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सावधान रैली से मायावती ने साधे कई निशाने PDF Print E-mail
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Thursday, 16 January 2014 10:39

अंबरीश कुमार

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने बुधवार को फिर अपनी वह जमीनी ताकत दिखाई, जिसके लिए वे मशहूर हैं। छोटे-मोटे राज्य में जितने वोटों से सरकार बन जाती है, उससे ज्यादा लोग मायावती की लखनऊ रैली में मौजूद थे। यह हवा-हवाई राजनीति करने वालों के लिए संकेत भी है और संदेश भी।

 

मायावती आज भी दलितों की सबसे बड़ी नेता हैं और उन्हें दलितों की राजनीति में कोई दूर तक चुनौती देने वाला दिखता भी नहीं। आज जिस मैदान में बसपा ने रैली की उसे भर पाना सिर्फ मायावती के ही बस का है। बावजूद इसके मुख्यधारा के किसी भी बड़े चैनल ने देश की इस सबसे बड़ी रैली का सीधा प्रसारण नहीं किया। वे किसी ‘बिन्नी’ में व्यस्त थे। यह मीडिया का वह चरित्र है जिसे लेकर क्षेत्रीय दल सवाल उठाते रहते हैं और आज मायावती ने भी उठाया। मायावती की रैली में भारी भीड़ आई और उन्होंने अपने काडर को उभरती हुई नई राजनीति से सावधान भी किया, खासकर दलित के सवाल पर। उन्होंने केजरीवाल का नाम लेकर हरियाणा का उदाहरण दिया और वहां पर दलितों से होने वाले भेदभाव का हवाला भी दिया। दिल्ली के चुनाव में ‘आप’ ने बसपा का जिस तरह वोट काटा, उससे मायावती भी सावधान हुई हैं।

मायावती बहुत ही सामान्य भाषा में अपने काडर से संवाद करती हैं और वह उनकी बात को सिर माथे लेता है। मायावती ने आज की रैली से मुख्य रूप से तीन-चार संदेश देने का प्रयास किया है। पहला संदेश प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार को कई मोर्चे पर नाकाम बताना तो दूसरा मोदी पर हमला करके मुसलिम मतदाताओं को रिझाना था। इसके बाद मायावती के खुद के सुशासन का हवाला था तो अंतिम संदेश आप पार्टी से काडर को सावधान करना था, ताकि लोकसभा चुनाव में वे किसी लहर में न बह जाएं।

उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद मुसलिम समुदाय आक्रोश में है और इसे लेकर अब तक कांग्रेस उन्हें अपनी ओर खींचने के प्रयास में थी, पर कामयाब नहीं हो पाई। अब मायावती मुसलिम बिरादरी को संदेश दे रही हैं कि


उनके राज में ही मुसलमान सुरक्षित था। सपा के राज्य में तो आए दिन दंगे हो रहे हैं।

इसी से जुड़ा कानून व्यवस्था का मुद्दा भी उन्होंने पूरी ताकत के साथ आज उठाया और राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग दोहराई। मायावती की दिक्कत यह है कि दलित वोट का बड़ा हिस्सा साथ होने के बावजूद अगड़ी जातियों का कोई हिस्सा उनके साथ नहीं खड़ा हो पा रहा है जिससे लोकसभा चुनाव में किसी बड़ी जीत का समीकरण बन नहीं पा रहा है। पर जहां सपा और बसपा अठारह बीस फीसद से अपनी चुनावी राजनीति शुरू करती हैं, वही भाजपा कांग्रेस की यह शुरुआत पांच-सात फीसद से होती है। इसीलिए सपा, बसपा मीडिया की किसी हवा के बावजूद अपनी ताकत दर्शाती हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भी मीडिया का बड़ा हिस्सा सपा को सत्ता की राजनीति से बाहर किए हुए था तो उससे पहले के चुनाव में मायावती के सत्ता में लौटने की आहट किसी को सुनाई नहीं पड़ रही थी। ऐसे में मीडिया के आकलन से उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझना मुश्किल है। मायावती की आज की सावधान रैली से यह तो साफ हो गया कि उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव में बसपा एक बड़ी ताकत के रूप में ही सामने आएगी। शहरी वोटों के एक हिस्से को छोड़ दें तो अब भी गांव-कस्बे की राजनीति में जाति की गोलबंदी फिलहाल टूटने नहीं जा रही है और उनका राजनैतिक व्यवहार वैसा ही रहेगा, जैसा पिछले चुनाव में था। वैसे भी जब शुचिता की दुहाई देने वाली आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास अपने को ब्राह्मण चाणक्य का वंशज बता रहे हों तो दलित-पिछड़ों से जातिविहीन समाज की अपेक्षा रखना उचित नहीं है। ऐसे में पंद्रह-बीस लाख दालितों का जमावड़ा बदलाव का क्या राजनैतिक संदेश दे रहा है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है।

 

 

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