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भ्रष्टाचार की जासूसी PDF Print E-mail
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Tuesday, 14 January 2014 11:47

नीरज कुमार

जनसत्ता 14 जनवरी, 2014 : दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने प्रशासन में फैले भ्रष्टाचार को

सिरे से खत्म करने के लिए एक कदम उठाया है। भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम के घोड़े पर सवार होकर सत्ता हासिल करने वाली आम आदमी की सरकार ने एक चैनल पर दिल्ली जल बोर्ड में कैमरे पर घूस लेते अफसरों को निलंबित करने के बाद घूसखोरी से हलकान लोगों से कहा है कि अब वे घूसखोर अफसरों और बाबुओं के स्टिंग (खुफिया कैमरे से रिकॉर्डिंग) करें और सरकार को मुहैया कराएं। सरकार ऐसे मामलों में दोषियों को बख्शेगी नहीं। अभी तक टीवी न्यूज चैनल ऐसे स्टिंग करते थे। अब सरकार खुद कह रही है लोगों से स्टिंग करने को।

 

लेकिन बात यहीं पर नहीं रुकी। सरकार एक कदम आगे बढ़ गई है। एक खास हेल्पलाइन नंबर भी दिया गया है। इस हेल्पलाइन नंबर पर आपकी समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि अफसरों की एक टीम यह बताएगी कि स्टिंग कैसे कीजिए ताकि आरोपी को पकड़ा जा सके। सरकार की सतर्कता टीम सबूत मिलने के बाद मामले को आगे बढ़ाएगी। अब आपको सिर्फ करना यह है कि बाजार में घड़ी, बटन, कलम और न जाने कहां-कहां लगाए जाने वाले तमाम खुफिया कैमरों में एक को अपनी हैसियत के हिसाब से खरीद लीजिए। बस आप बन गए जासूस और शुरू हो जाइए।

मुझे 1990 के दशक का एक टीवी शो याद आ रहा है ‘मैं भी डिटेक्टिव’, जिसके होस्ट होते थे फिल्म निर्माता साजिद खान। सिर्फ नाम में थोड़ी तब्दीली करने का मन हो रहा है- ‘हम सब डिटेक्टिव’, प्रोड्यूसर- आम आदमी पार्टी।

निजी टीवी चैनलों के आने से पहले यानी साठ-सत्तर और अस्सी के दशक में खबरों के लिहाज से दूरदर्शन की हालत तब भी आज जैसी ही थी। उस वक्त अखबारों में छपे हर्फ मायने रखते थे और उनका असर होता था। तब अखबारों में एक्सक्लूसिव या स्पेशल रिपोर्ट छपा करती थीं जिन्हें ‘स्कूप’ कहा जाता था। धीरे-धीरे इन एक्सक्लूसिव या विशेष रिपोर्टों या ‘स्कूप’ का चेहरा बदला और इनके लिए नया जुमला इस्तेमाल होने लगा - इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म यानी खोजी पत्रकारिता। कहीं पर कोई गड़बड़ी या किसी नेता या मशहूर शख्सियत की निजी जिंदगी के ऐसे पहलू का खुलासा, जिसके सामने आने पर भूचाल आ जाए। खोजी पत्रकारिता के इस दौर में अखबारों और पत्रिकाओं में छपी कई खबरों से कई ताकतवर नेताओं को अपनी कुर्सियां छोड़नी पड़ीं, सरकारें हिल गर्इं।

निजी चैनलों के आने के बाद यही खोजी पत्रकारिता ‘स्टिंग’ में तब्दील हो गई। ऐसे स्टिंग की शुरुआत तहलका ने की। पहला स्टिंग ही इतना तगड़ा रहा कि तब केंद्र में सत्ताधारी राजग की अगुआई कर रही भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष को इस्तीफा देना पड़ा और उनकी राजनीति का सूरज दोपहर में ही अस्त हो गया। स्टिंग टीवी चैनलों का एक नया औजार था जिसे कुछ हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगे तो कुछ खिलौने की तरह खेलने लगे। कई ऐसे स्टिंग हुए जिन्होंने हड़कंप मचा दिया। चाहे वह ‘आॅपरेशन घूसमहल’ (दिल्ली के बिक्री कर कार्यालय में खुलेआम रिश्वत लेते अफसर) हों या फिर दिल्ली के बीएमडब्ल्यू कांड में वकीलों की मिलीभगत का स्टिंग या पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने वाले सांसदों का स्टिंग।

कई बिक्री कर अधिकारी निलंबित हुए और बीएमडब्ल्यू स्टिंग में वकील को अपनी वरिष्ठता गंवानी पड़ी और कुछ सांसदों की सांसदी चली गई। लेकिन इसी दौर में ऐसे स्टिंग भी हुए जो आत्मघाती साबित हुए, जिनसे खुद चैनलों और स्टिंग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए। दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका पर हुआ स्टिंग इसकी मिसाल है। यही नहीं, कुछ बिल्डरों और चिटफंड मालिकों के कुकुरमुत्तों की तरह उग आए तथाकथित समाचार चैनलों ने इन स्टिंग ऑपरेशनों का इस्तेमाल उगाही और भयादोहन के लिए भी किया।

अरविंद केजरीवाल सरकार का स्टिंग कराने का यह फैसला लोगों को भा रहा है। माना जा रहा है कि इससे भ्रष्टाचार खत्म हो न हो, लगाम जरूर लगेगी। शायद यह उम्मीद सही हो। लेकिन एक लोकतांत्रिक सरकार की इस पहल ने तमाम सवालों को भी जन्म दिया है। पहला सवाल तो यही है कि कोई स्टिंग फर्जी और दुर्भावना से प्रेरित नहीं होगा इसकी क्या गारंटी? दूसरे, अगर कोई शख्स भ्रष्टाचार से परेशान हो लेकिन स्टिंग कर पाने में सक्षम न हो तो उसकी मदद कैसे की जाएगी? इसके साथ-साथ कानूनी पहलू तो हैं ही कि इन स्टिंग आॅपरेशनों की सच्चाई कैसे साबित होगी, ये स्टिंग अदालत में कितने खरे उतरेंगे, इन स्टिंग के फुटेज से छेड़छाड़ या फर्जीवाड़े के आरोपों से कैसे निपटा जाएगा। यही नहीं, इन स्टिंग ऑपरेशनों की जांच कौन करेगा? क्या सरकार के पास ऐसा तंत्र है? यह माहौल शायद ईमानदारों को भी ईमानदारी से काम करने से रोके।

कहावत है कि मार के आगे भूत भी भागता है। लेकिन अपराध के मामलों में यह कहावत शायद खरी नहीं उतरती। क्या कानून और स्टिंग का खौफ भ्रष्टाचार को खत्म कर देगा या कम करेगा? क्या हकीकत ऐसी है? दिसंबर 2012 में दिल्ली में निर्भया कांड के बाद लगातार प्रदर्शनों का दौर जारी रहा। जन-आक्रोश के दबाव में सरकार ने आनन-फानन में कानून में बदलाव किया और यौनहिंसा से जुड़े कानून को और कड़ा बना दिया गया।

बलात्कार के दोषी को फांसी और ताउम्र जेल की सजा का प्रावधान कर दिया गया, जो पहले नहीं था। निर्भया मामले में त्वरित अदालत ने नौ महीने में सजा सुना दी। दोषी नाबालिग को छोड़ बाकी चार दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई। लेकिन कड़े कानून या


इस सजा के डर से क्या बलात्कार कम हो गए? सच्चाई तो ये है कि दिल्ली में ही निर्भया कांड के बाद भी बलात्कार या वहशियाना बलात्कार के मामलों में कोई कमी नहीं आई। हत्या के मामलों में तो शुरू से ही फांसी या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है, लेकिन क्या हत्या के अपराध बंद हो गए?

जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी किताब ‘1984’ में ऐसे समाज की कल्पना की थी जहां हर शख्स की हर गतिविधि सरकार की खुफिया निगाह में थी। ‘बिग ब्रदर इज वॉचिंग यू’ वाला इसी किताब का जुमला खूब चला था। बीती सदी के साठ-सत्तर और अस्सी के दशक मेंसाम्यवादी देशों का नजारा इससे काफी कुछ मिलता-जुलता था। उस समय यह काम राष्ट्रवाद के नाम पर सरकारें करती थीं और इसे निजी आजादी में घुसपैठ और लोकतंत्र पर हमला माना जाता था। ऐसे में भ्रष्टाचार को रोकने के नाम पर इस तरह की खुफियागीरी किस तरह का हमला होगी? मामला थोड़ा अलग है, लेकिन विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के ‘स्नूपगेट’ का विरोध करने वाले क्या खुद वैसी ही संस्कृति को मान्यता नहीं दे रहे? मकसद भले अलग रहा हो लेकिन कृत्य तो एक जैसा है।

सवाल यह भी है कि क्या घूस लेना ही भ्रष्टाचार है? घूस देना नहीं? दिल्ली जल बोर्ड में किए गए एक चैनल के स्टिंग में एक अधिकारी को यह कहते सुना गया कि पानी के मीटर के लिए उन्होंने रिश्वत दी। काम कराने या जल्दी कराने के लिए दिया गया पैसा क्या भ्रष्टाचार नहीं है? इसे कैसे रोका जाएगा और यह कैसे तय होगा कि जो पैसा दिया गया वह काम कराने के लिए था या काम जल्दी कराने के लिए? और तो और, अभी तक बात सिर्फ सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार की हो रही है। बाहर जो भ्रष्टाचार हो रहा है उससे कैसे निपटा जाएगा?

अधिकतम विक्रय मूल्य से ज्यादा पर बेचना क्या भ्रष्टाचार नहीं है? ऑटो वालों का मीटर से न चलना क्या भ्रष्टाचार नहीं है? यह सही है कि इन ऑटोवालों को पुलिस और सवारियों दोनों के हाथों अक्सर जलालत झेलनी पड़ती है। लेकिन क्या इसके बदले उन्हें मीटर से न चलने का हक मिल जाता है?

सवाल इससे आगे भी हैं। कहते हैं भ्रष्टाचार धुएं की तरह नहीं बल्कि झरने की तरह होता है, यानी नीचे से ऊपर को नहीं बल्कि ऊपर से नीचे आता है। ऐसे में ऊपर बैठे शख्स का काम सिर्फ यह नहीं कि वह खुद ईमानदार रहे। उसका कर्तव्य यह भी है कि वह अपने नीचे भी इसे रोके। तो केजरीवाल सरकार की यह जिम्मेदारी है और इस मामले में वह सिर्फ जनता के भरोसे न बैठे, बल्कि खुद भी नजर रखे, वरना मनमोहन सिंह में क्या खराबी! कोशिश यह होनी चाहिए कि आदमी का आदमी पर भरोसा बढ़े, लेकिन यहां तो उलटा ही हो रहा है। संदेश यही जा रहा है कि सामने वाला हर शख्स बेईमान है, उसे शक की नजर से देखो और उसे सलाखों के पीछे भिजवाने की तैयारी में लगे रहो।

सरकार की इस मुहिम से क्या खुद को भी बदलने का संदेश निकल कर आ रहा है? सड़क पर यातायात कानून का उल्लंघन करने पर कितने लोग बिना बहस किए जुर्माना भरते हैं और रसीद लेते हैं? बमुश्किल दो-तीन फीसद, नहीं तो पहली कोशिश रौब दिखा कर पुलिस वाले को दबाने की होती है।

यह दांव चल गया तो ठीक, नहीं तो कुछ ले-देकर मामला रफा-दफा करने की बात होती है। गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल पर बात करने का जुर्माना दो हजार रुपए है, लेकिन ऐसा करते हुए पकड़े जाने पर पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि रेड लाइट जंपिंग या सीट बेल्ट न लगाने की पर्ची काटो ताकि दो हजार के बजाय मामला दो सौ में ही खत्म हो जाए।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की सबसे ईमानदार देशों की सूची में डेनमार्क और न्यूजीलैंड पहले पायदान पर हैं। इसके बाद फिनलैंड, स्वीडन और नार्वे का नंबर है। इंग्लैंड चौदहवें नंबर पर तो अमेरिका उन्नीसवें नंबर पर है। भारत का नंबर चौरानबेवां है। चीन भी भारत से आगे, अस्सीवें नंबर पर है। 2007 के बाद से भारत अब तक बाईस पायदान नीचे फिसल चुका है। भारत समेत इन सब देशों में करीब-करीब एक जैसे कानून हैं। एक सच्चाई यह भी है कि भारत के संविधान में इन सब देशों के संविधान या संवैधानिक परंपराओं की कुछ न कुछ अच्छी बातें ली गई हैं। तो क्या वजह है कि ईमानदारी या भ्रष्टाचार-नियंत्रण के मामले में हम इन देशों के पासंग भी नहीं आते?

साफ है कि चाहे ‘घूसमहल’, ‘वकील’ या ‘सांसदों’ वाले स्टिंग हों या कड़े कानून, ऐसी तरकीबों से व्यवस्था नहीं बदली जा सकती। कामकाज अपने पुराने ढर्रे पर चलता रहता है। कुछ दिनों की सख्ती के बाद २सब कुछ फिर पुरानी पटरी पर लौट आता है। इसकी वजह शायद यह है कि हमें कानून और सजा का डर दिखा कर सुधारने की कोशिश की जा रही है, कानून की इज्जत करना नहीं सिखाया जा रहा। जब तक लोग कानून की इज्जत करना नहीं सीखेंगे, तब तक कोई सरकार कुछ भी कर ले, भ्रष्टाचार से निजात मिलना मुश्किल है।

 

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