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राजनीति की नई संस्कृति PDF Print E-mail
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Tuesday, 21 January 2014 11:32

रमणिका गुप्ता

जनसत्ता 21 जनवरी, 2014 : पंचतारा होटलों की आभिजात्य संस्कृति की जगह आम आदमी पार्टी ने

सड़क की संस्कृति स्थापित की। इसका असर यह पड़ा कि वातानुकूलित कमरों में बैठ कर राजनीतिक आंकड़ों का जोड़-तोड़ करने वाले भी खुद को धरतीपुत्र बताने में लग गए। उनमें सामान्य नागरिकों की तरह दिखने की होड़ लग गई। दिल्ली में ‘आप’ सरकार की जनोन्मुख कार्यशैली राजनीतिक प्रयोग मात्र नहीं है। इसके अंदर भारतीय मानस की आकांक्षा, संसदीय राजनीति में आई विकृतियों और नैतिक मूल्यों की गिरावट के प्रति क्षोभ शामिल है। इसीलिए जनता ने किसी विचारधारा के पीछे भागने की जगह केवल कार्यक्रम या कार्यनीति की घोषणा करने वाली पार्टी को सिर-आंखों पर बिठाया। राजनीति के एक नए दौर की शुरुआत हुई है। लंबे अंतराल के बाद राजनीति में मिशन की भावना का समावेश हो रहा है।

 

आजादी की लड़ाई के दौरान राजनीति एक मिशन थी। राजनीति में लोग कुर्बानी के जज्बे के साथ आते थे। उस दौर के नेताओं में पदलोलुपता नहीं थी। आजादी मिलने के बाद तो नए भारत के निर्माण का जज्बा उफान पर था। उन दिनों भारत की संसदीय राजनीति और समाज ने नैतिकता के कुछ प्रतिमान भी स्थापित किए थे। आजादी की लड़ाई में शामिल युवाओं ने विवाह और अन्य सामाजिक आयोजनों में सादगी और अनावश्यक खर्चों में कटौती जैसे आदर्श स्थापित किए। उसी समय भारतीय समाज में नवजागरण का माहौल बना। आजादी के कुछ वर्षों बाद कुछ राष्ट्रीय नेताओं की महत्त्वाकांक्षाएं जागृत होने लगीं, लेकिन वे आज की तरह सरेआम नहीं, लोकलाज के परदे के अंदर विकसित होती रहीं। लेकिन छठे दशक तक आते-आते सारे मूल्य विघटित होने लगे। सत्ता की राजनीति में भ्रष्टाचार और येन-केन-प्रकारेण संपत्ति जुटाने और समाज में वैभव, ऐश्वर्य और धन के प्रदर्शन की होड़ लग गई। मिशन की भावना कमजोर पड़ने लगी।

इंदिरा गांधी ने शुरुआत में घरेलू मोर्चे पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण और भूमि-सुधारों को लागू करके मजदूरों और किसानों को राहत ही नहीं दी, बल्कि बांग्लादेश में हस्तक्षेप कर विदेश नीति की सफलता का सिक्का भी जमा दिया और खड़ा कर दिया एक नया देश। लेकिन बाद में उन्होंने निरंकुशता और तिकड़मों का सहारा लिया। 1974-75 में जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनकी चुनावी जीत को अवैध करार दिया, तो उन्होंने न्यायपालिका के फैसले का सम्मान करते हुए इस्तीफा देने के बजाय देश पर आपातकाल थोप दिया। विरोधी स्वर को दबाने के लिए अर्द्धसैनिक बलों और खुफिया संस्थाओं का दुरुपयोग किया। वे प्रेस सेंसरशिप लागू कर पूरी तरह तानाशाही पर उतर आर्इं। यह राजनीति में नैतिक मूल्यों की गिरावट की सबसे बड़ी परिघटना थी, जिसने भविष्य की राजनीति के मूल्यहीनता और लोलुपता के दलदल में डूब जाने का मार्ग प्रशस्त किया। फलत: उन्हें और उनकी पार्टी को 1977 में हार का मुंह देखना पड़ा।

उनकी जगह जिस जनता पार्टी की सरकार बनी उसके नेताओं में भी महत्त्वाकांक्षा और सत्ता लोलुपता कूट-कूट कर भरी थी। प्रधानमंत्री पद पर काबिज होने की होड़ में उसके शीर्ष नेताओं का अहं और स्वार्थ टकराने लगा और 1980 में मध्यावधि चुनाव कराने की नौबत आ गई। उनके राज में भी भ्रष्टाचार खूब फला-फूला। उस चुनाव में मतदाताओं ने जनता पार्टी को नकार दिया और पूर्ण बहुमत के साथ इंदिरा गांधी सत्ता में लौट आर्इं। उनकी वापसी के बाद भ्रष्टाचार और अनैतिकता की विषबेल और तेजी से विकसित हुई और भ्रष्टाचार और तानाशाही ने संस्थागत रूप लेना प्रारंभ कर दिया। उसी समय से भारत की जनता एक आदर्श विकल्प की तलाश कर रही है, जो राजनीति में कई उलट-फेर के बाद भी उसे हासिल नहीं हो पाया।

राजीव गांधी पर बोफर्स की दलाली का आरोप लगा और 1989 के आम चुनाव में उनकी सरकार चली गई। बोफर्स के मुद््दे पर आई विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने केंद्रीय सेवाओं में पिछड़ों के लिए सत्ताईस फीसद आरक्षण लागू करसमाज के बड़े तबके को न्याय दिया। लेकिन खुद उनकी पार्टी के अंतर्विरोधों के कारण उनकी सरकार गिर गई। उसके बाद की सरकारों ने तो राजनीतिक विकृतियों का एक इतिहास ही रच डाला। नैतिक मूल्यों में गिरावट का सिलसिला बरकरार रहा। राजनीति का अपराधीकरण और अपराध का राजनीतिकरण होता रहा। राजनीति से मिशन के तत्त्व तिरोहित हो गए और वह पूरी तरह एक व्यवसाय या धंधे में परिणत हो गई। चुनाव काले धन के निवेश और आर्थिक स्रोतों पर कब्जे का माध्यम बन गया। जनप्रतिनिधि जन-समस्याओं के निवारण की जगह अपनी सुख-सुविधाएं बढ़ाने में व्यस्त हो गए। धनबल और बाहुबल का प्रयोग बढ़ने लगा। सीधे-सादे और गरीब सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए राजनीति के द्वार बंद हो गए।

उधर हमारा बुद्धिजीवी वर्ग भी केवल आलोचना में रस लेकर संतुष्ट रहने लगा। उसने कभी भी राजनीति में प्रवेश कर हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं समझी। राजनीति पर थैलीशाहों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का दबदबा बढ़ गया। लोकतंत्र को हमने भीड़तंत्र, धनतंत्र, लाठीतंत्र और धर्मतंत्र में रूपांतरित हो जाने दिया।

ऐसे में ‘आप’ जैसी पार्टी नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की वाहक बन कर सामने आई। दिल्ली की सत्ता में आने के साथ इसने जनप्रतिनिधियों के विशिष्टता-बोध को खत्म कर दिया। सुरक्षा के तामझाम और बंगला आदि लेने से इनकार कर दिया। इसके नेता शपथ ग्रहण समारोह में मेट्रो पर सवार होकर पहुंचे। स्वयं को आम आदमी के रूप में पेश किया। इस पार्टी के अभ्युदय को भविष्य की


राजनीतिक संस्कृति के लिए एक शुभ संकेत माना जाना चाहिए। आप सरकार कितने दिनों तक चलेगी या क्या करिश्मा दिखा पाएगी, यह सवाल उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना यह कि उसने कौन-सा संदेश दिया है? किन प्रतिमानों की स्थापना की है और उनका दूरगामी प्रभाव क्या पड़ने वाला है? एक अंतर तो अभी से दिखने लगा है कि अब राजनीतिक दलों के अंदर ईमानदार दिखने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है।

भाजपा नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को ईमानदारी की प्रतियोगिता में शामिल होने का निर्देश दिया है। राहुल गांधी ने भी कांग्रेसियों को ‘आप’ से सबक लेने और उसी के अनुरूप कार्य संस्कृति अपनाने की सलाह दी है। अब तो ‘आप’ की कार्यप्रणाली को भी अपनाने की होड़ मच गई है। हाल ही में केंद्र सरकार ने अपने सचिवों की बैठक बुला कर उन्हें कानून बनाने से पहले जनता की राय लेने पर विचार करने का सुझाव दिया है। यह भी सही है कि पुरानी पार्टियों में ‘आप’ के समकक्ष आचरण करने की प्रतिस्पर्धा, जनता के डर के मारे मची है- स्वभाववश नहीं। यह तो मानना ही होगा कि आप ने देश के सम्मुख एक साफ-सुथरी कार्य प्रणाली रखी है। हो सकता है कुछ क्षेत्रीय पार्टियां जोड़-तोड़ और सौदेबाजी का पर्याय बनी रह कर, इन मूल्यों को अपनाने की जगह, अपनी विकृतियों के साथ सत्ता पर काबिज होने की होड़ में पूर्ववत शामिल रहें। लेकिन भारत का आम आदमी क्या चाहता है यह उसने दिल्ली विधानसभा के चुनाव में जता दिया है।

यह भी तय है कि इस संदेश को कौन-सा परंपरागत राजनीतिक दल, किस रूप में ग्रहण करता है, यह राजनीति में उसकी शेष आयु का निर्धारण करेगा। जरूरी नहीं कि भविष्य की राजनीति ‘आप’ या अरविंद केजरीवाल के इर्दगिर्द सिमट कर रह जाए। हो सकता है नैतिक बल और परिवर्तन की आकांक्षाओं से लैस कुछ और शक्तियां राजनीति के मैदान में उतर आएं।

सत्ता का स्वाद चखने के बाद हो सकता है ‘आप’ के नेताओं का चरित्र भी जनाकांक्षाओं के अनुरूप न रह पाए। लेकिन इतना तो तय है कि भारतीय राजनीति से लोलुपता, धंधेबाजी और धनबल-बाहुबल का दौर खत्म करने का संकेत जनता ने आम आदमी पार्टी को चुनाव जितवा कर दे दिया है। ‘आप’ ने जिन मूल्यों की पुनर्स्थापना की है, उन्हीं के अनुरूप अब भावी राजनीति की दिशा तय होगी। ‘आप’ पिछड़ेगी तो उसी तरह की कोई और शक्ति राजनीति की बागडोर अपने हाथों में थाम लेगी। परिवर्तन की यह लहर थमने वाली नहीं दिखती।

जिस साफ-सुथरी और आम आदमी की छवि को उन्होंने साफगोई के साथ प्रतिष्ठित किया है और आभिजात्य और विशेष सुविधा की राजनीति को नकारा है, उससे उनके प्रति दोस्त और दुश्मन दोनों के मन में आदर तो बढ़ा है, एक के मन में श्रद्धा से, दूसरे के मन में डर से। लेकिन इतना ही काफी नहीं है। इस छवि का विस्तार आगे की राजनीति तय करेगा। बदलाव के लिए जमीनी स्तर पर कार्रवाई करके उन्होंने शुरुआत तो कर दी है, लेकिन इसे हर जमात तक ले जाने के लिए उन्हें कोई पक्ष तो लेना होगा।

वे किन जमातों के साथ हैं और किनके साथ नहीं हैं- इसे स्पष्ट करना होगा। चूंकि मुद््दा गैर-बराबरी का भी है और दलित, आदिवासी, स्त्री और अन्य हाशिये की जमातों के साथ हो रहे सामाजिक अन्याय का भी। गरीबों के पक्ष में और पूंजीपतियों-सरमायेदारों, जमींदारों और सामंती व्यवस्था और निजीकरण के खिलाफ भी नीति की घोषणा होना अभी बाकी है। भारत में संस्थागत गैर-बराबरी, सामंती, पूंजीवादी और आभिजात्य संस्कृति की देन है भ्रष्टाचार। यह भिन्न रूपों में सदियों से चला आ रहा है। सोलहवीं शती तक भारतीय जनता ऐसी अन्यायपरक और शोषण करने वाली व्यवस्था के अनुकूलित हो गई थी। लेकिन आज के युग में लोग अधिकारों की बात करने लगे हैं। किनके अधिकारों के पक्ष में हैं आप- इस बात का भी निर्णय होना जरूरी है।

जब मैं झारखंड में मजदूरों और किसानों के शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ रही थी और शोषकों के लिए एक आतंक बनी हुई थी, उस समय जन-समर्थन के कारण शोषितों के हित में बहुत कुछ कार्य कर पाई थी। उनमें मेरी गहरी पैठ थी। जनता का एक बहुत बड़ा तबका मेरे साथ खड़ा था। हालांकि शोषकों का तबका मुझे हमेशा बुरा ही कहता रहा। जब बीमारी या उम्र की वजह से मेरी सक्रियता कुछ कम हुई और मुझमें शोषकों को उतनी क्षति पहुंचाने की क्षमता नहीं रही जितनी चाहिए थी, तब मुझे दुश्मन भी सराहने लगे। मेरी बात का प्रभाव कम हो गया। ‘आप’ भी दिल्ली की राजनीति में भ्रष्टाचारियों को किनारे करने की कुव्वत रखेगी, तभी वह सफल होगी। उसके अपने खुद अच्छे बने रहने से काम नहीं चलेगा। जब मैं मांडू से चुनाव लड़ रही थी तो कामरेड समर मुखर्जी ने मुझे कहा, ‘रमणिकाजी, राजनीति में केवल खुद अच्छा होने से काम नहीं चलता। जब तक आप बुराई को दूर करने की क्षमता नहीं रखतीं, आपके खुद अच्छा बने रहने से दुनिया नहीं बदलती।’

 

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