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प्रवासियों में अपने पराए PDF Print E-mail
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Wednesday, 15 January 2014 11:27

अभिषेक कुमार सिंह

जनसत्ता 15 जनवरी, 2014 : गांधीजी की दक्षिण अफ्रीका से भारत वापसी के दिन

9 जनवरी 1915 का तारीखी महत्त्व बताने के लिए अपने देश में जो प्रवासी भारतीय सम्मेलन वर्ष की शुरुआत में हर साल होता है, वह इस बार भी हुआ। सऊदी अरब में निताकत कानून की मार और ब्रिटेन-अमेरिका में आव्रजन कानूनों में सख्ती के प्रावधान की खबरों के बीच उम्मीद थी कि प्रवासियों भारतीयों को उनके कष्टों से निजात दिलाने का कोई एलान इस सम्मेलन में हमारी सरकार करेगी, लेकिन वहां तो नजारा ही उलटा था। सम्मेलन में प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्री वायलार रवि ने साफ कर दिया कि यह सम्मेलन प्रवासी मजदूरों या विदेश में काम कर रहे भारतीय घरेलू कामगारों के मुद्दों के लिए नहीं है और इसमें सिर्फ आम मुद्दों की चर्चा की जाएगी। गांधीजी के रहते ये आम मुद्दे निश्चित ही प्रवास पर गए भारतीय श्रमिकों के हित होते, लेकिन हैरानी की बात है कि हर साल अरबों डॉलर रकम घर भेजने के बावजूद इन कामगारों के हितों की चर्चा तक करना हमारी सरकार ने इस सम्मेलन में उचित नहीं समझा।

 

इसका संदेश साफ है- सरकार को गरीब श्रमिक के पैसे से तो मतलब है, लेकिन हित उसे सिर्फ अमीर प्रवासी या ऊंचे ओहदेदार के दिखाई देते हैं। भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की स्वदेश वापसी के लिए हमारी सरकार कोई भी जतन नहीं छोड़ती और इस मुद्दे वह अमेरिका से भिड़ सकती है, लेकिन विदेशों में घरेलू नौकरों के उत्पीड़न की खबरें उसे विचलित नहीं करतीं।

पिछले कुछ अरसे में प्रवासी मजदूरों के साथ क्या कुछ नहीं हुआ है! विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर पहले तो देश में ही सैकड़ों-हजारों लोग ठगे जाते हैं। कबूतरबाजी के शिकार इन्हीं लोगों में से कुछ जब किसी तरह विदेश पहुंच जाते हैं, तो वहां उनके रोजगार से लेकर जिंदगी तक का कोई ठिकाना नहीं होता। खाड़ी देशों से तो घरेलू कामगारों और निर्माण मजदूरों के शोषण की अंतहीन कहानियां आती रही हैं। प्लेसमेंट एजेंसियों के लोग वहां पहुंचे मजदूरों से मारपीट करते हैं, उनके पासपोर्ट छीन लेते हैं और इसके बाद भी अगर किसी तरह ये मजदूर कोई काम पाने में कामयाब रहे, तो निताकत जैसे कड़े श्रमिक कानून उनकी नौकरी में आड़े आते रहते हैं। वहां कामगारों के हक, काम करने के घंटे, छुट्टी में स्वदेश जाने के इंतजाम और अवकाश पर कहीं कोई सुनवाई नहीं है।

इसी बीच भारतीय कामगारों के साथ मारपीट और बंधक बना कर रखे गए श्रमिकों की क्रूर तरीके से हत्या तक की खबरें आती रही हैं, पर हमारी सरकार के कानों पर जूं तक न रेंगी। एक युवा विधवा अपने तीन बच्चों के साथ किस तरह खाड़ी के एक मुल्क से पति का शव वापस लाने के लिए सात महीने से संघर्ष कर रही है यह किस्सा भी हाल में चर्चा में था। उसका पति बनाई जा रही एक इमारत की छत से गिर कर मर गया था, लेकिन हाल तक उसका शव वापस स्वदेश लाने में किसी ने उस युवा विधवा की कोई मदद नहीं की। ऐसे किस्से तमाम प्रवासी भारतीय श्रमिकों के साथ जुड़े हैं।

सूचनाधिकार के जरिए हासिल की गई एक जानकारी के मुताबिक भारत से एक सौ बारह देशों में कामगार जाते हैं, जिनमें से 6635 प्रवासी कामगार विदेशी जेलों में इस वक्त बंद हैं (यह जानकारी ‘माइग्रेंट्स राइट्स काउंसिल ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष पी नारायण स्वामी ने जुटाई है)। हमारी सरकार न तो इन कैदियों की तरफ ध्यान दे रही है और न ही उसे दूसरे गरीब प्रवासियों की कोई चिंता है। इससे लगता है कि सरकार को फिक्र सिर्फ प्रवासियों से मिलने वाले पैसे की है, उनके हितों से उसका कोई सरोकार नहीं है।

प्रवासी भारतीयों से देश को मिलने वाला पैसा देश की अर्थव्यवस्था में कितनी जान फूंकता है, इसके अंदाजे के लिए विश्व बैंक द्वारा पिछले साल जारी किया गया आंकड़ा ही काफी है। विदेश में बसे भारतीयों ने 2013 में कुल इकहत्तर अरब डॉलर की पूंजी भारत भेजी, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। उल्लेखनीय है कि एक साल की अवधि में किसी अन्य विकासशील देश को बाहर गए अपने नागरिकों से इतनी बड़ी रकम हासिल नहीं हुई है। यही नहीं, इससे पिछले साल यानी 2012 में भी भारत को अनिवासी भारतीयों के जरिए उनहत्तर अरब डॉलर हासिल हुए थे और उस वक्त भी यह एक रिकॉर्ड था।

उल्लेखनीय यह भी है कि विदेशों में बसे भारतीय यह रकम तमाम विपरीत हालात के बावजूद घर भेजते रहे हैं, चाहे उन पर मुसीबतों के कितने ही पहाड़ क्यों न टूटे पड़ रहे हों। हमारी सरकार भी इसके लिए प्रयासरत दिखाई देती है कि यह रकम किसी तरह घर आती रहे।

गए साल सेंट पीट्सबर्ग में जी-20 की बैठक में भाग लेने पहुंचे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह चिंता जताई थी कि आइटी पेशेवरों और इंजीनियरों के एक देश से दूसरे देश में जाने की आजादी पर पाबंदी से वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर दम तोड़ सकती है। उन्होंने जुमला वैश्विक अर्थव्यवस्था के संबंध में इस्तेमाल किया था, लेकिन उनकी चिंता शायद देश की अर्थव्यवस्था की ही थी, जो प्रवासियों से पैसे नहीं मिलने की सूरत में डांवांडोल हो सकती है।

प्रवासी भारतीय श्रमिकों की समस्या दो मोर्चों पर


है। एक तरफ खाड़ी देशों में काम करने गए वे मजदूर हैं जिनके पास न तो कायदे की कोई पेशेवर डिग्री होती है और न ही विदेश में प्रवास के कोई वैध दस्तावेज होते हैं। कबूतरबाजी की मदद से यानी प्लेसमेंट एजेंसियों के फर्जीवाड़े से इनमें से जो कुछ मजदूर खाड़ी मुल्कों में पहुंच जाते हैं, वे वहां मिलने वाले दीनार या रियाल के सहारे कुछ ठीक-ठाक गुजारा करते हैं और बचाई गई रकम भेज कर अपने घर वालों और सरकार तक की मदद करते रहे हैं। कुछ वक्त से उनके लिए भी हालात मुश्किल हुए हैं। सऊदी अरब में पिछले साल अप्रैल में लागू किए गए श्रम कानून ‘निताकत’ ने ऐसे श्रमिकों के लिए दो ही विकल्प छोड़े- या तो वे किसी तरह अपने लिए वैध दस्तावेजों का इंतजाम करें या स्वदेश लौट जाएं।

तब से हजारों श्रमिक स्वदेश लौट चुके हैं और जो बचे हैं उनके सामने भी अब वहां रहने की कोई ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। इसकी वजह है हाल में सऊदी अरब द्वारा एक नए कानून का प्रस्ताव। इसके मुताबिक, अब वहां वैध डिग्री और वैध दस्तावेजों के साथ बाहर से काम करने आए पेशेवर भी अधिकतम आठ साल तक काम कर सकेंगे। अरब न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर यह प्रस्ताव कानून की शक्ल लेता है तो प्रस्तावित व्यवस्था के तहत पत्नी और दो बच्चों के साथ रहने वाले विदेशी कर्मचारी को दो विदेशी कर्मचारियों के तौर पर गिना जाएगा और इस आधार पर उन्हें वहां निवास के वर्षों के मुताबिक कुछ अंक दिए जाएंगे। ये अंक प्रवासियों की वहां रहने की मियाद तय करेंगे। ऐसे में कोई पेशवर या कामगार वहां कितने वक्त तक टिका रह सकता है, यह सऊदी सरकार पर निर्भर करेगा।

जाहिर है, ये तब्दीलियां स्थानीय निवासियों के लिए रोजगार के ज्यादा मौके मुहैया कराने के सिलसिले में सऊदी अरब की सरकार कर रही है। ऐसी ही स्थितियां दूसरे मुल्कों में भी बन रही हैं, जो समस्याओं का दूसरा मोर्चा है। जैसे, ब्रिटेन में हुआ एक सर्वेक्षण बताता है कि वहां के सतहत्तर फीसद नागरिक चाहते हैं कि देश में आप्रवासियों की संख्या में भारी कटौती की जाए। अगले साल ब्रिटेन में होने वाले चुनावों के मद््देनजर वहां आप्रवासन विरोधी यूके इंडिपेंडेंट पार्टी (यूकेआइपी) इस मुद््दे पर मौजूदा सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी के सामने एक चुनौती पेश कर सकती है।

ब्रिटेन की तरह अमेरिका में भी अब हवा बदल चुकी है। बराक ओबामा तो अरसे से अमेरिका में संरक्षणवादी कानून लागू करके वहां का कामकाज बाहर भेजने और कम वेतन और अधिक श्रम से काम करने वाले भारतीय युवाओं को अपने यहां आने से रोकने के उपाय करते रहे हैं।

आइटी और बीपीओ सेक्टर में चीन, श्रीलंका, फिलीपींस, मलेशिया, मिस्र, मोरक्को, चिली, ब्राजील, मैक्सिको, कोलंबिया, आयरलैंड और पोलैंड जैसे देश भी भारतीय मेधा को चुनौती देने की हैसियत में आ गए हैं। इन स्थितियों में भारत जैसे मुल्कों के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है, जहां से युवा पेशेवर रोजगार के लिए बड़ी संख्या में विदेशों का रुख करते हैं। पर इन सारी मुश्किलों को लेकर अभी हमारी सरकार कतई फिक्रमंद नजर नहीं आ रही है। पर हमारी सरकार को अब इन चुनौतियों के लिए कमर कसनी ही होगी। इसकी एक अहम वजह रोजगार बाजार की बदलती स्थितियां हैं।

असल में, अभी तक रोजगार के लिए यूरोप-अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में जाने वाले आइटी पेशेवरों और इंजीनियरों की नौकरी और अन्य हित सुरक्षित माने जाते थे, लेकिन वैश्विक मंदी ने उनके रोजगारों पर भी असर डाला है। उधर, खाड़ी के मुल्कों में स्थानीय श्रम कानूनों में हो रहे फेरबदल के साथ वहां के रोजगारों पर अब स्थानीय लोग दावा करने लगे हैं।

इन दोनों ही हालात में भारत जैसे आबादीबहुल देश की समस्याएं बढ़ सकती हैं क्योंकि इसका असर दुतरफा होगा। एक तो हमारे पढ़े-लिखे युवाओं को बाहरी मुल्कों में काम मिलना बंद होने की दशा में देश में ही उन्हें रोजगार दिलाने में भारी रकम खर्च करनी पड़ेगी। दूसरे, प्रवासियों से हर साल मिलने वाली विदेशी मुद्रा में भारी गिरावट आ सकती है। इससे हमारी अर्थव्यवस्था पर काफी गहरा असर पड़ सकता है।

लेकिन आश्चर्य है कि अभी हमारी सरकार इस विषय में चिंतित नहीं दिखाई देती। कायदे से उसे विदेशों में नए रोजगार बाजारों की तलाश करते हुए कुशल युवा पेशेवरों के वैध आप्रवासन के उपाय और बाहर गए कामगारों के हितों को सुरक्षित बनाने के लिए ठोस उपाय करने चाहिए। जैसे, वह कबूतरबाजी यानी अवैध आप्रवासन के तौर-तरीकों की रोकथाम करते हुए बाहर जाने वाली युवाओं की कुशलता और दस्तावेजों की जांच की पुख्ता व्यवस्था बनाए और अगर उन युवाओं को विदेशों में कामकाज के दौरान कोई समस्या आती है, तो उसके तुरंत निपटारे का इंतजाम करे। ध्यान रखना होगा कि भारत युवाओं की विशाल आबादी वाला देश है। उनके रोजगार की उचित व्यवस्था और भविष्य को सही दिशा देकर ही अब देश आगे बढ़ सकता है, अन्यथा नहीं।

 

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