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पटेल की प्रतिमा के बहाने PDF Print E-mail
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Monday, 13 January 2014 13:23

सुभाष गाताडे

जनसत्ता 13 जनवरी, 2014 : इधर अमदाबाद की अदालत ने भले ही 2002 के दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी को

क्लीन चिट दे दी हो, मगर उधर एक युवती की चौबीस घंटे निगरानी का मसला जोर पकड़ता दिख रहा है। केंद्र सरकार ने इस मामले की जांच का एलान कर दिया है। चूंकि इस निगरानी में कर्नाटक को भी शामिल किए जाने के सबूत सामने आए हैं, लिहाजा उनके हिमायतियों की यह बात भी हल्की पड़ती दिख रही है कि इसमें केंद्र सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

 

बहरहाल, असली मुसीबत शायद उनके ड्रीम प्रोजेक्ट ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ यानी दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति के तौर पर घोषित की गई सरदार पटेल की प्रस्तावित मूर्ति के बहाने आई है। बीते पंद्रह दिसंबर को जब देश के पांच सौ से अधिक स्थानों से ‘रन फॉर यूनिटी’ कार्यक्रम का आयोजन हुआ था, उसके अगले ही रोज एक टीवी चैनल ने इस परियोजना की सफलता के लिए अपनाए जा रहे हथकंडों को उजागर करते हुए एक रिपोर्ट दिखाई थी। गुजरात के जामनगर इलाके के भनवड के कॉमर्स कॉलेज के छात्रों को उद्धृत करते हुए इस रिपोर्ट में बताया गया था कि किस तरह उन्हें निर्देश दिया गया था कि ‘रन फॉर यूनिटी’ में शामिल होना पड़ेगा। मगर जब छात्र शामिल नहीं हो सके, तब प्रशासन की तरफ से उनके खिलाफ नोटिस जारी किया गया और कहा गया कि सौ रुपया प्रतिव्यक्ति जुर्माना देना पड़ेगा, यहां तक छात्रों को धमकाया गया कि उन्हें इम्तिहान में बैठने नहीं दिया जाएगा। इस खबर को लेकर इतना हंगामा मचा कि कॉलेज को चुपचाप उस नोटिस को वापस लेना पड़ा।

यह प्रस्तावित मूर्ति अमेरिका स्थित स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी होगी और रियो डि जेनेरियो स्थित ईसा की मूर्ति से चार गुना लंबी। इस विशालकाय मूर्ति के निर्माण और आसपास के इलाके में निर्माण के काम का ठेका अमेरिका की टर्नर कन्स्ट्रक्शन को दिया गया है, जिसने दुबई में बुर्ज खलीफा जैसी विशाल बनाई है और न्यूयार्क में यांकी स्टेडियम का निर्माण किया है। इस परियोजना के लिए अनुमानत: पचीस सौ करोड़ रुपए की राशि लगने का अनुमान है, यहां तक कि टर्नर कंपनी की कन्स्लटेंन्सी फीस ही इकसठ करोड़ रुपए के आसपास होगी। इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि सरदार पटेल एक किसान परिवार से थे, विशेष जोर किसानों पर ही पर दिया जाएगा और उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया जाएगा कि पचीस हजार टन लोहे से बन रही इस मूर्ति के निर्माण में वे भी लोहे का योगदान दें।

वे सभी जो संघ परिवारी संगठनों की गतिविधियों से वाकिफ हैं, बता सकते हैं कि दो दशक पहले इसी किस्म की एक व्यापक मुहिम चलाई गई थी। पांच सौ साल पुरानी बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर के निर्माण में योगदान देने के लिए लोगों से र्इंटें इकट्ठा की गई थीं। आज की तारीख में ये तमाम र्इंटें हिंदुत्ववादी संगठनों के गोदामों में पड़ी हैं। राम मंदिर निर्माण की इस मुहिम की परिणति बाबरी मस्जिद के ध्वंस और सांप्रदायिक दंगों में हुई थी। तब से अरसा बीत चुका है। सरदार पटेल की यह मूर्ति साधु बेट नामक स्थान पर स्थित होगी, जो सरदार सरोवर बांध से लगभग तीन किलोमीटर दूर है। एक सौ बयासी मीटर ऊंचाई वाली यह मूर्ति दुनिया में सबसे ऊंची मूर्तियों में शुमार होगी। इस परियोजना मिल्कियत गुजरात सरकार द्वारा समर्थित ‘सरदार पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट’ के पास होगी। इस स्मारक के पास सरदार पटेल के जीवन से जुड़े पहलुओं पर बना संग्रहालय और एक शोध केंद्र भी होगा। गौरतलब है कि जनतंत्र का प्रहरी कहलाने वाले मीडिया ने इस समूची परियोजना की छानबीन करने की जरूरत महसूस नहीं की है और न ही इस बात की पड़ताल की है कि इसके ‘सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव’ किस तरह के होंगे।

मीडिया के मौन को समझना कठिन नहीं है। जैसे-जैसे भ्रष्टाचार के तमाम मामलों और बढ़ती महंगाई के चलते कांग्रेस की वैधता संकट में फंसती दिख रही है और वह कॉरपोरेट सेक्टर और धनी तबकों के लिए जरूरी मसलों पर अपनी वजहों से आनाकानी करती दिख रही है, संपन्नों और पूंजीशाहों के बीच से एक ‘निर्णायक’ नेतृत्व की मांग जोर पकड़ रही है और मोदी की कॉरपोरेटपरस्त छवि उनके लिए बेहद अनुकूल है। दरअसल, काफी समय से कॉरपोरेट जगत का एक खासा हिस्सा ‘प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी’ की मुहिम से खुल कर जुड़ा दिखता है। उनके लिए 2002 की वे घटनाएं महज एक विवरण का हिस्सा हैं!

वैसे मुख्यधारा मीडिया के मौन ने उन लोगों और कार्यकर्ताओं को खामोश नहीं किया है, जो आम जनों की बेहतरी और उनके सम्मान की हिफाजत के लिए लगातार संघर्ष करते आए हैं। उनका कहना है कि ‘न केवल नरेंद्र मोदी, जिन्होंने ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ की आधारशिला रखी, बल्कि उनका सचिवालय भी, प्रस्तावित परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी मिली है या नहीं, इस बारे में अनभिज्ञ दिखते हैं या स्पष्टत: कुछ कहना नहीं चाहते हैं।’ इन लोगों ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को इस संबंध में पत्र लिखा है।

इस समूह द्वारा केंद्र सरकार के पर्यावरण सचिव को सात नवंबर को भेजे गए पत्र में लिखी मुख्य बातों को उद्धृत करना समीचीन होगा जिसमें इस परियोजना की विस्तृत पर्यावरणीय पड़ताल की मांग उठाई गई थी। ज्ञापन के मुताबिक, सरदार सरोवर बांध के पास, शूलपनेश्वर अभयारण्य से महज 3.2 किलोमीटर की दूरी पर, पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील इलाके में सरदार पटेल की विशालकाय मूर्ति का निर्माण किया जा रहा है।


कानूनी तौर पर आवश्यक पर्यावरणीय मंजूरी लिए बगैर इस काम की शुरुआत की गई है। उनके मुताबिक यह परियोजना पूरी तरह गैर-कानूनी है। यह 1986 में बने पर्यावरणीय सुरक्षा अधिनियम और सितंबर 2006 में जारी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अधिसूचना का उल्लंघन करती है और नदी के किनारे इस किस्म के विशाल निर्माण को लेकर जारी अदालती आदेशों की भी अवहेलना करती है।

इस परियोजना के लिए सितंबर 2006 की पर्यावरणीय प्रभाव अधिसूचना के तहत पर्यावरणीय मंजूरी की जरूरत है, मगर कहीं भी उसे पाने की या उसके लिए आवेदन करने की प्रक्रिया नहीं चलाई गई है। शूलपनेश्वर अभयारण्य की सीमा सरदार सरोवर जलाशय को छूती है। चूंकि यह मूर्ति सरदार सरोवर बांध से मुश्किल से 3.2 किलोमीटर दूर है, वह शूलपनेश्वर अभयारण्य से भी नजदीक है। परियोजना के लिए नदी के बीच में निर्माण करना पड़ेगा और प्रस्तावित जलाशय भी पर्यावरण के प्रति संवेदनशील इलाके के करीब है, जिसका पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इस परियोजना का नदी के निचले हिस्से पर, उसकी जैव विविधता और लोगों के जीवनयापन पर प्रभाव पड़ेगा। सरदार सरोवर बांध के निर्माण के दिनों में ही मजबूत चट्टानों में खदान कार्य के चलते, इलाके की भूस्थिरता को लेकर पहले ही काफी सवाल उठ चुके हैं, जिन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता।

इन चालीस अग्रणी बुद्धिजीवियों, संस्कृतिकर्मियों, पर्यावरणीय कार्यकर्ताओं ने पर्यावरण मंत्रालय से यह मांग की है कि गुजरात सरकार को यह आदेश दिया जाए कि वह परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी हासिल करने के लिए आवेदन दे और जब तक वह हासिल नहीं होता है तब तक परियोजना से संबंधित काम न करे।

वैसे अपने आप को पटेल का वारिस घोषित करने की मोदी की हड़बड़ाहट में कई सारे ऐसे सवाल छिपे हैं, जो खुद मोदी और संघ परिवार के लिए बेहद असुविधाजनक हो सकते हैं।

दुनिया सरदार वल्लभभाई पटेल को एक ऐसे शख्स के तौर पर जानती है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या हिंदू महासभा की वास्तविकता से और उनकी घृणा की राजनीति से बखूबी परिचित थे। यह अकारण नहीं कि गांधी की हत्या के महज चार दिन बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने वाला आदेश जारी हुआ (तब वल्लभभाई पटेल गृहमंत्री थे), जिसमें लिखा था: ‘‘संघ के सदस्यों की तरफ से अवांछित यहां तक कि खतरनाक गतिविधियों को अंजाम दिया गया है। यह देखा गया है कि देश के तमाम हिस्सों में संघ के सदस्य हिंसक कार्रवाइयों में- जिनमें आगजनी, डकैती और हत्याएं शामिल हैं- मुब्तिला रहे हैं और वे अवैध ढंग से हथियार और विस्फोटक भी जमा करते रहे हैं।’’

इस विरोधाभास पर गौर करें। मोदी के इस ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ पर मीडिया या तो चुप्पी साधे रखी है या उसे महिमामंडित किया है। याद करें, मायावती के मुख्यमंत्रित्व-काल में दलित महापुरुषों की मूर्तियां स्थापित करने को लेकर मीडिया का स्वर किस हद तक आलोचना से भरा हुआ था। अखबारों या टीवी स्टूडियो में प्रतिष्ठित तमाम बौद्धिक जन बार-बार इसी बात को दोहराते रहते थे कि इन मूर्तियों पर खर्च करने के बजाय अगर वे रोड बनाने, स्कूलों और अस्पतालों के निर्माण पर जोर देतीं तो प्रदेश का कल्याण होता। अपनी खुद की मूर्ति का अनावरण करने के लिए मायावती का मजाक उड़ाने वाला यही मीडिया इसमें पैसे की बरबादी देख रहा था। मायावती के विरोधियों के लिए ये पार्क और मूर्तियां ‘अनुत्पादक परिसंपत्ति’ में शुमार थे। फिर, एक व्यक्तिविशेष की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए इतने बड़े पैमाने पर हो रहे व्यय (जो अनुमान है कि मायावती सरकार द्वारा व्यय की गई राशि से पांच गुना होगा) और पर्यावरणीय क्षति आदि को लेकर मीडिया क्यों मौन है। जबकि गुजरात के मानव विकास सूचकांक सहारा-अफ्रीका के कई मुल्कों की तरह ही औसत से कम दर्जे के हैं।

सत्ताईस फरवरी, 1948 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे अपने खत में पटेल लिखते हैं: ‘सावरकर की अगुआई वाली हिंदू महासभा के अतिवादी हिस्से ने ही हत्या के इस षड्यंत्र को अंजाम दिया है ...जाहिर है उनकी हत्या का स्वागत संघ और हिंदू महासभा के लोगों ने किया, जो उनके चिंतन और उनकी नीतियों की मुखालफत करते थे।’ वही पटेल 18 जुलाई, 1948 को हिंदू महासभा के नेता और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता और समर्थन से भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखते हैं: ‘...हमारी रिपोर्टें इस बात को पुष्ट करती हैं कि इन दो संगठनों की गतिविधियों के चलते खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चलते, मुल्क में एक ऐसा वातावरण बना जिसमें ऐसी त्रासदी (गांधीजी की हत्या) मुमकिन हो सकी।

मेरे मन में इस बात के प्रति तनिक संदेह नहीं कि इस षड्यंत्र में हिंदू महासभा का अतिवादी हिस्सा शामिल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। हमारी रिपोर्ट इस बात को पुष्ट करती है कि पाबंदी के बावजूद उनमें कमी नहीं आई है। दरअसल, जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, संघ के कार्यकर्ता अधिक दुस्साहसी हो रहे हैं और अधिकाधिक तौर पर तोड़फोड़/ विद्रोही कार्रवाइयों में लगे हैं।’

अब यह मुमकिन है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति वल्लभभाई पटेल के विचारों से नरेंद्र मोदी सहमत हुए हों! ऐसा है तो उन्हें इसबारे में उन्हें साफ बोलना चाहिए।

 

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