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चिकित्सा तंत्र की बीमारी PDF Print E-mail
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Wednesday, 22 January 2014 11:29

रितु प्रिया

जनसत्ता 22 जनवरी, 2014 : दिल्ली की नई सरकार और उसके स्वास्थ्य मंत्री के जज्बे ने उम्मीद जगाई है कि

सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में अब सुधार होगा। उन्होंने सरकारी अस्पतालों में सुधार को प्राथमिकता देते हुए कई कदम घोषित किए हैं। साथ ही नए अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र बनाने का इरादा भी जताया है। सेवाओं के सुधार और विस्तार के लिए बहुस्तरीय तात्कालिक उपाय संभव हैं। स्थायी प्रभाव के लिए अनिवार्य है कि ये दीर्घकालिक दृष्टि से उपजे हों।

 

दिल्ली में सौ से ऊपर सरकारी अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और मातृ-शिशु केंद्र, मातृत्व केंद्र आदि हैं, जो कि जनसंख्या के अनुपात में अधिकतर राज्यों से कहीं ज्यादा हैं। फिर भी बड़े अस्पतालों में क्षमता से ज्यादा मरीजों की भीड़ लगी रहती है और कुछ केंद्र हैं जो अक्सर खाली-से नजर आते हैं। पर उन सभी से लोगों को शिकायत रहती है। इसका एक कारण दिल्ली की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की ढांचागत कमजोरियां हैं। दिल्ली की विशिष्ट परिस्थिति है, जहां वह राष्ट्रीय राजधानी भी है और पहले केंद्र प्रशासित क्षेत्र थी फिर धीरे-धीरे राज्य बनने की प्रक्रिया से गुजरी; नई दिल्ली और बाकी दिल्ली के अलग-अलग नगर निगम हैं। इस वजह से स्वास्थ्य-व्यवस्था विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में खंडित है। इससे सेवाओं के तालमेल में कठिनाई तो आती ही है, प्रशासनिक कार्यों के बहुकेंद्रित होने से सार्वजनिक खर्च बढ़ता है और जवाबदेही से बचने की गुंजाइश बनी रहती है।

दूसरी मुख्य विसंगति तो हमारी संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था में व्याप्त है। योजनागत विकास के तहत 1950 से हमने डॉक्टरी इलाज पद्धति की और उसमें भी विशेषज्ञ की प्रमुखता को ही स्वास्थ्य-सेवाओं का आधार माना। इस तरह लोगों की अपनी समझ और घरेलू नुस्खों, लोक परंपराओं और प्रचलित विभिन्न पद्धतियों को औपचारिक मुख्यधारा से अलग-थलग कर दिया गया।

डॉक्टरी सेवाओं पर प्रमुख तव्वजो रही, पर (अधिक महंगी होने के कारण) उनका जितना विस्तार करने की जरूरत थी उतना बजट उन्हें भी नहीं मिला। अन्य स्वास्थ्य-परंपराएं लोगों द्वारा इस्तेमाल होती रहीं, मगर डॉक्टरों से लुक-छिपकर। इस प्रकार बुनियादी प्राथमिक सेवा बनी नहीं, अलबत्ता लोक-ज्ञान की वैधता कम होती गई, और प्राथमिक, द्वितीय और तृतीय तीनों स्तरों की सेवाओं के लिए अस्पतालों में भीड़ लगने लगी। डॉक्टरों और नर्सों पर काम का भार अत्यधिक बढ़ गया। और संसाधनों की कमी के बीच अपनी जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश करते डॉक्टर और नर्स लोगों से दूर होते गए।

स्वास्थ्य सेवाओं की इन्हीं ढांचागत कमियों के कारण डॉक्टरों और अन्य चिकित्साकमिर्यों का आम रवैया ऐसा हो जाता है कि ‘ये मरीज और उनके रिश्तेदार हमारे काम में बाधा हैं, हम इतना ही कर सकते हैं, बाकि मरीजों को झेलना ही पड़ेगा।’ ‘सब चलता है’ से बढ़ कर भ्रष्टाचार करना एक छोटा कदम रह जाता है।

स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार दो प्रकार का है- एक जो सभी विभागों जैसा है, यानी सीधे दवाओं, मशीनों आदि की खरीद-फरोख्त, अनुबंध और तबादले-तैनाती में; और मरीजों से पैसा मांगना। दूसरा, विशिष्ट रूप है इलाज में गैर-जरूरी जांच, दवाएं आदि लिखना, जिससे न सिर्फ खर्च बढ़ता है बल्कि वह मरीज की सेहत के लिए घातक भी हो सकता है। दोनों जुड़ी हुई मगर भिन्न समस्याएं हैं और दोनों का समाधान करके ही स्वास्थ्य सेवाओं को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाया जा सकता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता की अवधारणा तय करेगी कि सुधार कैसे होंगे। आजकल गुणवत्ता (क्वालिटी) का मतलब अधिकाधिक मशीनीकरण और चकमक करते कांच और संगमरमर को मान लिया जाता है। मरीज इनसे अपना मन बहलाता है और कर्ज लेकर मोल चुकाता है। पर इनसे वास्तविक गुणवत्ता नहीं आ सकती, इलाज की लागत जरूर बढ़ जाती है। पारदर्शिता, नैतिक आचरण, सौहार्दपूर्ण व्यवहार, सुरक्षित और न्यूनतम दवा और जांच और मरीज का आत्मविश्वास पुष्ट करने से ही लोगों को वांछित बदलाव का अहसास होगा।

राजधानी दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए आवश्यक है कि प्राथमिक, द्वितीय और तृतीय स्तर की सरकारी सेवाओं का आपसी तालमेल हो। वे सभी को जरूरत के मुताबिक उपलब्ध हों, यानी जो घर-समुदाय, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में उपलब्ध हो सकती हैं वे सेवाए वहीं उपलब्ध हों, फिर छोटे अस्पताल में। केवल विशेष इलाज के लिए बड़े अस्पताल जाना पड़े। प्राथमिक और द्वितीय स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों का विस्तार और सुधार होगा तो बड़े अस्पतालों में मरीजों की भीड़ कुछ कम होगी। दिल्ली के हर जिले में सभी सरकारी सेवाओं (दिल्ली सरकार, एमसीडी, एनडीएमसी, इएसआइ और सीजीएचएस) का समग्र अवलोकन करके जरूरत अनुसार नए स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों का स्थान तय हो। जमीन की किल्लत अक्सर समस्या बनती है। खाली पड़ी सरकारी जमीन और खाली इमारतों के उपयोग से और जनता से अपील कर खाली घर स्वास्थ्य विभाग को न्यूनतम किराए या दान पर मिलने से समाधान हो सकता है।

शहर में अनेक मिशनरी अस्पतालों (चर्च, रामकृष्ण मिशन, वक्फ बोर्ड आदि द्वारा संचालित) ने कम खर्च में बेहतर सेवाएं उपलब्ध कराने के तरीके अपनाए हैं। उनसे सीखा भी जाए और सरकारी कार्यक्रमों में जोड़ा भी जाए। दवा और जांच के उपयुक्त, संयमित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए, जिससे प्रति मरीज खर्च भी कम हो और इलाज के नकरात्मक असर भी नियंत्रित हों। उपयुक्त डॉक्टरी इलाज के लिए मानक दिशा-निर्देश बनाए जाते हैं।

देश की सरकारी सेवाओं में पहली बार दिल्ली में ही अस्सी के दशक में इनका इस्तेमाल हुआ था। उस प्रयोग में अब नई जान फूंकने की आवश्यकता है। अगर हर पद्धति के उपयुक्त प्रयोग को स्थान दिया जाए तो घरेलू नुस्खे से तृतीय स्तर के बड़े अस्पताल तक की


सभी प्रकार की सेवाओं को तर्कसंगत सूत्र में बांधा जा सकता है। इससे मानक दिशा-निर्देश की विशिष्ट भारतीय रूपरेखा बन जाएगी, जो दिल्ली और भारत ही नहीं, विश्व को स्वास्थ्य सेवाओं के वर्तमान संकट से निकलने का रास्ता दिखा सकती है।

डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के रिक्त स्थान भरना प्राथमिकता है। अभी प्रचलित अनुबंध प्रथा के बजाय स्थायी पद बढ़ाए जाएं। पैरामेडिकल स्टाफ को उनका काम करने दिया जाए, न कि क्लर्कों की कमी के चलते उन्हें वह काम सौंप दिया जाए।

प्रशासन और जनता, दोनों द्वारा निगरानी की पुख्ता व्यवस्था हो। ‘सपोर्टिव सुपरविजन’ यानी सहयोगी निरीक्षण न होना स्वास्थ्य सेवाओं की एक बड़ी कमी रही है जिसे दूर करना आवश्यक है। जनता का योगदान पाने के लिए स्थानीय जन-स्वास्थ्य समितियां बनें जो स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के अनुकूल बनाने में मददगार हों और निगरानी भी करें।

डॉक्टरों को नैतिक आचरण के लिए प्रेरित करने, मरीजों और उनके परिजनों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए उनके बीच परिचर्चाएं आयोजित की जाएं। हर अस्पताल में स्थायी तौर पर यह मासिक संवाद आयोजित हो तो सभी को एक-दूसरे की समस्याएं और बाधाएं समझने का मौका मिलेगा। स्वास्थ्यकर्मियों की अनेक कमियों के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि व्यवस्था की कमजोरियों के कारण उन्हें काम करने में जो कठिनाइयां अक्सर आती हैं वे कैसे दूर की जाएं।

दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के जोनल और जिला कार्यालय हैं जिनकी जिम्मेवारी अपने क्षेत्र की जनता के स्वास्थ्य की निगरानी करना, स्वास्थ्य समस्याओं की रोकथाम के उपाय करना और इलाज के लिए सेवाओं की व्यवस्था का संचालन करना है। पहली दो जिम्मेवारियों का निर्वहन तो न के बराबर होता है जबकि तीसरी में दिक्कत है क्योंकि सेवाओं के ढांचे में बिखराव बहुत है। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग, एमसीडी, एनडीएमसी, सीजीएचएस, इएसआइ, सभी के बीच बेहतर तालमेल बिठाने और हरेक की जिम्मेवारियों का नए सिरे से जायजा लेकर उनका तर्कसंगत बंटवारा करने की आवश्यकता है।

लातिन अमेरिका के प्रसिद्ध विचारक ईवान इलिच ने आधुनिक डाक्टरी पद्धति के प्रसार से जुड़े तीन तरह के बुरे असर चिह्नित किए हैं- शारीरिक, सामाजिक और सांस्कृतिक। दवाओं आदि के शारीरिक बुरे असर पर तो आजकल काफी चर्चा होती है, पर दूसरे असर भी यहां प्रासंगिक हैं। आधुनिक डॉक्टरी व्यवस्था लोगों के खुद पर भरोसे और आत्मविश्वास को कैसे कुंद करती है और लोगों के आपसी रिश्तों को कमजोर करती है, यह उन्होंने बखूबी वर्णित किया है।

गांंधीजी ने ‘हिंद स्वराज’ में इस ओर इशारा किया था और वे प्राकृतिक चिकित्सा के प्रयोग पर बल देते थे। 1970-80 के महिला आंदोलन ने भी इसी तर्ज पर स्वास्थ्य में स्वावलंबन की बात आगे बढ़ाई थी। चीन में क्रांति केबाद राष्ट्रीय स्वास्थ्य बजट का लगभग आधा भाग स्थानीय, देशज ज्ञान की सेवाओं को दिया गया। साफ है कि लोगों का स्वास्थ्य-ज्ञान और परंपराएं केवल स्वास्थ्य-लाभ का नहीं, जन-सशक्तीकरण का औजार भी हैं।

आज आवश्यक है कि लोगों द्वारा विभिन्न पद्धतियों के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया जाए। विभिन्न शोध दिखाते हैं कि परंपरागत पद्धतियों के ज्ञान के अनुकूल आज भी सही प्रथाएं प्रचलित हैं। दिल्ली के गरीब वर्ग में डॉक्टरी इलाज के साथ-साथ घरेलू इलाज, जड़ी-बूटी का इस्तेमाल खासकर उन प्रवासियों में सबसे अधिक है जिनका गांव से अब भी रिश्ता है। मध्यवर्ग के कुछ हिस्सों में भी यह प्रचलन जारी रहा है, खासकर जहां बुजुर्ग सदस्य परिवार के साथ रहते हैं, और युवा पीढ़ी जो इस ज्ञान से वंचित है वह इसे जानने की इच्छुक होती जा रही है। जो दिल्ली के गरीब अनेक जड़ी-बूटी, पेड़-पौधे यहां ढूंढ़ लेते थे और मुफ्त अपना इलाज कर लेते थे, वे आज इस प्राकृतिक धरोहर से वंचित होते जा रहे हैं। तो अब क्या कर सकते हैं?

सरकारी पार्कों और खुली जगहों पर ऐसे औषधीय पेड़-पौधे लगा कर ये साधन उन्हें दोबारा उपलब्ध कराए जा सकते हैं। स्कूलों में औषधीय बगीचे लगवा कर और बच्चों को उनकी जानकारी देकर लुप्त होते ज्ञान के पुनर्जीवन का संदेश भी सभी तक पहुंचाया जा सकता है। ‘नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड’ इसके लिए सहायता प्रदान करता है, और देश में अनेक प्रकल्प अपने अनुभव का योगदान दे सकते हैं।

साथ मिलकर सामुदायिक कार्य करना, जैसे कि सफाई और पानी की व्यवस्था का मोहल्ले में जिम्मेवार इस्तेमाल सुनिश्चित करना, समुदाय में बड़े-बुजुर्ग और बीमार की व्यवस्थित मदद करना आदि सामुदायिक सशक्तीकरण का दूसरा स्वरूप है।

लोक सशक्तीकरण का तीसरा कोण है सेवा प्रदान करने वाली व्यवस्था में आत्मविश्वास के साथ भागीदारी करना। सामुदायिक निगरानी के लिए औपचारिक स्वास्थ्य समितियां गठित हों जो प्रशासन और स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र से तालमेल रखें, समस्याएं उजागर करें और समुदाय के नजरिए से हल सुझाएं। चौथा कोण है सजग-सक्रिय ‘रोगी कल्याण समितियों’ का, जो हर अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र के संचालन में सामाजिक कार्यकर्ताओं को औपचारिक स्थान देती हैं। ऊपर मरीजों, उनके परिजनों और डॉक्टरों आदि के बीच जिस संवाद की जरूरत रेखांकित की गई है वह भी इसी की जिम्मेवारी हो।

राजनीतिक इच्छाशक्ति और लोक-सदिच्छा का आज से बेहतर मंजर दिल्ली में मुश्किल से ही मिलेगा। ऊपर दिए गए सुझावों से स्पष्ट है कि इस मौके का सदुपयोग करने के लिए अनेक स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है।

 

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