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राष्ट्रपति से की गर्इं सिफारिशें निराधार : ए के गांगुली PDF Print E-mail
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Wednesday, 08 January 2014 11:33

कोलकाता। न्यायमूर्ति (सेवा निवृत्त) अशोक कुमार गांगुली ने मंगलवार को कहा कि उन्होंने अतिरिक्त विवाद खत्म करने के लिए पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया है और जिस आधार पर केंद्र ने राष्ट्रपति को उनके खिलाफ सिफारिश की है वह टिकने वाला नहीं है और मिथ्याधारित है।

मंगलवार को यहां जारी एक सरकारी बयान में बताया गया कि न्यायमूर्ति गांगुली ने आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की बात रखते हुए सोमवार को राज्यपाल को एक चिट्ठी सौंपी थी। राज्यपाल ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफे को मंजूरी दे दी।

 

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश गांगुली प्रशिक्षु वकील की ओर से लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की वजह से पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए गहरे दबाव में थे। अपने इस्तीफे में 66 साल के न्यायमूर्ति ने अपने खिलाफ लगे आरोपों का खंडन किया है। उन्होंने कहा- मैं जोर दे कर कहना चाहूंगा कि इलेक्ट्रानिक और प्रिंट दोनों मीडिया में मेरे खिलाफ जो आरोप लग रहे हैं वे बेबुनियाद हैं और मैं उनसे इनकार करते हूं।

समिति ने गांगुली को प्रशिक्षु वकील के लिखित व मौखिक बयान के आधार पर दोषी ठहराया था। पैनल ने पाया था कि ली मैरीडियन होटल के कमरे में पिछले साल 24 दिसंबर को न्यायाधीश का लड़की के साथ किया गया व्यवहार ‘अस्वीकार्य बर्ताव की श्रेणी (यौन प्रकृति वाला अस्वीकार्य मौखिक-अमौखिक बर्ताव) में आता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन सेवानिवृत्त न्यायाधीश के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की मांग करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पत्र लिखा था।

न्यायमूर्ति गांगुलीने अपने पत्र में कहा- जब तक मैं गरिमा और सम्मान से काम नहीं कर सकता मुझे किसी पद से लगाव नहीं है और मैं समझता हूं कि मौजूदा हालात में यह संभव नहीं है। इसलिए इस पत्र को मानवाधिकार रक्षा अधिनियम, 1993 की धारा 23(1) के तहत नोटिस के रूप में लिया जाए। उन्होंने अपने


पत्र में कहा- बहरहाल, मैं यह स्पष्ट करता हूं कि अपने किसी भी निंदक के प्रति कोई तल्खी नहीं हैं और मैं उन्हें जीवन में शुभकामनाएं देता हूं।

उन्होंने प्रशिक्षु वकील के आरोपों को नकारते हुए खुद यह आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल में उनके द्वारा लिए गए कुछ  फैसलों की वजह से ‘कुछ ताकतवर निहित स्वार्थी तत्व’ उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति गांगुली सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के हिस्सा थे जिसने टू जी आबंटन घोटाले में कई आदेश दिए थे जिनमें केंद्र की ओर से दूरसंचार कंपनियों को दिए गए 112 लाईसेंस को खारिज करना भी शामिल है। पिछले महीने प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम को लिखे पत्र में उन्होंने कहा था कि उन्होंने प्रशिक्षु वकील का कभी उत्पीड़न नहीं किया और न ही उससे या किसी अन्य महिला प्रशिक्षु से अवांछित व्यवहार किया था।

पश्चिम बंगाल राज्य मानवाधिकार आयोग के सूत्रों के अनुसार वे मंगलवार को अपने दफ्तर नहीं गए। उन्होंने सुबह अपने दफ्तर में फोन किया और कर्मचारी से कहा कि वे  आज कार्यालय नहीं आएंगे।

पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने कहा कि न्यायमूर्ति गांगुली को बिना किसी सबूत या जांच के इस्तीफा देना पड़ा। हमारी कानून प्रणाली में जबतक व्यक्ति दोषी साबित नहीं हो जाता तब तक वह निर्दोष है। लेकिन इस मामले में उनकी उचित सुनवाई नहीं हुई। हालांकि पश्चिम बंगाल के सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस ने पूर्व न्यायाधीश के इस्तीफे का स्वागत किया। तृणमूल सांसद और वकील कल्याण बनर्जी ने कहा कि इस्तीफा देकर न्यायमूर्ति गांगुली ने अपनी प्रतिष्ठा का और नुकसान होने से बचा लिया।

(भाषा)

 

 

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