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Friday, 03 January 2014 11:47

कुमार प्रशांत

जनसत्ता 3 जनवरी, 2014 : बीमार मुख्यमंत्री की अल्पमत ‘आप’ सरकार ने काम करना शुरू कर दिया है!

भारतीय जनता पार्टी के जिन लोगों ने सरकार बनाने की हिम्मत नहीं की और आप वालों को ललकारते रहे कि हिम्मत है तो सरकार बना कर दिखाएं, वे सारे के सारे लोग अब खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाला करतब करते दिखाई दे रहे हैं। त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर उभरने पर सरकार के गठन को लेकर कुछ दिन अनिश्चितता की स्थिति बनी रही। भाजपा को बत्तीस सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण उपराज्यपाल ने सबसे पहले उसी को सरकार बनाने का न्योता दिया था। पर उसने यह कह कर हाथ खड़े कर दिए कि उसके पास बहुमत नहीं है।

 

फिर अरविंद केजरीवाल को उपराज्यपाल ने मौका दिया। केजरीवाल शुरू से कहते आ रहे थे कि वे भाजपा या कांग्रेस की मदद से सरकार नहीं बनाएंगे। लेकिन इन दोनों पार्टियों ने सरकार बनाने के लिए उन्हें घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। घेरने की कवायद में बार-बार कहा गया कि केजरीवाल जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। यह भी ताना कसा गया कि वे मतदाताओं से उन्होंने हवाई वादे किए हैं, इसीलिए सरकार नहीं बनाना चाहते। कांग्रेस और भाजपा की यह साफ रणनीति दिखाई दे रही थी कि अगर दोबारा चुनाव की नौबत आए तो उसका सारा दोष केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर थोप दिया जाए। केजरीवाल ने चुनौती स्वीकार कर ली, तो अब कांग्रेस सांसत में है और भाजपा खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।

हताशा की खीझ क्या होती है इसकी सबसे दयनीय बानगी नितिन गडकरी ने पेश की है। कभी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे और फिर भ्रष्टाचार का आरोप लगने पर निरुपाय होकर हटने वाले नितिन गडकरी किसी पोशीदा होटल में हुई, किसी पोशीदा बैठक की बात करते हैं, जिसमें उनका कहना है कि कांग्रेस और आप की सौदेबाजी हुई। उनका मतलब है कि कुछ काला-सफेद करने की बात हुई। ऐसी चीजों के माहिर गडकरी जब ऐसा कहते हैं तब यह पूछना जरूरी हो जाता है कि भाई, आपको ऐसी सौदेबाजी वाली राजनीति से एतराज है कि ऐसी सौदेबाजी न कर पाने की विफलता का मलाल है? ऐसी डीलें न कर सकने वालों को तो आप लोग राजनीतिज्ञ मानते ही नहीं हैं! तो फिर कहें अरुण जेटली और नरेंद्र मोदी मार्का राजनेता कि आप के आने से राजनीति बदल रही है कि आपकी परिभाषाएं?

यह हैरानी की बात है और अपशकुन सरीखा है कि आप वाले इस आरोप के जवाब में खुल कर देश को बता नहीं पा रहे हैं कि मामला क्या था। आप को यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि उसके सारे पत्ते खुले हों और देश के सामने हों, तभी उसके पांव धरती पर होंगे और सिर आसमान में! अन्यथा कविवर दिनकर लिख ही गए हैं कि ‘जहर की कीच में ही आ गए जब/ कलुश बन कर कलुश पर छा गए जब/ दिखाना दोष फिर क्या अन्य जन में/ अहं से फूलना क्या व्यर्थ मन में!’ इसमें छिपाने या शर्माने जैसी कोई बात है ही नहीं कि आप और कांग्रेस के लोग सरकार बनाने की संभावना के बारे में बात करते मिलें!

कांग्रेस के आठ लोगों के समर्थन के बिना सरकार बनती नहीं है, मतदाताओं ने बहुत बड़े मत से कहा है कि आप को सरकार बनानी चाहिए, उपराज्यपाल ने यह जानते हुए भी कि आप के पास सरकार बनाने लायक सीटें नहीं हैं, उससे पूछा कि क्या वह सरकार बना सकती है, तो आप ने सरकार बनाने की संभावना जांची। उसकी तीव्र और दिली आतुरता है कि वह दिल्ली की दिलजली जनता को कुछ राहत दे सके, तो जरूरी है कि कांग्रेस और भाजपा को वह बताए कि वे उसे किस हद तक मदद करेंगे।

इसीलिए मुख्यमंत्री ने अठारह मुद्दों वाला पत्र भाजपा और कांग्रेस दोनों को लिखा था। देश चलाने की वर्जिश कर रही भाजपा ने उसे हिकारत से देखा और जवाब देने लायक भी नहीं समझा। कांग्रेस ने उसका समुचित जवाब दिया। इसलिए जरूरी हो गया कि आप और कांग्रेस के लोग साथ मिलें-बैठें और कब तक, कहां तक और कैसे यह तालमेल रखा जा सकेगा, इसकी बात करें। क्या आप ने ऐसा किया? जवाब तुरंत आना चाहिए। आप अपने पांव पर आप ही कुल्हाड़ी मारेगी, अगर वह किसी से, किसी भी तरह की गुपचुप सौदेबाजी में उतरेगी।

‘आप’ याद रखे कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की पुरानी, गलत और बेईमान इरादों से की जाने वाली सौदेबाजियों ने राजनीति का जितना और जैसा पतन किया है, उसका ही नतीजा है कि आज राजनीति नरक-कुंड बन गई है। ऐसे लोगों से किसी भी आधार पर कोई भी सौदेबाजी नहीं करनी चाहिए। इस आधार पर आप किसी नई दिशा की राजनीति न तो कर सकते हैं और न चला सकते हैं। मुझे लगता है कि आप वालों को तुरंत देश से वह सब बता देना चाहिए जिसका खुलासा नितिन गडकरी कर रहे हैं। आप की राजनीति की यह जिम्मेवारी है।

बिजली और पानी के बारे में बहुत सम्यक घोषणा आप ने की है। ऐसे दूसरे कदम भी उठेंगे और उन सबका असर कांग्रेस से सरकार को मिल रहे समर्थन पर पड़ेगा। वैसे कदम, जिनका सीधा परिणाम


कांग्रेस पर होगा, आप के लिए आत्महत्या के बराबर होगा- सरकार चली जाएगी। इतना ही नहीं, बल्कि यह भी कि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए कोई आयोग बिठाया जाएगा तो काम ही नहीं कर सकेगा। सरकार भी गिर जाएगी और आम लोगों के लिए राहत का जो थोड़ा-बहुत काम आप कर सकती है, वह भी छूट जाएगा। आप को यह ध्यान में रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार से लड़ाई जरूरी है, लेकिन उसका सही वक्त और सही निशाना चुनना भी जरूरी है। जल्दीबाजी में उठाया कोई भी कदम आप को निस्तेज कर देगा। कांग्रेस के समर्थन-वापसी के डर से कोई कदम न उठाना या स्वार्थी विपक्ष के दवाब में गलत समय पर कदम उठाना दोनों ही आप को नुकसान पहुंचाएंगे।

आप का ध्यान तुरंत एक दूसरी तरफ जाना चाहिए। अगर आप भीड़ में शामिल एक और राजनीतिक पार्टी नहीं है और दावा करती है कि वह जनांदोलन की ताकत से चलने वाली एक राजनीतिक व्यवस्था का प्रयोग है, तो उसे दिल्ली के लोगों से साफ बातें करनी चाहिए। सुविधाएं देना सरकार का काम है, सुविधाओं को जनता तक पहुंचाना नौकरशाही की जिम्मेवारी है और जनता सुविधाओं का लाभ लेती है तो उसे कर्तव्यों के पालन के लिए भी जिम्मेवार होना चाहिए। मुफ्त में या सस्ते में पानी पाने वाली जनता का कर्तव्य है कि वह घर में या सड़क पर लगे किसी भी नल में पानी बहता न छोड़े! नल तोड़ना ताकि उसे खोलने-बंद करने की झंझट ही न रहे; अपनी तरफ ज्यादा पानी खींचने के लिए नई पाइपें डालना; पानी बेंचना; टैंकर माफिया से सांठगांठ करके पानी का व्यापार करना आदि ऐसी बीमारियां हैं, जिनसे हम ग्रस्त हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पानी की बेतरतीबी है।

अगर अरविंद-सरकार यह बेतरतीबी दुरुस्त करने में लगी है तो नागरिकों का कर्तव्य है कि वह भी इन सबके खिलाफ सावधान रहे। मुहल्ला समितियां इस जिम्मेवारी का निर्वाह करें और अगर कहीं ऐसी आपाधापी चलती हो तो उसे रोकें। इस सवाल को लेकर मुहल्ला समिति की बैठक होनी चाहिए और ऐसा प्रस्ताव पारित कर सभी नागरिकों को बताया जाना चाहिए। एक-एक बूंद पानी बचाना ही पानी बढ़ाना है।

आप वाले यह भी ध्यान में रखें कि जिस तरह जरूरत के मुताबिक नए कनेक्शन देना जरूरी है, उसी प्रकार जहां पानी की बर्बादी होती हो वहां का कनेक्शन बंद कराना भी जरूरी है। अब तक सारे देश को नगरपालिका की सड़क मान कर हम इस्तेमाल करते आए हैं, जो इस्तेमाल के लिए सबके बाप की होती है, देख-भाल के लिए किसी की नहीं होती! देश के सारे संसाधनों का पूरा संरक्षण देशभक्ति का अनिवार्य अंग है, यह राम मंदिर वालों का एजेंडा भले न हो, राम वालों का तो होना ही चाहिए।

ऐसा ही सवाल बिजली का है। बिजली की अनिवार्यता और बिजली की विलासिता का फर्क  करने का वक्त आ गया है। रोशनी के लिए बिजली, खेती के लिए बिजली, उद्योगों के लिए बिजली- प्राथमिकता के ये तीन क्रम हैं। जब तक ये पूरे नहीं होते हैं तब तक बिजली दूसरे किसी काम में नहीं खर्च हो, क्या ऐसा मानस हम बना सकते हैं?

तब बिजली के जगमगाते विज्ञापन नहीं होंगे; बिजली से सजावट नहीं होगी; रात का क्रिकेट मैच नहीं होगा; लिफ्टें एक खास ऊंचाई से कम के लिए नहीं होंगी; वातानुकूलित घरों, दफ्तरों और होटलों पर कोई प्रतिबंध डालना होगा। ये प्रतिबंध क्या होंगे, इस पर राय बनाने का काम होना चाहिए।

बिजली के मामले में दो बड़े काम हैं: बिजली की बकाया वसूली और बिजली की चोरी रोकना। बिजली का सबसे अधिक बकाया उनके पास है, जो हर तरह से सामर्थ्यवान हैं और उनके यहां भी बिजली की खूब चोरी होती है। दूसरी तरफ हुकबाजी है। यह सारे देश की बीमारी है। शाम होते ही पता नहीं कितने हुक निकल आते हैं, जो सामने के बिजली के खंभे पर फंसा दिए जाते हैं। मुफ्त में बिजली पाने का यह सबसे प्रचलित तरीका है। सुनता हूं कि इसमें भी स्थानीय बिजली कर्मचारियों और पुलिस का हिस्सा होता है। मीटर से छेड़छाड़ भी आम तरीका है। अगर अरविंद-सरकार बिजली कंपनियों की मनमानी पर रोक लगा रही है तो लोगों की मनमानी चलती कैसे रह सकती है! यह मुहल्ला समितियों का काम है कि वे अपने दायरे में बिजली-अनुशासन लागू करें। सस्ती बिजली इस सरकार के प्रयत्न से मिलने लगी है, तो हमें इसे स्थायी व्यवस्था में बदलने की तैयारी करनी चाहिए।

आप वाले दिखावटी तामझाम वाले आयोजनों का, तमाशा बना दिए गए विवाह-समारोहों का निषेध करें। सच्ची शादी: सादी शादी जैसा मानस बनाने का अभियान चलाएं आप वाले! यह सब है, जिसे हमारे यहां राजनीतिक कर्म नहीं माना जाता है और यही कारण है कि हमारे यहां चुनाव लड़ने के अलावा दूसरी कोई राजनीति होती ही नहीं है। आप को यह मानसिकता तोड़नी होगी अन्यथा आप वाले हम वाले बन कर वक्त की धूल में दब जाएंगे।

 

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