स्थापित कर त्वरित निर्णय लें, जिससे नौकरशाही में गहरी पसर चुकी लेटलतीफी से दिल्ली को निजात मिल सके।

मोहल्ला समितियों और आरडब्ल्यूए को अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा के लिए इन समितियों के जरिए कार्यकर्ताओं की मजबूत फौज तैयार की जा सकती है। दिल्ली परिवहन निगम की बसों में प्रतिदिन महिलाओं के साथ होने वाले अभद्रता को काबू में लाने के प्रयास दिल्ली सरकार कर सकती है। इसके लिए कंडक्टरों, ड्राइवरों को सही ट्रेनिंग देने से लेकर औचक निरीक्षण की कार्य योजना तैयार किया जाना बड़ा और सार्थक कदम होगा। आम आदमी पार्टी को दिल्ली के तिपहिया चालकों ने अपनी पार्टी माना है। लेकिन दिल्ली की आम जनता सबसे ज्यादा इन्हीं से त्रस्त है। इनकी मनमानी रोकने के लिए कदम उठाने की आवश्यकता है।

अरविंद केजरीवाल का चुनावी वादा था कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के शासनकाल में हुए भारी भ्रष्टाचार पर वे निश्चित कार्रवाई करेंगे। उन्हें इस दिशा में भी पहल करनी चाहिए ताकि कांग्रेस के साथ साठ-गांठ के भाजपाई आरोपों को रोका जा सके। साथ ही दिल्ली के नगर निगमों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की तरफ उनका ध्यान केंद्रित होना चाहिए। मुफ्त पानी के अपने वादे को उन्होंने जरूर अमलीजामा पहना दिया है, लेकिन जरूरत दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ियों तक पानी की पाइप लाइन बिछाने की है, ताकि पानी की बर्बादी और टैंकर माफिया पर रोक लग सके।

इसी प्रकार बिजली कंपनियों पर नकेल कसने और अगर जरूरत पड़े तो बिजली वितरण के काम को वापस सरकारी हाथों में लेने के लिए कार्य योजना बनाना भी दिल्ली में सुराज स्थापित करने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम, बड़ा प्रयास होगा। लेकिन पार्टी नेतृत्व दिल्ली में सुशासन स्थापित करने के अपने घोषित लक्ष्य से हट कर पूरे देश में अपने राजनीतिक प्रयोग को आजमाने के लिए सक्रिय हो गया प्रतीत होता है।

यहीं से संकट शुरू हुआ है। सरकार चलाने का अरविंद केजरीवाल फार्मूला दरअसल उनके एक्टिविस्ट तौर-तरीकों से निकला है, जिसे लेकर राजनेताओं और बुद्धिजीवियों के साथ-साथ अब आम आदमी को भी आशंका होने लगी है कि कहीं यह तरीका अराजकता की तरफ न चला जाए।

इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली सरकार के मंत्रियों द्वारा उठाए गए मुद्दे, खासकर दिल्ली पुलिस में नीचे से ऊपर तक व्याप्त भ्रष्टाचार, अपने आप में बिल्कुल सही हैं,


लेकिन उनके विरोध के तौर-तरीकों को लेकर शंका उत्पन्न होने लगी है। कइयों का मानना है कि ‘डायरेक्ट एक्शन’ का यह तरीका भले जनता के एक वर्ग को सुहा रहा हो, लेकिन आखिरकार यह लोकतंत्र के स्थापित ढांचे के विपरीत जाता है और बड़ी अराजकता को जन्म देने का कारण बन सकता है। रही बात लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन की, तो यहां भी कई प्रश्न हैं, जिनका उत्तर तलाशना जरूरी है।

सबसे बड़ी बात पार्टी संगठन को लेकर है। दिल्ली को छोड़ कर आम आदमी पार्टी का संगठन अन्य राज्यों में न के बराबर है। उत्तर प्रदेश में अवश्य संजय सिंह की सक्रियता के चलते पार्टी का आधार बढ़ा है, लेकिन संगठनात्मक ढांचा खड़ा नहीं हो पाया है। उत्तराखंड के ऋषिकेश में पिछले दिनों आशुतोष और संजय सिंह की उपस्थिति में जिस प्रकार पार्टी कार्यकर्ता आपस में उलझ पड़े उससे इसी आशंका की पुष्टि होती है कि अवांछित तत्त्वों ने आम आदमी की टोपी पहन कर पार्टी की सदस्यता ले ली है। इसके चलते इस आशंका को यों ही खारिज नहीं किया जा सकता कि कहीं आप लोकसभा चुनावों में बड़ी विफलता का शिकार न हो जाए।

पार्टी नेतृत्व इस समय देश भर में अपनी गतिविधियों के विस्तार को लेकर आतुर है। अरविंद केजरीवाल ज्यादा से ज्यादा ईमानदार लोगों को संसद में भेजने की बात कर रहे हैं। पर इस बात की क्या गारंटी है कि आपाधापी में चुने गए प्रत्याशी ईमानदार ही होंगे और पार्टी के घोषित उद्देश्यों के प्रति समर्पित रहेंगे? पार्टी विधायक बिन्नी का उदाहरण सबके सामने है। बगैर मजबूत पार्टी संगठन के अच्छे प्रत्याशियों का चयन लगभग असंभव है। इस समय चूंकि आम आदमी पार्टी की आंधी पूरे देश में चल रही है, इसके चलते स्वार्थी तत्त्व इस बहती गंगा में हाथ धोने को आतुर हैं। इसलिए पूरे देश में अच्छे प्रत्याशियों का चयन करना और लोकसभा का चुनाव लड़ाना टेढ़ी खीर है। कहीं इस खेल में दिल्ली में सुराज लाने का वादा खो न जाए।

एक और बात, जो कइयों को खटक रही है- आम आदमी पार्टी ने निश्चय किया है कि वह किसी भी राजनीतिक दल से गठजोड़ नहीं करेगी। यह पार्टी की नीति का हिस्सा हो सकता है। किसी भी राजनीतिक दल को अधिकार है कि वह अपने राजनीतिक एजेंडे को अमलीजामा पहनाने के लिए नीतियों का निर्धारण करे। लेकिन प्रश्न उन हजारों छोटे-बड़े संगठनों और राजनीतिक पार्टियों का भी है, जिनके जनसरोकार और संघर्ष किसी रूप में अरविंद केजरीवाल से कम नहीं हैं। देश भर में मौजूद ऐसे लाखों एक्टिविस्टों और संगठनों को भले आम आदमी पार्टी या अण्णा आंदोलन के समान मीडिया कवरेज और चुनावी सफलता नहीं मिली है, लेकिन वे बरसों से जनता के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, पुलिस की लाठी-गोली खा रहे हैं। ऐसे लोगों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है। अगर आम आदमी पार्टी अपने में विलय के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं बनाती तो यह उसके अहंकार का ही परिचायक होगा।

कुल मिलाकर यह कह पाना अभी कठिन है कि अरविंद केजरीवाल जिस नई शैली की राजनीति कर रहे हैं वह वाकई आम आदमी के लिए आने वाले समय में कुछ राहत पहुंचाने वाली होगी या फिर देश भर में बड़ी अराजकता पैदा करने का काम करेगी। जो बुद्धिजीवी केजरीवाल को अराजक घोषित कर चुके हैं उनसे भी पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने पिछले पैंसठ बरसों में यही प्रश्न मुख्य धारा के राजनीतिक दलों से क्यों नहीं किया, जिन्होंने पूरी व्यवस्था को इस दौरान खोखला कर डाला। केजरीवाल और उनकी पार्टी पालने में हाथ-पांव मार रहे नन्हे शिशु समान है, जिसे इस समय सही मार्गदर्शन और सलाह की आवश्यकता है। हो सकता है जिस भ्रष्टाचार, अत्याचार, अनाचार और व्यभिचार से मुक्ति की तड़प ने आम आदमी पार्टी को यहां तक पहुंचाया है, उसे प्राप्त करने के लिए पहले कुछ अराजक होना जरूरी हो।

यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस देश और शायद पूरे विश्व में पहली बार ऐसा हुआ है कि जनता ने स्थापित राजनीतिक दलों से इतर एक पूरी तरह गैर-राजनीतिक मंच को विकल्प के तौर पर स्वीकार किया है। जयप्रकाश नारायण भी सतहत्तर में यह नहीं कर पाए थे। उन्होंने तबकी गैर-कांग्रेसी राजनीतिक ताकतों को एक मंच पर लाने का काम किया था। लेकिन केजरीवाल ने उससे कहीं आगे बढ़ कर जनसामान्य को एक बिल्कुल अभिन्न प्रयोग को आजमाने के लिए तैयार कर दिया। इसलिए केजरीवाल और उनकी राजनीतिक शैली को अभी कुछ और वक्त देने की जरूरत है। जिस मुल्क ने कांग्रेसी भ्रष्टाचार को पचास बरस तक बर्दाश्त किया, भाजपा की समाज-विभाजक नीतियों के सच को नजदीक से देखा-भोगा हो, वह केजरीवाल की तथाकथित अराजकता को भी सहने की ताकत रखता है। इस उम्मीद के साथ कि शायद इसी मार्ग पर चल कर उसकी समृद्धि का रास्ता मिले।

 

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