मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
पूर्वोत्तर में संघर्ष की इबारत PDF Print E-mail
User Rating: / 4
PoorBest 
Friday, 17 January 2014 11:37

मुकेश कुमार

जनसत्ता 17 जनवरी, 2014 : पूर्वोत्तर भारत में जनजातियों के बीच अरसे से संघर्ष होते आ रहे हैं,

इसलिए उन्हें अनदेखा करने की प्रवृत्ति भारतीय समाज और राजनीति में गहरे पैठ गई है। उपेक्षा का यह भाव अब हिंसक टकरावों को गंभीरता से लेने और उनका समाधान तलाशने की इच्छा पर बुरी तरह हावी हो चुका है। इसीलिए जब तक किसी बड़े जनसंहार की खबर नहीं आती, सब चुप्पी साधे रहते हैं। यहां तक कि कई बार हिंसा के बाद भी यह चुप्पी नहीं टूटती। उल्टे राजनीतिक वर्ग इससे लाभ उठाने की फिराक में टकराव को हवा देने से भी बाज नहीं आते। कुछ तात्कालिक समाधानों के सहारे पानी के छींटे डाल कर आग को ठंडा करने की कोशिशें की जाती रही हैं, मगर वह मौका पाते ही फिर से सुलग उठती है।

 

अब तो आलम यह हो गया है कि मानो यही नियति हो और उसके सामने समर्पण के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा हो। एक तरह का असहायताबोध सब तरफ दिखाई देता है, जो कि बहुत खतरनाक  है। वैसे तो इसकी कई मिसालें दी जा सकती हैं, मगर असम के पर्वतीय जिले कार्बी आंगलांग में पिछले दस सालों से चल रही हिंसा इसका ताजा उदाहरण है। यह आदिवासी बहुल इलाका दो तरह की हिंसा से दो-चार हो रहा है। पहली तरह की हिंसा तो अलग राज्य बनाने की उस मांग को लेकर हो रही है, जिसका इतिहास चार दशक पुराना है।

हाल में जनजातियों के बीच एक और हिंसक टकराव ने नई समस्या को जन्म दिया है। कार्बी जनजाति के एक अतिवादी संगठन के अभियान की वजह से बीस से अधिक लोगों की हत्याएं हो चुकी हैं, बहुत सारे लोग पलायन कर चुके हैं और करीब तीन हजार आदिवासी शिविरों में रहने को विवश हैं। यह अभियान नगा समुदाय की एक जनजाति रेंग्मा के खिलाफ  चलाया जा रहा है।

केंद्र और राज्य सरकारें कुछ करती नजर नहीं आ रही हैं। कानून-व्यवस्था को नियंत्रण में करने की आधी-अधूरी कोशिशें जरूर हो रही हैं, मगर जाहिर है वे कामयाब नहीं हो पा रही हैं। उन्हें या तो समझ में नहीं आ रहा कि क्या करें या फिर वे कुछ करना ही नहीं चाहतीं। कुछ करने से किसी पक्ष के नाराज होने का खतरा है, जो उनकी राजनीति को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। हमेशा से उनका रवैया इसी तरह का रहा है, इसलिए पिछले दो दशकों से चल रहा जनजातियों का यह युद्ध थम नहीं रहा।

नब्बे के दशक से जातीय सफाए की घटनाएं शुरू हो गई थीं। पिछले दशक की शुरुआत में हिंदीभाषियों को निशाना बनाया जाने लगा था, जिसके फलस्वरूप हिंदीभाषियों का पलायन शुरू हो गया था। फिर अदरक के कारोबार पर कब्जा करने के लिए कार्बियों का कूकी आदिवासियों के साथ लगभग साल भर तक हिंसक संघर्ष चला। सबसे ज्यादा खून-खराबा 2005 में दिमासा आदिवासियों के साथ कार्बियों के टकराव से हुआ।

बार-बार होने वाली हिंसा की वजहें भी स्पष्ट हैं। सबसे बड़ी वजह तो गरीबी और विकासहीनता यानी आर्थिक पिछड़ापन है। असम के भीतर ही विभिन्न समुदायों के बीच विकास का भयानक असंतुलन है। खासतौर पर दूर-दराज के आदिवासी और दुर्गम इलाकों में विकास के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ है। इस असंतुलन से हीनता, प्रतिस्पर्धा, वैमनस्य और प्रतिशोध की भावनाओं को बल मिला है। इन समाजों में और खासतौर पर युवावर्ग में गहरी हताशा है, जो तरह-तरह से व्यक्त होती है। फिर बांटो और राज करो की राजनीति करने वाले नेता और राजनीतिक दल हैं, जो हमेशा दूरियां बढ़ा कर स्वार्थ सिद्ध करने में लगे रहते हैं। वे पहचान की राजनीति के जरिए भावनाओं को उभारते और अपना वोट-बैंक तैयार करते हैं।

इस राजनीतिक तिकड़म के प्रभाव में एक जनजाति दूसरे के खिलाफ  लामबंद होती जाती है। विभाजनकारी राजनीति और पिछड़ेपन की वजह से, जो कि राजनीति की ही देन हैं, पूर्वोत्तर भारत में लगातार हिंसक आंदोलन आकार लेते रहे हैं। जनजातीय बहुलता वाला यह इलाका इन्हीं वजहों से लगातार बंटता चला जा रहा है। सत्तर और अस्सी के दशक में चले असम आंदोलन की भी इसमें भूमिका रही है। पहले बहिरागत और फिर बांग्लादेशियों के खिलाफ  चला यह आंदोलन मुख्य रूप से पहचान की राजनीति से प्रेरित था। इसने असमिया समाज को पहले के मुकाबले ज्यादा जागरूक और संगठित तो किया, लेकिन इससे निकली वर्चस्व की राजनीति ने जनजातियों को न केवल उससे दूर कर दिया, बल्कि उनमें अलगाव की भावना भी भर दी। असम के अंदर चल रहे ढेर सारे अलग राज्य के आंदोलनों के पीछे भी इसी भावना की भूमिका है।

पहचान की राजनीति के बढ़ते दुष्प्रभाव ने जनजातियों के अंदर इस असुरक्षाबोध को भी गहरा कर दिया है कि उनकी भाषा-संस्कृति विलुप्त हो रही है और इसे रोकने के लिए अपना अलग राज्य होना जरूरी है। इसीलिए हर जनजाति अपने लिए अलग राज्य की मांग करते हुए नजर आ रही है। कार्बी आंगलांग में 1970 से इसकी मांग की जा रही है। जब गारो और खासी जनजातियों के लिए मेघालय और नगाओं के लिए नगालैंड राज्यों का गठन हुआ था तो कार्बियों ने भी अलग प्रदेश की मांग की थी।


स्वायत्त पवर्तीय परिषद बना कर इसे शांत करने की कोशिश की गई थी, मगर एक तो उसे ठीक ढंग से काम नहीं करने दिया गया और दूसरे, भ्रष्टाचार ने उसके उद्देश्य को ही भ्रष्ट कर दिया। लिहाजा पृथक राज्य की मांग के लिए समर्थन बढ़ता चला गया। राज्य की नाकारा सरकारों ने समय पर समाधान निकालने की कोशिश नहीं की, जिसकी वजह से टकराव और हिंसा को बढ़ावा मिला।

हालांकि कार्बी आंगलांग में चल रहे हिंसा के ताजा दौर का संबंध ग्रेटर नगालिम (वृहद नगालैंड) से भी है। नगालैंड के उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-मुइवा गुट) ने असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और म्यांमा के नगा बहुल इलाकों को मिला कर ग्रेटर नगालिम की मुहिम छेड़ रखी है। कार्बी आंगलांग के एक हिस्से में रेंग्मा नगाओं की आबादी है। कार्बी लोगों में इससे असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है। उन्हें लगता है कि एनएससीएन ग्रेटर नगालिम के लिए उन पर निशाना साधेगा। इसीलिए कार्बी उग्रवादी रेंग्मा नगाओं को अपना निशाना बना रहे हैं। वे उनसे धन की उगाही करते रहे हैं।

हाल में उन्होंने आमदनी का साठ फीसद हिस्सा मांगना शुरू कर दिया था। फिर उन्होंने उनसे गांव छोड़ कर जाने के लिए भी कह दिया था। इसी के बाद वहां भगदड़ मच गई थी। कार्बी उग्रवादियों से बचाव के लिए रेंग्मा जनजाति के लोगों ने भी एक हथियारबंद संगठन बना लिया जिससे हिंसक टकराव और भी तीखा होता चला गया। गत 27 दिसंबर को नगालैंड में नौ कार्बी लोगों की तालिबानी तरीके से हत्या के बाद प्रतिशोध की भावना फैल गई और हिंसक हमले तेज हो गए। कार्बी उग्रवादियों ने रेंग्मा नगाओं के गांवों में आग लगाना शुरू कर दिया।

हिंसा की आशंका को देखते हुए भी राज्य सरकार की ओर से एहतियाती कदम नहीं उठाए गए। अगर यह कहा जाए कि सरकार और प्रशासन ने सीधे-सादे आदिवासियों को मरने के लिए छोड़ दिया है तो गलत नहीं होगा। यह सही हो सकता है कि कार्बी आंगलांग जिला पहाड़ों और जंगलों की वजह से बहुत दुर्गम क्षेत्र माना जाता है।

यहां पुलिस चौकियों के बीच की दूरी ही औसतन पचास किलोमीटर होगी। सवाल है कि सरकार और प्रशासन ने ऐसे हालात बनने ही क्यों दिए? क्यों नहीं उसने अविश्वास को दूर करने और सद्भाव का वातावरण बनाने के लिए समय रहते प्रभावी कदम उठाए? वैसे भी जिस इलाके  में पिछले कई सालों से हिंसा हो रही हो, वहां शांति कायम करने के लिए ठोस राजनीतिक पहल करने की जरूरत थी। लेकिन शायद राज्य सरकार को इसकी न चिंता थी और न ही उसके पास इसके लिए फुरसत थी। समझदारी और संवेदनशीलता की कमी तो थी ही।

वास्तव में पूर्वोत्तर की जनजातीय समस्याओं की जटिलता को देखते हुए नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। असम ही नहीं, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा भी जातीय हिंसा से प्रभावित हैं और सबकी जड़ में एक ही तरह के कारण हैं। लेकिन समाधान तलाशने का यह काम राज्य सरकारों पर नहीं छोड़ा जा सकता।

राज्य सरकारों के  वश का  यह नहीं है। वे खुद इनकी जनक भी हैं और पालने-पोसने वाली भी। इसलिए जब तक राष्ट्रीय स्तर पर इसे गंभीरता से लेते हुए समाधान की खोज नहीं की जाएगी तब तक वहां जनजातीय हिंसा, अशांति और अस्थिरता बनी रहेगी। जाहिर-सी बात है कि यह न तो पूर्वोत्तर के विकास के लिए अच्छा है और न ही राष्ट्रहित में है।

आवश्यकता इस बात की है कि पूर्वोत्तर के हालात को ध्यान में रखते हुए एक विकेंद्रीकृत ढांचा बनाया जाए, जो विभिन्न जनजातियों को राज्यों की सीमा के भीतर ही अपने हिसाब से जीने की स्वतंत्रता प्रदान करे। यों छठवीं अनुसूची के तहत जनजातियों की संस्कृति को संरक्षित और सुरक्षित रखने के प्रावधान हैं, मगर साफ  दिख रहा है कि वे कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। इसकी वजह आर्थिक मामलों में पर्याप्त स्वतंत्रता और जन भागीदारी का अभाव है। फैसले या तो राज्यों की राजधानी में होते हैं या फिर स्थानीय स्तर पर राजनीतिक वर्ग अपने स्वार्थों के हिसाब से चीजें तय कर देता है। इन निर्णयों में पारदर्शिता नहीं होती और भ्रष्टाचार का बोलबाला होता है। जब तक यह व्यवस्था नहीं बदलेगी, राजनीति का स्वरूप नहीं बदलेगा और न ही जनजातियों में विश्वास पैदा किया जा सकेगा।

अफसोस की बात है कि राष्ट्रीय राजनीति इससे मुंह मोड़ कर बैठी है। लोकसभा चुनाव के लिए ताल ठोक रहे तमाम दल पूर्वोत्तर की जनजातीय हिंसा की बात तक नहीं कर रहे। ठीक है कि केंद्र में सरकार बनाने के लिहाज से उसका महत्त्व उनके लिए नहीं है, क्योंकि वहां से इतने सांसद चुन कर नहीं आते, जिससे किसी का गणित बन या बिगड़ जाए। लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं है कि उस भू-भाग को राष्ट्रीय सरोकार से काट कर अलग कर दिया जाए।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें-    https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें-      https://twitter.com/Jansatta

 

 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?