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Tuesday, 07 January 2014 11:29

अंजुम शर्मा

जनसत्ता 7 जनवरी, 2014 : अंतत: प्रधानमंत्री की आवाज सुनाई दी। लेकिन क्या वाकई यह देश के मुखिया का स्वर था?

बचपन से सुनता आ रहा हूं कि चुप्पा प्रवृत्ति का व्यक्ति जब बोलता है तो दूर तक चोट करता है। ‘सौ सुनार की एक लुहार की’ कहावत चरितार्थ हो जाती है। लेकिन देश के वर्तमान प्रधानमंत्री ने कहावत पलट कर रख दी। साढ़े नौ साल के कार्यकाल में उनके मौन से देश खीझता चला गया लेकिन वे हमेशा चुप्पी की सीढ़ियां चढ़ते रहे।

 

प्रधानमंत्री द्वारा अपनी खामोशी के पक्ष में पढ़ा गया शेह्णर हमेशा याद किया जाएगा- ‘हजार जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी/ न जाने कितने सवालों की आबरू रक्खी।’ प्रधानमंत्री अब तक यह समझ नहीं पाए कि चुप्पी हर दफा सवालों की आबरू नहीं रख सकती। प्रत्येक सवाल और स्थिति पर मौन धारण करना आपकी छवि और व्यक्तित्व को नकारात्मक बनाता है। उनका मौन धीरे-धीरे संवादहीनता में बदलता चला गया। संवादहीनता उनकी मजबूरी हो सकती है लेकिन संवादहीनता शून्यता को जन्म देने में देर नहीं लगाती। इसलिए राजनीति की परिभाषा में संवाद की बड़ी अहम भूमिका होती है। संवाद की यही शक्ति अरविंद केजरीवाल की नवोदित पार्टी के लिए ब्रह्मास्त्र साबित हुई और उसका नतीजा दिल्ली के चुनाव परिणाम से लेकर रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण समारोह में सबने देखा।

यह तीसरा मौका था जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संवाददाता सम्मलेन के माध्यम से जनता को संबोधित कर रहे थे। हालांकि उसमें देश के नाम संबोधन जैसा कुछ नहीं था। सबको उम्मीद थी कि कम-अज-कम अब तो प्रधानमंत्री खुल कर सवालों के जवाब देंगे लेकिन पार्टी की हदबंदी ने एक बार फिर उनका गला खुलने नहीं दिया और हर बार की तरह वे देश के मुखिया की जगह दल के नेता के रूप में बोलते नजर आए। साफ  दिख रहा था कि कुछ वाक्यों को बार-बार दोहराने को वे मजबूर हैं। इसलिए उनके मौन रहने और बोलने में कोई बड़ी बात नजर नहीं आई, सिवाय इस घोषणा के कि 2014 में वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होंगे।

पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी में उन्हें सुरक्षित भविष्य नजर आता है। लेकिन वर्तमान अगर भविष्य से बिना तर्क किए अपने ऊपर हावी होने दे तो दोनों की समझ पर सवाल उठना लाजिमी है। कितनी अजीब बात है कि प्रधानमंत्री जिन्हें चुप रहना पसंद है, वे एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का योग्य उम्मीदवार मानते हैं जिसे कहीं भी कुछ भी बोलना पसंद है। यह कैसी योग्यता है जो हर बार नाटकीय अंदाज में सामने आती है। क्यों कांग्रेस कभी किसी ऐसे व्यक्ति की उम्मीदवारी पेश नहीं करती जो जरूरत पड़ने पर सटीक और तार्किक बात करता हो। वर्तमान प्रधानमंत्री से लेकर भविष्य के उम्मीदवार तक, कभी ऐसा नहीं लगा कि कांग्रेस के लिए प्रधानमंत्री पद पद कोई गंभीर चीज हो।

वर्ष 2004 में मनमोहन सिंह ने एक गंभीर, गैर-राजनीतिक और ईमानदार छवि वाले व्यक्ति के रूप में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। हालांकि आज भी व्यक्तिगत रूप से उनके ऊपर कोई आरोप नहीं है लेकिन वे एक ऐसी सरकार के सारथी हैं जिस पर लगातार भ्रष्टाचार से लेकर लचर नीति निर्माण के आरोप लगते रहे। लग रहा था कि संवाददाता सम्मलेन में 2004 की अपेक्षा 2014 की अपनी तस्वीर और भ्रष्टाचार के सवालों पर वे बेबाकी से जवाब देंगे। लेकिन वे ज्यादातर सवालों के एक जैसे घुमावदार जवाब देते नजर आए। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि संवाददाताओं में आपसी सहयोग की कमी के चलते कुछ सवाल बार-बार प्रधानमंत्री के जवाब की तरह दोहराए जा रहे थे। लेकिन सवालों के दोहराव के चलते प्रधानमंत्री के जवाबों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चूंकि प्रधानमंत्री कभी-कभार और हमेशा दबाव में बोलते हैं इसलिए वे जो बात कहना चाहते हैं वह कभी-कभी संप्रेषित नहीं कर पाते।

अगर प्रधानमंत्री ने साढ़े नौ वर्ष के कार्यकाल में राजनीतिक व्याकरण पर थोड़ा भी काम किया होता तो ऐसा कभी न कहते कि भ्रष्टाचार के ज्यादातर मामले यूपीए के पहले कार्यकाल में देखने को मिले थे लेकिन जनता ने पुन: यूपीए में विश्वास दिखाया और हम सत्ता में लौटे। प्रधानमंत्री को लगता है कि 2-जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले की कालिख को जनता ने बहुमत देकर धो दिया। लेकिन बहुमत हासिल करने से दाग नहीं धुलते। अगर ऐसा होता तो नरेंद्र मोदी गुजरात दंगों के बाद तीन बार सरकार बनाने में सफल रहे लेकिन आज भी कांग्रेस उन्हें नरसंहार का आरोपी मानती है। शायद प्रधानमंत्री के लिए भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। इसीलिए उन्हें और यूपीए के मंत्रियों को चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार का कारण भ्रष्टाचार नहीं महंगाई और उसे रोकने में नाकामी नजर आई।

पूरी प्रेस वार्ता के बाद लगा कि यह सम्मलेन नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने, अपने उम्मीदवार न होने की घोषणा करने और यूपीए की उपलब्धियों को पुन: गिनवाने के लिए करवाया गया था। केवल मोदी पर वार करते वक्त प्रधानमंत्री की आवाज और चेहरे पर थोड़े विश्वास की झलक दिखाई पड़ी थी। अन्यथा पूरे सम्मलेन में भाषा, शैली, आत्मविश्वास, कहीं से भी ऐसा नहीं लगा कि किसी देश का प्रधानमंत्री संबोधित कर रहा है। अच्छा होता कि सभी सवालों के जवाब उसी सटीकता से दिए जाते जिस सटीकता से मोदी संबंधी सवाल को साधा गया था।

गुजरात में कत्ल-ए-आम


का जिक्र करना मनमोहन सिंह शायद पार्टी लाइन के कारण नहीं भूले और न ही पिछले साढ़े नौ वर्ष की उपलब्धियां गिनाने में उन्होंने कोई कसर छोड़ी। उनकी नजर में यूपीए सरकार सफल रही है और ऊंची विकास दर हासिल करने से लेकर विभिन्न सामाजिक परियोजनाएं लागू करने का कार्य बड़े स्तर पर उनकी सरकार ने किया है। यह अलग बात है कि परियाजनाओं की पहुंच पर उठते सवालों और उनमें फैले भ्रष्टाचार पर प्रधानमंत्री देश के अवाम के सामने बोलने के बजाय पार्टी के भीतर बोलना ज्यादा जरूरी समझते हैं। इसीलिए हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप पर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि अरुण जेटली की चिट्ठी में दिमाग लगाने का उन्हें वक्त नहीं मिला।

एक अर्थशास्त्री के कार्यकाल में आर्थिक मोर्चे पर सरकार विफल नजर आई लेकिन प्रधानमंत्री ऐसा नहीं मानते। अपने कार्यकाल में 7.7 प्रतिशत की रिकार्ड विकास दर को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर माना। लेकिन चालू वर्ष में इसके पांच प्रतिशत से नीचे रहने के लिए उन्होंने वैश्विक आर्थिक संकट को दोषी ठहराया। यूपीए की एफडीआइ नीति एक फ्लॉप शो साबित हुई और चालू वित्तवर्ष में उसमें पंद्रह प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली। प्रधानमंत्री केवल यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

देश जानना चाहता है कि एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री क्यों आर्थिक नीतियों पर ठोस निर्णय लेने में पिछले कुछ वर्षों में असहाय रहा। पूर्वोत्तर राज्यों में परियोजनाएं ठीक से लागू नहीं हो रहीं, यह सब जानते हैं लेकिन लोग उनके कारणों को मुखिया के मुख से सुनना चाहते थे। माओवादियों को सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बताने वाले प्रधानमंत्री माओवाद प्रभावित इलाकों से जुड़ी योजनाओं पर एक भी शब्द बोलते नहीं दिखे यह आश्चर्य की बात है। सिख दंगा-पीड़ितों को न्याय दिलाने के अपने वायदे के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब प्रधानमंत्री राजनीतिक आश्वासन की तरह न देकर अगर देश के जिम्मेदार मुखिया के रूप में देते तो देश यह जान पाता कि वे उस वायदे का क्या अर्थ समझते हैं।

सोनिया गांधी ने कई बार उन्हें कठिन परिस्थितियों से निकाला है ऐसा मनमोहन सिंह ने खुद कहा, इसीलिए वे सत्ता के दो केंद्र होना गलत नहीं मानते। लेकिन देश को कठिन परिस्थितियों से निकालते समय क्यों उन्हें शेह्णर याद आने लगता है- ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी/ यूं ही कोई बेवफा नहीं होता’- इसका जवाब भी देश को देना चाहिए था। मनमोहन सिंह कहते हैं कि जब उन्होंने सत्ता संभाली तब कांग्रेस की छवि थी कि वह गठबंधन की सरकार नहीं चला सकती लेकिन हमने दो कार्यकाल पूरे किए। यानी कांग्रेस को चिंता केवल कार्यकाल पूरा कर गठबंधन संबंधी अपनी छवि सुधारने की थी जो उसने सुधार ली। बाकी मुद्दों या व्यक्तिगत छवि से उसका कोई सरोकार नहीं है। क्या इसीलिए प्रधानमंत्री ने इतने विश्वास के साथ कहा कि 2014 में यूपीए की ही सरकार बनेगी क्योंकि गठबंधन के गणित में अब कांग्रेस सिद्धहस्त हो चुकी है।

प्रधानमंत्री के साथ दिक्क्त यह है कि वे सत्ता के दो केंद्र होने के कारण फंस जाते हैं इसलिए उनसे कुछ साफ  बोलते नहीं बनता। आश्चर्य होता है कि वे अपने नेतृत्व के मूल्यांकन का अधिकार जनता के बजाय इतिहासकारों को देना चाहते हैं। लोकतंत्र में जनता का स्वर कोई भी इतिहास नहीं नकार सकता। लोकतांत्रिक देश का मुखिया होने के बावजूद प्रधानमंत्री को देश की जनता की उनके प्रति नाराजगी सुनाई नहीं देती। उन्हें लगता है मीडिया, विपक्ष और कैग ने उनके साथ न्याय नहीं किया। उनकी छवि कमजोर प्रधानमंत्री की नहीं है, वे खुद को सफल प्रधानमंत्री मानते हैं। उन्होंने वह सबकुछ किया जो उनके वश में था।

ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह को चिंता यादगार प्रधानमंत्रियों की सूची में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज करवाने की है। इसीलिए बार-बार वे बोलते नजर आए कि इतिहास उन्हें उनके बेहतर कामों के लिए याद रखेगा। प्रधानमंत्री शायद भूल गए कि इतिहास के पन्नों में असहनीय धार होती है। राजनीतिक इतिहास पलट कर देखेंगे तो पता चलेगा कि एक गलती सौ अच्छे कामों पर भारी पड़ती है। इतिहास बड़ा निर्दयी होता है, किसी को नहीं बख्शता। प्रधानमंत्री तो फिर ऐसे रथ पर सवार हैं जिसका एक पहिया भ्रष्टाचार, एक महंगाई, एक बेरोजगारी और एक निर्णयहीनता में धंसा है। वे सारथी जरूर हैं लेकिन लगाम उनके हाथ में नहीं है।

फिर वे कैसे कह सकते हैं कि इतिहास उन्हें अच्छे कामों के लिए याद रखेगा। अतिरिक्त महत्त्व पा गए एक अर्थशास्त्री की छवि को इतिहासकार भी ज्यों का त्यों प्रधानमंत्री की छवि पर चस्पां नहीं कर सकते। 1990 के आर्थिक संकट से उबारने में निस्संदेह मनमोहन सिंह को एक अर्थशात्री और वित्तमंत्री के तौर पर याद किया जाएगा, लेकिन वही वित्तमंत्री जब अपनी चुप्पी, गठबंधन की मजबूरियों, लचर नीतियों के साथ तीसरे सबसे लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री के रूप में सामने आएगा तो इतिहासकार भी स्वर्णाक्षरों का प्रयोग नहीं कर सकेंगे।

 

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