मुखपृष्ठ
Bookmark and Share
डर के आगे क्या है PDF Print E-mail
User Rating: / 1
PoorBest 
Thursday, 16 January 2014 11:36

केपी सिंह

जनसत्ता 16 जनवरी, 2014 : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मीडिया को सलाह दी है कि

हर रोज एक स्टिंग ऑपरेशन किया जाए जिससे अफसरों में डर बना रहे। उनकी सलाह टीवी पर दिखाए जा रहे पेप्सी के एक विज्ञापन से प्रभावित लगती है जिसमें दिखाया जाता है कि डर के आगे जीत है। यह गंभीर चिंतन का विषय है कि क्या डर के आगे हमेशा जीत ही होती है?

 

विज्ञापन असंभव को संभव होता दिखा कर सपने बेचने की एक युक्ति है और राजनीति असंभव को संभव करने की कला। सपने बेचने और करके दिखाने में जमीन-आसमान का अंतर होता है। सपने बेच कर असंभव को संभव कर दिखाने की परिकल्पना हमेशा व्यावहारिक नहीं होती। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि स्टिंग के डर के आगे और क्या-क्या हो सकता है?

डर मनुष्य के जन्म का साक्षी भी है और मृत्यु का रखवाला भी। शायद इसीलिए प्रत्येक मनुष्य जीवन की डगर पर सावधानी ढूंढ़ा करता है। सरकारी कामकाज में डरने और डराने का सिलसिला चलता रहता है। इससे जुड़े हुए पहलुओं के बारे में जानना रोचक होगा।

डर के आगे क्या-क्या हो सकता है यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि डराने वाला कौन है और डरने वाले की फितरत क्या है? डर के आगे का संसार असीमित और अज्ञात संभावनाओं का कल्पना-लोक है, जहां कुछ भी निश्चित नहीं होता, पर इसके बारे में तरह-तरह के कयास लगाए जा सकते हैं। वैसे भी डर के आगे क्या होगा, अगर यह पूरी तरह खुलासा हो जाए तो डर का रहस्य और रोमांच ही जाता रहता है।

अधिकतर लोग जीवन से डर को भगा कर उसे सरल और निष्कंटक बनाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। जिंदगी में चुनौती स्वीकार करना उनका स्वभाव नहीं होता। उनका सारा समय कुछ से माफी मांग लेने और कुछ को माफ कर देने में गुजर जाता है। डर इस प्रकार के लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उनके लिए डर के आगे न जीत है और न हार। उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का संघर्ष उन्हें निडर बना देता है। अरविंद केजरीवाल शायद यह समझने में चूक कर गए कि प्रशासनिक अमले में ऐसे ही निडर लोगों की बहुतायत होती है; डर उनके आसपास तक नहीं फटक सकता! समाज और प्रशासन में दिन-ब-दिन बढ़ता भ्रष्टाचार इसी तथ्य का साक्षी है। जनसाधारण की इस प्रकार की मानसिकता और लचीली कानूनी प्रक्रिया की पृष्ठभूमि में स्टिंग के सहारे भ्रष्टाचार को मिटाने की परिकल्पना रेगिस्तान में नखलिस्तान की अवधारणा से अधिक कुछ भी नहीं है। दिल्ली के मुख्यमंत्री फिर किसे डराने की बात कर रहे हैं?

सरकारी व्यवस्था में एक बहुत छोटा-सा वर्ग ही ऐसे लोगों का होता है, जो लगातार शिकार बन कर भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़ी की गई व्यवस्था को उसकी शक्ति का अहसास कराते रहते हैं। उन्हें कानून की बलि चढ़ा कर व्यवस्था अपनी भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम की कामयाबी का जश्न मनाती रहती है। यही कारण है कि पटवारी, तहसील के प्यादे, पुलिस के सिपाही और दफ्तर के बाबू की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तारी की खबरें प्रतिदिन अखबारों में सुर्खियां बनती रहती हैं।

यह भी हकीकत है कि मनुष्य की जिंदगी की जरूरतें नैतिकता और आदर्शवाद पर कुछ इस प्रकार हावी हो गई हैं कि इन गिरफ्तारियों का अल्पकालिक असर ही होता है। जिन्हें गिरफ्तारी के खतरे को देख कर आंख मूंद लेने की कबूतरी आदत पड़ जाती है, डर उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उनके लिए डर के आगे की जीत या हार कोई मायने नहीं रखती।

लाखों की भीड़ में कभी न पकड़े जाने का भ्रम उन्हें दुस्साहसी बना देता है। यह सोचने का विषय है कि आखिर स्टिंग ऑपरेशन कितनों को पकड़वा सकता है? भ्रष्टाचार की काली कमाई के नब्बे प्रतिशत से अधिक हिस्से को हजम कर जाने वाला, देश की कुल जनसंख्या का एक प्रतिशत से भी कम, एक ऐसे लोगों का समूह है जो कानून और उसकी व्यवस्था के लिए अछूत हैं। इन्हें छूने की न तो किसी को इजाजत है और न ही किसी में हिम्मत। महिमामंडन के अलावा इनका नाम जुबान पर लाना भी महापाप बन जाता है। ऐसे लोगों के रुतबे का परदा इतना दमदार है कि कोई भी स्टिंग ऑपरेशन उन पर कामयाब नहीं हो सकता। इन्हें न लोकपाल डरा सकता है और न ही लोकायुक्त। इन्हें डर नहीं लगता, क्योंकि इनके डर के आगे भी जीत है और पीछे भी। इनका कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि व्यवस्था के निगहबान इनके सिपहसालार होते हैं।

भ्रष्टाचार-विरोधी तंत्र इनकी ही दी हुई सांसों को गिनता है। आदर्श स्थिति में भ्रष्टाचार को जड़मूल से समाप्त करने की मुहिम इन्हीं लोगों से शुरू की जानी चाहिए।

अपना काम ईमानदारी से करने वालों के लिए डर के आगे अकर्मण्यता का अंधकार और यथास्थिति का कोहरा छा जाने का खतरा बना रहता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री को यह भलीभांति समझ लेना होगा। पिछले पांच-छह वर्षों की व्यवस्था इसका सटीक उदाहरण प्रस्तुत करती है। केंद्रीय पर्यावरण और वनमंत्री वीरप्पा


मोइली ने इस ओर इशारा भी किया है। उन्होंने विभिन्न परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी में देरी के लिए ‘डर’ को जिम्मेदार बताया है।

डर के कारण न दफ्तर का बाबू फाइल आगे बढ़ाता है न ही प्यादे की रुचि उसे एक मेज से दूसरी मेज तक पहुंचाने में होती है। फिर भला अफसर उस पर दस्तख्त की घुग्गी कैसे बिठाने लगे? निर्णय के अभाव में सारी फाइलें सरकारी मेजों पर धूल फांकती रह जाती हैं। निर्णय नहीं हो पाता, क्योंकि कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता।

‘ढाक के तीन पात’ यह मुहावरा बचपन से पढ़ते आए हैं। यह वास्तविकता है कि ढाक के तीन ही पात होते है। पर डरी हुई व्यवस्था को ढाक के दो ही पात नजर आते हैं। यानी ऊपर से आई फाइल नीचे भेजना और नीचे से आई फाइल ऊपर भेजना। निर्णय लेने का तीसरा पात डर के सामने लुंज-पुंज होकर गायब हो जाता है। अकर्मण्यता की शिकार व्यवस्था कायदे-कानून का ऐसा मकड़जाल बुन देती है कि सब तरफ यथास्थिति का परचम लहराने लगता है।

यथास्थिति हर किसी को अच्छी लगती है, सरकारी तंत्र को भी। अंग्रेजों की दी हुई बाबू-प्रधान व्यवस्था ने यथास्थिति को भुनाने के तौर-तरीकों में भी महारत हासिल कर ली है। विकास का पहिया थम जाने के बाद भी उनकी पूछ और पूजा बरकरार रहती है। यथास्थिति में आम आदमी ही पिसता है। विकास की प्रक्रिया ठहर जाती है, पर व्यवस्था का ढर्रा ज्यों का त्यों चलता रहता है। व्यवस्था तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि बजट में मिले धन को कैसे घुमाना है यह उसे बखूबी आता है। केजरीवाल को इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि पहले से ही अनिर्णय को गले लगा चुका सरकारी अमला कहीं यथास्थिति के लकवे की चपेट में भी न आ जाए। अगर ऐसा हुआ तो उनकी सारी योजनाएं धरी की धरी रह जा सकती हैं।

दुर्भाग्यवश, कुछ इसी प्रकार का वातावरण देश में व्याप्त होता जा रहा है। विकास की सारी परियोजनाएं ठप होने के कगार पर हैं या पहले ही ठप हो चुकी हैं। सबसिडी और अनुदानों के सहारे लोगों को खुश रखने की जुगत कितने दिनों तक चल पाएगी? इसीलिए स्थापित सत्ता के कंगूरे ढह रहे हैं।

नई उम्मीद में लोग लीक से हट कर प्रयोग करने पर मजबूर हैं। शुरुआती दौर में इन प्रयोगों की सफलता के सामने बहुत सारे प्रश्नचिह्न अंकित होना स्वाभाविक है। पर लोगों को कोई और विकल्प भी तो दिखाई नहीं देता।

यथास्थिति के कोहरे को छांटने के लिए समयबद्ध निर्णय लेने के चाबुक को व्यवस्था पर दे मारना होगा। ऐसे में ‘सिटीजन चार्टर’, जो अण्णा आंदोलन का मुख्य बिंदु था महत्त्वपूर्ण हो जाता है। समस्याओं के समयबद्ध निराकरण की व्यवस्था करके भ्रष्टाचार पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।

अरविंद केजरीवाल को एक और बात का ध्यान रखना होगा। सरकारें स्टिंग ऑपरेशन के सहारे नहीं चला करतीं। स्टिंग ऑपरेशन को भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम का हिस्सा बना देने की उनकी अवधारणा मूलत: गलत है। स्टिंग ऑपरेशन अविश्वास पर आधारित युक्ति का परिचायक है। और सरकार चलाने के लिए अविश्वास नहीं, विश्वास की संजीवनी की आवश्यकता होती है।

स्टिंग ऑपरेशन को भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का हिस्सा बनाने के बजाय उसे एक सचेतक की भूमिका में अंगीकार करने में ही भलाई है। चुनाव के दौरान उनकी पार्टी स्वयं स्टिंग ऑपरेशन के पीछे के गंदे खेल का शिकार हो चुकी है। स्टिंग ऑपरेशन के पीछे के इस कटु सत्य को दरगुजर नहीं किया जा सकता।

भ्रष्टाचार के मामलों को अदालत में तर्कसंगत परिणति तक पहुंचाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन के जरिए जुटाए गए संकेतों की नहीं, ठोस कानूनी सबूतों के आधार की जरूरत होती है। स्टिंग ऑपरेशन करने वाले अदालत में कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहेंगे इसमें संदेह है। कानूनी प्रक्रिया में उनके खुद के उलझ जाने का खतरा है। और जो दूसरों को उलझाने में रोजी-रोटी का साधन ढूंढ़ा करते हैं, स्वयं उलझने में विश्वास नहीं रखते।

एक सफल प्रशासक बनने की चाह रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को समझ लेना चाहिए कि डर एक नकारात्मक अवधारणा है। कहते हैं डर के सामने भूत भी नाचता है, पर कितनी देर तक? डर की निरंतरता पर भरोसा नहीं किया जा सकता। और न ही डर को सर्वत्र व्याप्त होने देना चाहिए। भ्रष्टाचार को जड़-मूल से समाप्त करने के लिए सकारात्मक पहल करने की आवश्यकता है। इस पहल में सरकारी अमले की खुद की भागीदारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। सभी जानते हैं कि ऐसा करना आसान नहीं होगा। दशकों पुरानी भ्रष्ट परिपाटी को बदलने में वक्त लगना स्वाभाविक है। नतीजे धीरे-धीरे ही सामने आएंगे। पर डर के बजाय सकारात्मकता को सारथी बना कर आगे बढ़ना बेहतर विकल्प है।

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें-    https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें-      https://twitter.com/Jansatta

 

 

 

आपके विचार

 
 

आप की राय

सोनिया गांधी ने आरोप लगाया है कि 'भाजपा के झूठे सपने के जाल में आम जनता फंस गई है' क्या आप उनकी बातों से सहमत हैं?