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संस्कृति की राजनीति PDF Print E-mail
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Wednesday, 08 January 2014 11:41

सोनल शर्मा

जनसत्ता 8 जनवरी, 2014 : कुछ दिन पहले धारा 377 पर आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जहां

धार्मिक प्रतिनिधि अपनी जीत के रूप में देख रहे हैं और समलैंगिक संबंधों के अप्राकृतिक और गैर-भारतीय होने की बात को दोहरा रहे हैं, वहीं कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इस फैसले को मानवाधिकारों के लिए एक बड़ा धक्का मान रहे हैं।

 

समलैंगिकता का मुद्दा प्राकृतिक-अप्राकृतिक होने से बहुत आगे निकल गया है और जो लोग आज भी इसे इस नजरिए से देखते हैं वे न केवल इस बहस के संग अन्याय करते हैं, बल्कि अपने ज्ञान के अभाव का प्रमाण देते हैं। उदाहरण के लिए संयुक्त राष्ट्र और इसकी एजेंसी, विश्व स्वास्थ्य संगठन इस मुद्दे को मानवाधिकार और स्वास्थ्य के अधिकार की दृष्टि से देखते हैं और सरकारों से इसके प्रति संवेदनशीलता की उम्मीद करते हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने पहले ही दिशा-निर्देश जारी कर दिया है कि मनोचिकित्सक समलैंगिकता को एक विकृति के रूप में न देखें। इसके अलावा पिछले साल ही इंडियन जर्नल ऑफ  साइकियेट्री ने भी ‘भारत में समलैंगिकता’ शीर्षक अपने संपादकीय के माध्यम से समलैंगिकता को एक विकृति न मानते हुए इस बहस पर पूर्ण विराम लगा दिया।

कुछ लोग इस मुद्दे को भारतीय संस्कृति और इतिहास से जोड़ कर देखते हैं। संस्कृति को समलैंगिक अधिकारों से जोड़ कर देखने वालों में इन अधिकारों के विरोधी ही नहीं, बल्कि इनके कई समर्थक भी शामिल हैं। संस्कृति और समलैंगिकता की बहस इस बात तक सीमित रहती है कि भारतीय इतिहास में समलैंगिकता का उल्लेख है या नहीं, और अगर है तो कैसा? ऐसे लोगों के लिए यह जान लेना जरूरी है कि संस्कृति हमेशा इतिहास में नहीं होती। संस्कृति वर्तमान और भविष्य में भी उतनी ही रची-बसी होती है जितनी कि इतिहास में। असल में जो लोग संस्कृति को केवल इतहास में ढूंढते हैं वे यह भूल जाते हैं कि हम किस प्रकार रोज के रहने-सहने के तरीके से संस्कृति को बनाते और नए-नए रूप देते हैं, वे भूल जाते हैं कि संस्कृति हमें नहीं, बल्कि हम संस्कृति को बनाते हैं और संस्कृति अपने आप में कोई पत्थर में गढ़ी लकीर नहीं है।

इंटरनेट पर अपनी ही जाति या समुदाय के वर या वधू देखने वाले किसी व्यक्ति से पूछिएगा कि उनके जमाने में कैसे विवाह हुआ करते थे? एक समय था जब विवाह से पहले लड़का और लड़की एक दूसरे की शक्ल भी नहीं देखते थे, पर आज ऐसा नहीं है। क्यों? समय के साथ-साथ संस्कृति भी बदली है। असल में संस्कृति और समाज पर इस प्रकार का दृष्टिकोण इसलिए जरूरी है, क्योंकि समलैंगिकता ही नहीं, बल्कि अन्य कई मुद्दों के संदर्भ में संस्कृति को एक ऐसी गाय के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसे संरक्षण की जरूरत है।

असल में धारा 377 से जुड़ी बहस पर समलैंगिक अधिकारों से कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण दांव पर है जो आसानी से बाबाओं और राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा रचे ‘प्रकृति’ और ‘संस्कृति’ के जाल में खो सकता है। मुद््दा न केवल यौनिकता की स्वतंत्रता का है, बल्कि समाज का हिस्सा बने रहते हुए अपनी व्यक्तिगत पहचान बनाए रखने और हमारे अपने शरीरों पर अपना हक  बनाए रखने का है। दूसरे शब्दों में, लड़ाई अलग बने रहने की है खासकर तब जब सामाजिक मान्यताएं इस हक  को नकारती हैं। कई बार समाज के ठेकेदार ऐसे हकों को नकार कर हममें से कई के लिए दर्द की सिसकियों को डर से भरी खामोशियों में बदलते हैं।

यौनिकता के अधिकार की लड़ाई देश के अलग-अलग हिस्सों में जाति के नियमों के खिलाफ जाकर प्रेम करने वाले जोड़ों से बहुत अलग नहीं है, जो ऐसा करके गांव की ‘संस्कृति’ और इसके ठेकेदारों के लिए खतरा पैदा करते हैं। निस्संदेह, ऐसे प्रेमी जोड़ों और समलैंगिकों के संघर्ष कई स्तरों पर एक दूसरे से अलग भी हैं, पर एक समानता जो इन दो तरह की स्थितियों में है वह यह कि किस प्रकार दोनों संस्कृति के लिए खतरे के रूप में देखे जाते हैं। पर संस्कृति जो कई लोगों के अपनी निजी जिंदगी के फैसलों से इस प्रकार प्रभावित हो सकती हैं और उनके निजी फैसलों के लिए उन्हें दंडित कर सकती है, क्या वह वास्तव में सबकी संस्कृति हो सकती है? शायद नहीं।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि संस्कृति की अपनी राजनीति होती है, जो एक वर्ग विशेष के हितों को सिद्ध करती है। कई बार संस्कृति के नाम पर हममें से कइयों के खिलाफ हिंसा भी होती है। उदाहरण के लिए, क्या संस्कृति की दुहाई देते हुए खाप पंचायतें एक ही गोत्र में विवाह करने वाले प्रेमी जोड़ों के खिलाफ तुगलकी फरमान नहीं सुनातीं? संस्कृति की ही आड़ में धर्मगुरु महिलाओं को यह बताते हैं कि वे क्या पहनें और क्या न पहनें। क्या खुद को इसी संस्कृति का रखवाला मानने वाली श्रीराम सेना ने कुछ साल पहले मैंगलोर में पब से बाहर निकलने वाली महिलाओं की सरेआम पिटाई नहीं की थी? असल में संस्कृति और इतिहास में अधिकारों की वैधता को तलाशने वाले यह भूल जाते हैं कि अधिकारों के मूल्यांकन के इस तरीके से तो वर्तमान समय में


कई ऐसे समूह (उदाहरण के लिए दलित और महिलाएं) हैं जो अपने अधिकार खो बैठेंगे, खासकर वे अधिकार जो संविधान उन्हें देता है।

वे लोग जो समलैंगिक और ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों की वैधता-अवैधता को भारतीय संस्कृति से जोड़ कर देखते हैं, न केवल एक प्रकार के संस्कृतिबहुमतवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि यह एक बेहद संकीर्ण नजरिए को दिखाता है, जो आने वाले कल और आज के बजाय अतीत में जीता है। वे जान लें कि महाभारत में शिखंडी का होना, न होना या खजुराहो के मंदिरों पर समलैंगिक समभोग गतिविधियों का चित्रण आज के समय में समलैंगिक अधिकारों का पैमाना नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा कोई भी प्रयास एक समुदाय विशेष के सांस्कृतिक आधिपत्य को जनमानस में पुनर्स्थापित करेगा। ऐसा करने के दुष्परिणाम केवल समलैंगिकों के लिए नहीं, बल्कि समूचे समाज के लिए होंगे। असल में इशारा उन तथाकथित प्रगतिशील लेखकों की ओर भी है जिन्होंने, संस्कृति का सहारा लेते हुए, समलैंगिकता के समर्थन में संभलते हुए लेख लिखे और कई स्थानों पर समलैंगिक संबंधों के संभावित ‘प्रादुर्भाव’ का ध्यानपूर्वक मूल्यांकन करने की भी हिदायत दे दी।

ऐसे तर्क यह संकेत देते प्रतीत होते हैं जैसे कि समलैंगिक अभी समाज के बाहर कहीं हैं और समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर देने पर समलैंगिक संबंधों और समलैंगिकों की बाढ़-सी आ जाएगी। मगर गौर करने पर यह पता चलेगा कि समलैंगिक लोग हमारे आसपास ही हैं: वे हमारे घरों, दफ्तरों, फिल्मों, चुटकुलों में हैं। वे हमारे मित्र, परिवार के सदस्य, बच्चे, और अभिभावक भी हैं। वे कभी मजाक का तो कभी चिंता का विषय हैं। हम कई बार उन्हें पहचान पाते हैं और कभी नहीं। वे कभी खुल कर एक आजाद जिंदगी जीते हैं और कभी सामाजिक भय में आकर एक ‘सामान्य’ जीवन व्यतीत करते हैं। असल में वे हममें से किसी भी दूसरे व्यक्ति जितने ‘सामान्य’ हैं और ठीक उतने ही अजीब जितना कि हममें से कोई भी हो सकता है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संस्कृति के लिए हम सबके दिल में एक-सी जगह नहीं होती और संस्कृति में हम सबकी एक जैसी जगह होती है। कभी देश के किसी बड़े मंदिर के उत्सव में अपनी जाति की वजह से देवी का रथ खींचने वाले व्यक्ति से पूछिएगा कि उसके लिए उस उत्सव क्या महत्त्व है। हो सकता है, अगर आप उसकी नजर से देखने की कोशिश करें तो उत्सव के रंगों में और कुछ भी नजर आ जाए। अंत में एक सवाल जो पूछना जरूरी है वह यह कि संस्कृति का मुंह ताकने वाले किस संस्कृति की बात करते हैं? क्या इस संस्कृति में नगालैंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की संस्कृति भी शामिल है? क्योंकि अगर संस्कृति का संरक्षण इतना ही आवश्यक है तो क्यों सरदार सरोवर बांध से बर्बाद होने वाले गांवों की संस्कृति के संरक्षण के लिए कोलाहल नहीं मचता? क्यों विकास के नाम पर उनके विरोध के बावजूद उनके पेड़, मिट्टी, नदियां, जो उनकी संस्कृति है, उनसे छीन ली जाती है? सबकी संस्कृति वेदों और मंदिरों और गिरजाघरों में हो, ऐसा जरूरी तो नहीं है?

असल में संस्कृति के आधार पर किए जाने वाले दावे इसलिए चिंता का विषय हैं, क्योंकि वे एक साझा सांस्कृतिक विरासत और एक साझा अनुभव पर जोर डालते हैं, जो एक धोखा है। साझा अनुभव का यह भ्रम बहिष्कार, अन्याय, हिंसा और घृणा की संस्कृति पर पर्दा डालता है। यह हमें मजबूर करता है कि हम भूल जाएं कि वैमनस्य की संस्कृति के अलावा प्यार, न्याय और समानता की भी एक संस्कृति होती है। संस्कृति को सिर्फ भारतीयता, प्रकृति और इतिहास की नजर से देखना न केवल इसमें निहित शक्ति को छिपाता है, बल्कि कई बार इसके खिलाफ हमारे जरूरी प्रतिरोध को कमजोर करता है। हमें एक दूसरे को संस्कृति की दृष्टि से नहीं, बल्कि संस्कृति को एक दूसरे की नजर से देखने की जरूरत है, तभी हम एक दूसरे के अनुभव के प्रति संवेदनशील हो पाएंगे और संस्कृति के सही मायने समझ पाएंगे।

सवाल यह नहीं है कि हमें संस्कृति चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि हमें किस तरह की संस्कृति चाहिए। और हम सबकी जिंदगियों में इस संस्कृति के क्या मायने हैं? इसके साथ-साथ हमें यह भी समझना चाहिए कि यह असमानता और दमन पर फलने-फूलने वाली संस्कृति नहीं हो सकती, क्योंकि इस प्रकार की संस्कृति हम सबकी नहीं होती। यह एक ऐसी संस्कृति भी नहीं हो सकती, जो प्यार करने वालों और उनकी आजादी से डरे और जिसकी नींव नफरत में हो, क्योंकि ऐसी संस्कृतियां कमजोर ही नहीं, आत्मघाती भी होती हैं। चुनाव हमें करना है। हम चाहें तो संस्कृति के इस आत्मघाती स्वरूप के बारूद पर बैठे रह सकते हैं या इसे बदल सकते हैं ताकि यह हमारे ह्रास का नहीं, बल्कि पोषण का स्रोत बनी रहे।

 

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