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कर का भयावह ढांचा PDF Print E-mail
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Monday, 20 January 2014 11:36

कुसुमलता केडिया

जनसत्ता 20 जनवरी, 2014 : स्वामी रामदेव, पुणे की संस्था अर्थ क्रांति और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार

नरेंद्र मोदी ने भारत की कर नीति को स्वाभाविक और विवेकसंगत बनाने संबंधी सुझाव दिए हैं। उस पर स्वयं को देश के विकास की चिंता से चिंतित मानने वाले अनेक व्यक्तियों और समूहों ने काफी परेशानी दिखाई है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों है।

 

इस संदर्भ में कुछ तथ्यों को याद कर लेना उचित होगा। अभी जो करों का ढांचा है, वह दुनिया भर में सौ साल पुराना है। भारत में इंग्लैंड द्वारा बनाए गए कानूनों की निरंतरता में अधिकतर नीतियां जारी रखी गई हैं। अलबत्ता ये नीतियां इंग्लैंड द्वारा स्वयं अपने देश में बनाए गए कानूनों से अत्यधिक भिन्न हैं। अगर भारत में केवल वे कानून ही बना दिए जाते, जो इंग्लैंड में उनके अपने देश के लिए बने हैं, तो स्थिति अभी से बहुत अच्छी होती। पर सत्ता हस्तांतरण के जरिए जो लोग सत्ता में बैठे, उन्होंने सभी क्षेत्रों में वे कानून जारी रहने दिए जो अंग्रेजों ने भारत के संसाधनों का एकतरफा हस्तांतरण इंग्लैंड के लिए करने की दृष्टि से बनाए थे। अब वे संसाधन इंग्लैंड नहीं जाने वाले थे या यूरोपीय देशों और अमेरिका को थोड़ा छिप कर ही जाने वाले थे, इसलिए उन संसाधनों को अफसरशाही और नेताशाही की सेवा के लिए नियोजित कर दिया गया। इसके लिए भारत के पुराने इतिहास के विषय में घोर अज्ञान फैलाया गया, जिससे कि भारतीयों के समक्ष तुलना के लिए कुछ भी न रहे और वे केवल एक अभूतपूर्व राष्ट्र-राज्य के निर्माण की कल्पनाओं से अभिभूत रहें।

पुराने इंग्लैंड में दो सौ साल पहले कोई एक राज्य नहीं था और कोई एक राजकीय नीति नहीं थी। संपत्ति संबंधी कानून भी अलग-अलग और मनमाने थे और जलवायु की प्रतिकूलता और भौगोलिक प्रतिकूलता के कारण आबादी भी कम थी और उस कम आबादी को भी जीवन के संसाधन अत्यंत दुर्लभ थे। इसलिए टैक्स लगाने आदि की कोई कल्पना ही नहीं थी। सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार ऊन के व्यापार पर कुछ कर लगाया गया। इसके बाद अठारहवीं शताब्दी में शहरों में मकान आदि पर भी नाममात्र के कुछ कर लगाए गए। अठारहवीं शताब्दी के अंत में नेपोलियन से युद्ध के मुकाबले के लिए संपन्न लोगों से कुछ रकम की जबरन वसूली हुई, ताकि हथियार खरीदे जा सकें। उन्हें भी टैक्स ही कहा गया। आगे चलकर उसका भी विरोध हुआ। इस प्रकार वस्तुत: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से कुछ टैक्स लगाए जा सके और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही वहां पहली बार एक व्यवस्थित कर नीति बनी। वह भी लगातार बदलती रही है।

उन्नीसवीं शताब्दी तक तो नियम यही था कि लूट के माल में इंग्लैंड के लुटेरे और डकैत (जिन्हें उनके चाटुकार विदेशी दलाल व्यापारी कहते हैं, पर जिन्हें स्वयं यूरोपीय विद्वान लेखक समुद्री डकैत और दस्यु दल कहते हैं), लूट का एक हिस्सा इंग्लैंड की महारानी को और कुछ हिस्सा अन्य संपन्न लोगों को देते थे। उसे लूट में हिस्सा ही कहा जाएगा, टैक्स नहीं। बीसवीं शताब्दी में जब वैसी खुली लूट संभव नहीं रही और दुनिया में अपने लूट के विस्तार को सुरक्षित रखने के लिए कानून की आड़ में लफ्फाजी और जबर्दस्ती के तरीकों और कायदों का सहारा लिया गया, तब से प्रजा की कमाई से अधिक से अधिक हड़पने की चालों को कर नीति नाम दिया गया। पहले एक सीमा से अधिक आमदनी पर कंपनियों पर टैक्स लगाया गया, फिर देश के भीतर भी सेवाओं और उद्योगों पर टैक्स के लिए नीतियां बनाई गर्इं।

मुश्किल यह है कि भारत के शिक्षितों का एक बड़ा वर्ग वर्तमान में यह तथ्य नहीं जानता कि संपूर्ण यूरोप और अमेरिका में राज्य की नीतियां सदा प्रजा से अधिकतम निचोड़ लेने के लिए ही बनाई जाती रही हैं। उसका कारण यह है कि यूरोपीय राज्यों का उदय कुल दो सौ साल पुराना है, उसके पहले वहां छोटी-छोटी हजारों जागीरों का बेतरतीब और अनियमित फैलाव मात्र था। ये राज्य मध्ययुगीन चर्च की पैशाचिक लूट की प्रतिक्रिया में से उभरे हैं और उससे अपेक्षाकृत उदार नीतियां अपनाने का दावा करते रहे हैं। पर इन सब की मूल दृष्टि प्रजा से अधिकतम निचोड़ लेने की ही है। इसीलिए इन नीतियों का अनुसरण उन देशों में करना उचित नहीं है, जहां हजारों साल से प्रजापालन और लोकसेवा ही राज्य का घोषित संकल्प और लक्ष्य रही है।

पर अब तो स्थिति यह है कि स्वयं यूरोपीय देशों और अमेरिका में संपत्ति और टैक्स की जो नीतियां हैं, उनका भी अनुसरण भारत में नहीं किया जा रहा है। इसके स्थान पर सोवियत साम्राज्यवादी दौर में राज्य की एक भयंकर पैशाचिक अवधारणा के चलते जो वित्तीय नीतियां अपनाई गई थीं, उनका ही ढोल पीटा जा रहा है। उन्हें ही भारत के लिए एकमात्र सही नीतियां बताया जा रहा है।

भारतीय राज्य निरंतर राष्ट्रीय सुरक्षा और समाज कल्याण पर राजकोष का एक बड़ा अंश खर्च करते रहे हैं। इसीलिए अठारहवीं शताब्दी तक भारत दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति था। भारतीय राज्यों की आवश्यकता दुनिया के अन्य राज्यों से कम ही थी। पर मर्यादा के अनुशासन के कारण भयंकर लूट की नीति भारतीय राज्य कभी भी नहीं अपना सके। ऐसी लूट पर केवल कुछ मुसलिम शासक चल सके। बाद में अंग्रेजों


ने उस लूट की परंपरा का अभूतपूर्व विस्तार किया। पर 1947 के बाद तो इस लूट को सोवियत ढांचे की नकल के द्वारा अद्वितीय विस्तार दिया गया।

इंग्लैंड में 1 अप्रैल 2006 से जो नई कर-नीति लागू है, उसमें तीन लाख पाउंड तक वार्षिक लाभ कमाने वाली कंपनियों पर उन्नीस प्रतिशत टैक्स लगाया जाता है। इससे आगे पंद्रह लाख पाउंड तक वार्षिक लाभ पर क्रमश: कर बढ़ता है, जो अंतिम सीमा पहुंचने पर तीस प्रतिशत हो जाता है। यह अधिकतम कर सीमा है। दस हजार पाउंड (लगभग दस लाख रुपए) तक के लाभ पर कुछ भी आयकर नहीं देना पड़ता। कंपनियों की पूंजी पर इंग्लैंड में कोई टैक्स नहीं है। कंपनियां व्यापार से हुए कुल लाभ से व्यापार में लगा अपना समस्त खर्च घटा कर ही फिर उस लाभ पर टैक्स देती हैं। अन्य स्तरों पर भी टैक्स नीतियां बहुत उदार हैं।

भारत में कर नीतियां भयंकर हैं। ऊपर से इन करों की वसूली के लिए जो अधिकारी और कर्मचारी तैनात हैं, उनके वेतन-भत्तों और प्रबंध संबंधी व्ययों पर वसूले गए टैक्स का लगभग एक तिहाई हिस्सा खर्च हो जाता है। इस प्रकार उनकी सभी सुख-सुविधाओं के लिए हर भारतीय नागरिक को टैक्स देना होता है। अगर कर-नीति सरल हो और मूल स्रोत में कटौती और बैंक ट्रांजेक्शन टैक्स का नियम लागू होता है, तो यह सभी रकम जो कर वसूलने वाले पूरे तंत्र पर खर्च होती है, खर्च नहीं होगी।

अभी भारत में केंद्र और राज्य-शासन द्वारा बहुत-से टैक्स लगाए जाते हैं। इनमें कृषि आय के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार की आय पर टैक्स, सीमा शुल्क, निर्यात शुल्क, कारपोरेशन टैक्स, संपदा कर, कंपनियों की पूंजी पर कर, संपत्ति की वसीयत आदि सभी प्रकार की अनिवार्य रजिस्ट्री पर कर, जलमार्ग, वायुमार्ग, सड़क और रेलमार्ग से लगने वाला भाड़ा, स्टाम्प ड्यूटी, सभी प्रकार के व्यापार और क्रय-विक्रय पर टैक्स हैं।

इसके अतिरिक्त राज्य सरकारें भूमि-राजस्व, कृषि आय पर कर, कृषि आय के हस्तांतरण आदि पर कर, कृषि आय पर संपदा कर, भवन और भूमि पर कर, खनन संबंधी समस्त क्रियाकलाप पर कर, शराब, अफीम और अन्य नशीले पदार्थों की खरीदी और बिक्री पर कर, किसी भी वस्तु के बाजार में प्रवेश और बिक्री पर कर, बिजली की खपत और बिक्री पर कर, विज्ञापनों पर कर, सड़क, रेल या जलमार्ग से किये जाने वाले परिवहन पर कर, वाहनों पर कर, पशुओं पर कर, नौकाओं पर कर, चुंगी कर, सभी प्रकार के कार्यों, व्यवसायों, व्यापारों, उद्यमों और रोजगार पर कर, कैपिटेशन टैक्स, सुख-सुविधा की वस्तुओं पर कर, मनोरंजन कर, स्टाम्प ड्यूटी आदि सैकड़ों प्रकार के कर वसूले जाते हैं।

किसी भी प्रकार के वेतन पर कर तो है ही। उसमें एक न्यूनतम सीमा तक छूट भी है। इसके अतिरिक्त स्थानीय स्वायत्त संस्थाएं और निगम आदि भी अनेक प्रकार के टैक्स वसूलते हैं। पूंजी बनाने पर कर, संपत्ति या संपदा के संचय और स्वामित्व पर कर, व्यापार पर कर, लाभ पर कर, जीवन के समस्त क्रियाकलाप पर कर की व्यवस्था है। गरीब से गरीब आदमी के द्वारा सरकार को टैक्स दिया जाता है, क्योंकि भोजन, निवास, वस्त्र, मनोरंजन आदि सभी क्रियाकलाप से जुड़ी वस्तुओं पर कर है। इन वसूले गए करों के द्वारा जो कार्य किए जाते हैं, उन्हें ही समाज के कल्याण के कार्य बताया जाता है।

प्राचीनकाल से भारत एक निरंतर चला आ रहा समाज है और इसीलिए राज्य की व्यवस्था की परंपरा भी यहां हजारों वर्ष पुरानी है। ऐसी स्थिति में भारत के राज्यों की क्या कर-नीति रही है, इस पर अध्ययन और सार्वजनिक विमर्श होना आवश्यक है। उसके बिना वर्तमान राज्य की टैक्स-नीति पर कोई भी चर्चा सार्थक नहीं हो सकेगी।

स्मरणीय है कि भारतीय मेधा अर्थ के क्षेत्र में हजारों वर्षों से दुनिया की सबसे तीक्ष्ण, सटीक, प्रभावी और शक्तिशाली मेधा रही है। तभी तो ज्ञात ऐतिहासिक काल में भारत सदा से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है। भारत एक तरफ था और शेष विश्व दूसरी तरफ। इस विषय पर अनेक अध्ययन हो चुके हैं और यह एक विश्व-मान्य तथ्य है।

लेकिन सत्ता हस्तांतरण से शक्तिशाली बने समूहों ने भारतीय मेधा की इस परंपरा को भारत के सार्वजनिक विमर्श के केंद्र से बाहर कर दिया। 1947 तक आधे से अधिक भारत में देशी कर-संरचनाएं चल रही थीं। अंग्रेजी कर-नीतियां केवल ब्रिटिश आधिपत्य वाले भारत में थीं। पर कांग्रेस ने पूरे देश में वे ही साम्राज्यवादी लूट की नीतियां लाद दीं। अब उन्हें हर क्षेत्र से हटाना होगा। इसका प्रारंभ कर ढांचे को स्वाभाविक बनाने और सही कर-नीतियां बनाने से ही होगा।

भारत का राज्य भारतीय समाज की एक शीर्ष संस्था है। उसे भारत का पोषण और संरक्षण करना चाहिए, जिसका अर्थ है- भारतीय नागरिकों के जीवन, संपत्ति, अर्थ परंपरा, विद्या परंपरा और व्यवस्था-बुद्धि, पारंपरिक हुनर और कौशल, प्रबंधन के पारंपरिक ज्ञान और पुरुषार्थ रूपों का संरक्षण। वर्तमान कर-ढांचा तो यूरोपीय देशों की वर्तमान स्थिति की नकल भी नहीं है। वह केवल साम्राज्यवादी लूट की निरंतरता में चल रहा ढांचा है। इसे बदलना और सुसंगत बनाना प्रत्येक राष्ट्रभक्त का कर्तव्य है।

 

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