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पूंजीवाद, राष्ट्रवाद और महायुद्ध PDF Print E-mail
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Wednesday, 01 January 2014 12:05

शिवदयाल

जनसत्ता 1 जनवरी, 2014 : वर्ष 2014 में प्रथम विश्वयुद्ध के सौ साल पूरे हो रहे हैं।

प्रथम विश्वयुद्ध में कोई नब्बे लाख सैनिकों को जान गंवानी पड़ी। हताहत नागरिकों की संख्या इससे बहुत अधिक है। ब्रिटेन की मार्फत मित्र-देशों की तरफ से लड़ते हुए 47,746 भारतीय सैनिक मारे गए, जबकि 65126 गंभीर रूप से घायल हुए। एक उपनिवेश के लिए यह भूमिका असाधारण ठहरती है। यूरोप, अफ्रीका और एशिया के कितने ही इलाके बर्बाद हो गए। जर्मनी, आस्ट्रिया-हंगरी और तुर्की के साम्राज्य के साथ ही रूस का साम्राज्य भी नष्ट हो गया। युद्ध में एक तरफ जर्मनी, आस्ट्रिया-हंगरी, तुर्की और बुल्गारिया केंद्रीय शक्तियों के रूप में थे तो दूसरी ओर इंग्लैंड, फ्रांस, रूस, अमेरिका, इटली और जापान मित्र-देश थे।

 

इटली पहले जर्मनी के साथ था, लेकिन एक संधि के उल्लंघन को कारण बता कर उसने पाला बदल लिया। मित्र-देशों में रूस को छोड़ कर सभी गणतंत्रीय व्यवस्था वाले देश थे। रूस में राजशाही थी, युद्ध के दौरान ही 1917 में बोल्शेविक क्रांति के बाद रूस युद्ध से अलग हो गया। वहां साम्यवादी क्रांति ने राष्ट्रवाद को खारिज कर सोवियत संघ का निर्माण किया। अमेरिका पहले तटस्थ था, लेकिन जर्मनी ने उसके जहाज डुबो कर जबरन उसे युद्ध में घसीटा। इसी प्रकार लगातार कमजोर पड़ते तुर्की ने बाल्कन क्षेत्र पर अपने दावे को लेकर जर्मनी और आस्ट्रिया की तरफ से युद्ध में हिस्सा लिया।

एक तरफ पूर्वी यूरोप के बाल्कन क्षेत्र तो दूसरी ओर उत्तरी अफ्रीका के मोरक्को संकट को प्रथम विश्वयुद्ध का प्रमुख कारण माना जाता है। कुछ विद्वान इस युद्ध को यूरोपीय युद्ध भी कहते हैं और वे एक तरह से सही भी हैं। युद्ध वास्तव में यूरोप की जटिल से जटिलतर होती जाती राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण हुआ। 1914 से पिछले सौ साल में यूरोप बड़े परिवर्तनों से गुजर रहा था। वहां प्राय: सामंतवादी राजनीतिक व्यवस्था कायम थी, जबकि औद्योगिक क्रांति के प्रादुर्भाव से आर्थिक व्यवस्था लगातार बदल रही थी। समाज तेजी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रहा था, जिसकी सामंती मूल्यों और व्यवस्थाओं से कोई संगति नहीं बैठ सकती थी। किसान उद्योगों के मजदूर बन रहे थे। मजदूर और पूंजीपति वर्ग के अलावा विशेषकर पश्चिम यूरोप में मजबूत मध्यवर्ग विकसित हो रहा था। यूरोपीय समाज और राजनीति गहरे संकट से गुजर रहे थे।

फ्रांस की क्रांति ने यूरोपीय राजव्यवस्था ही नहीं, मूल्य व्यवस्था पर भी अमिट छाप छोड़ी थी। उस समय इंग्लैंड को छोड़ लगभग समूचे यूरोप में कठोर राजशाही चल रही थी। ये राजव्यवस्थाएं क्रांति तो क्या किसी भी परिवर्तन का निषेध कर रही थीं। फ्रांस की क्रांति की विफलता और उसके दमन के बाद नेपोलियन बोनापार्ट के सर्वसत्तावाद का उदय हुआ। नेपोलियन कुलीन राजवंश का न होकर मामूली परिवार का एक सिपाही था, जो सेनापति के पद तक जा पहुंचा था। क्रांति के मात्र दस वर्ष बाद ही उसने अपने को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया। उसके लगभग चालीस युद्धों और विजय अभियानों ने समूचे यूरोप की राजनीति और भूगोल को बदल दिया। उसने अनेक राजशाहियों को गणतंत्र में बदल दिया।

इसी दौर में यूरोप में एक शब्द ‘राष्ट्रवाद’ या ‘राष्ट्रीयता’ जादू की तरह सबके सिर चढ़ कर बोल रहा था। बाद में तो मानो यह शब्द यूरोप का नियंता ही बन गया, बल्कि शेष दुनिया पर भी यह जादू चल गया और आज तक इसका असर कायम है। नेपोलियन के अभियानों ने अगर पुराने साम्राज्यों को ध्वस्त किया तो नई राष्ट्रीयताओं को भी पहचान दी और उन्हें मुक्त किया। वास्तव में नेपोलियन की शक्ति का उत्स भी राष्ट्रवाद ही था जिसे पहले फ्रांस की क्रांति ने नई अभिव्यक्ति और गरिमा प्रदान की थी। फ्रांस में पननी राष्ट्रवादी चेतना का पूरे यूरोप में प्रसार हुआ, जो आखिरकार नेपोलियन और फ्रांस के ही खिलाफ गया।

इधर प्रशा में बिस्मार्क के चांसलर बनते ही यूरोप में नई तरह की कूटनीति और गुप्त संधियों के युग की शुरुआत हुई। बिस्मार्क ने अपनी शतरंजी चालों में पूरे यूरोप को उलझाया। पहले उसने आॅस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया, और बाद में उससे संधि भी कर ली। उसने अंदर ही अंदर फ्रांस के विरुद्ध सैनिक तैयारियां शुरू कर दीं, और दूसरी ओर, पूरे यूरोप को अपनी कूटनीति की बदौलत फ्रांस के खिलाफ कर दिया। उसने जर्मनी की अर्थव्यवस्था, शिक्षा और प्रशासन पर भी विशेष ध्यान दिया। उसने राज्य नियंत्रित आर्थिक विकास की नीति अपनाई। लौह अयस्क और कोयले की प्रचुरता के साथ ही इस्पात उत्पादन में जर्मनी अग्रणी देश बन गया। वहां हुई वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का पूरा लाभ बिस्मार्क ने सैन्यीकरण में लगाया। जर्मनी एक मजबूत समुद्री ताकत भी बन गया और इंग्लैंड को चुनौती देने की स्थिति में आ गया।

एक राष्ट्र के रूप में जर्मनी अभी नया था और उसकी प्रगति विस्मित करने वाली थी। यूरोप के कई देशों में पूंजीवादी विकास ने कच्चे माल और नए बाजार की सतत तलाश को अनिवार्य बना दिया। इन देशों में एशिया और अफ्रीका में उपनिवेश बनाने की होड़ मची थी। इंग्लैंड उपनिवेशवाद का अगुआ था और वास्तव में यूरोप की आंतरिक प्रतिद्वंद्विता में वह सीधे शामिल भी नहीं था। उसकी आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए भारत जैसे विशाल उपनिवेश पहले ही मौजूद थे। फ्रांस, पुर्तगाल, नीदरलैंड और स्पेन उसके पीछे थे। जर्मनी की बढ़ती आर्थिक जरूरतों ने उसे भी, देर से ही सही, उपनिवेश बनाने की होड़ में शामिल कर दिया। उसने किसी तरह पश्चिम अफ्रीका, टोगोलैंड और कैमरून में उपनिवेश बनाने में सफलता प्राप्त कर ली। बिस्मार्क ने जर्मनी का एकीकरण करके उसे यूरोप का प्रमुख शक्तिशाली देश बना दिया, तो इसके पीछे की मूल प्रेरणा जर्मन राष्ट्रवाद ही थी। यह भावना इतनी मजबूत थी कि बिस्मार्क को अपने कार्यकाल में चर्च की गतिविधियों को नियंत्रित करने में भी कोई संकोच नहीं हुआ। राष्ट्रवाद ने धार्मिक


ओर सांस्कृतिक क्षेत्र में परिवर्तन और नियंत्रण को भी संभव बना दिया।

जर्मनी की सफलता ने यूरोप में राष्ट्रवाद के बुखार को बढ़ा दिया। अनेक दमित राष्ट्रीयताएं सिर उठाने लगीं। लोग अपने अतीत, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के प्रति अतिशय आग्रही होने लगे और अपनी राष्ट्रीयता में मुक्ति का मार्ग तलाशने लगे। पूंजीवाद इनमें अपना भविष्य देख रहा था। पुरानी व्यवस्था उसके मार्ग की अड़चन थी। पूंजीवाद और राष्ट्रवाद एक दूसरे के लिए खाद बन रहे थे। आॅस्ट्रिया-हंगरी और तुर्की साम्राज्य के अधीन पिसती राष्ट्रीयताएं अब सिर उठा रही थीं। राष्ट्रवाद की यह लहर अब एशिया भी पहुंच चुकी थी, जापान का इसने एक आधुनिक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में कायाकल्प कर दिया था।

औद्योगिक विकास का उपयोग जापान ने साम्राज्यवादी प्रसार में किया। उसने चीन जैसे विशाल देश को हरा दिया और दूसरी ओर रूस के लिए भी खतरा बनने लगा। यूरोप की राजनीति में अलग-थलग पड़े इंग्लैंड ने रूस को नियंत्रित करने के उद््देश्य से जापान से संधि की। वह भी बराबरी के स्तर पर। यह एक ऐतिहासिक घटना थी। जापान अब प्रशांत क्षेत्र और पूर्वी एशिया में इंग्लैंड का हित साधन कर सकता था और इंग्लैंड अब निश्चिंत होकर यूरोप की राजनीति में दखल दे सकता था। इस दौर की प्राय: हर घटना दूसरी अगली घटना से जुड़ी थी, और आखिरकार महायुद्ध की तैयारी से ही जुड़ी थी। यूरोप समेत पूरी दुनिया के लिए दुर्भाग्य की बात यह थी कि औद्योगिक क्रांति के सुफल का उपयोग यूरोप के देश आर्थिक विकास के साथ, बल्कि उससे ज्यादा शस्त्रीकरण के लिए कर रहे थे ताकि अपना कद ऊंचा किया जा सके और दूसरे को नीचा दिखाया जा सके।

आखिरकार बाल्कन क्षेत्र का तनाव बहाना बन गया और 28 जुलाई, 1914 को युद्ध छिड़ गया। धीरे-धीरे पूरा यूरोप ही नहीं, उसके उपनिवेश भी युद्ध में उलझते चले गए। अमेरिका और जापान भी आॅस्ट्रिया-हंगरी, जर्मनी और तुर्की के खिलाफ युद्ध में संलग्न हो गए। चार साल चले इस युद्ध की समाप्ति 11 नवंबर, 1918 को हुई। जर्मनी की लाख कोशिशें भी उसे हार से नहीं बचा सकीं, उसके राजा बिलियम द्वितीय को भागना पड़ा और इसी के साथ युद्ध समाप्त हो गया। जर्मनी का राजतंत्र समाप्त हो गया, वहां गणतंत्र स्थापित हो गया।

वास्तव में आज विश्व भर में जो लोकतंत्र की पताका फहर रही है उसके पीछे प्रथम विश्वयुद्ध में मित्र-राष्ट्रों की विजय एक वजह रही है। उन्होंने युद्ध में लोकतंत्र की रक्षा के संकल्प के साथ भाग लिया था और अंतत: जर्मन, आॅस्ट्रिया और तुर्क साम्राज्य को हरा दिया था; बचा रूसी साम्राज्य, तो वह 1917 की क्रांति में ही ध्वस्त हो गया। युद्ध के बाद लोकतंत्र एक शासन पद्धति के रूप में और लोकप्रिय हुआ। इस एक फायदे के बदले युद्ध के नुकसानों का पलड़ा बहुत भारी था। वास्तव में युद्ध ने उलझनें सुलझाने के बदले बढ़ा दीं। विजयी देशों की स्वार्थ-लिप्सा और मदांधता ने एक और महायुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। विजित देशों की भूमि और संसाधनों की बंदरबांट ने इन देशों में उग्र राष्ट्रवाद की भूमि तैयार कर दी।

उधर विजयी लोकतंत्रों में से किसी ने भी अपने उपनिवेशों की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का ध्यान नहीं रखा, बल्कि ब्रिटेन ने तो भारत में दमन तेज कर दिया। युद्ध समाप्ति के अगले ही साल जलियांवाला बाग का जनसंहार हुआ। यही नहीं, दमनकारी रौलट ऐक्ट भी पास हुआ। बाद में जर्मनी के मानमर्दन से हिटलर के नेतृत्व में नाजीवाद का जन्म हुआ, जबकि इटली में मुसोलिनी ने फासीवाद का परचम लहराया।

प्रथम महायुद्ध का पहला सबक यह है कि पूंजीवादी प्रतियोगिता आर्थिक क्षेत्र में सीमित नहीं रह जाती; अंतत: राजनीति, समाज, राष्ट्र, यहां तक कि पूरी दुनिया को अपने चंगुल में फंसा लेती है। मुनाफा बढ़ाते जाना और इस प्रक्रिया में अव्वल बने रहने की हर संभव कोशिश- औद्योगिकीकरण के साथ सैन्यीकरण, बाजार विस्तार के साथ उपनिवेशों के संसाधनों की लूट- इसका अंतिम परिणाम युद्ध और ध्वंस ही होता है। हमारी आज की दुनिया में भी ये प्रवृत्तियां मौजूद हैं। दूसरा सबक यह है कि राष्ट्रवाद मनुष्य समाज में विभाजन का एक बड़ा और प्रमुख आधार है। इसे शांति, सुरक्षा, सहअस्तित्व, मनुष्यता और विश्वबंधुत्व के मूल्यों की मर्यादा में बंधना जरूरी है। अंध-राष्ट्रवाद केवल विनाश ले आता है। यूरोप में तकनीकी विकास, मुनाफा और राष्ट्रवाद के मेल ने पूरी दुनिया में भारी तबाही मचाई।

यह नहीं कि युद्ध से बचने के प्रयास नहीं किए गए। लगभग सभी युद्धरत देशों में युद्ध के खिलाफ आंदोलन हुए। युद्ध विरोधी अभियानों में प्रमुखत: समाजवादी, अराजकतावादी, शांतिवादी, रैडिकल श्रमसंघ, महिला अधिकार समूह और ब्रिटेन की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी आदि शामिल थे। इसके अलावा अनेक बुद्धिजीवी युद्ध के खिलाफ लिख-बोल रहे थे। बर्ट्रेंड रसेल को युद्ध विरोधी विचारों के प्रतिपादन के लिए कैंब्रिज विश्वविद्यालय से हटाया गया और उन पर देशद्रोह का मुकदमा भी चला। अल्बर्ट आइंस्टीन भी घोषित रूप से युद्ध के विरोध में थे। उन्हें जर्मनी छोड़ कर स्वीट्जरलैंड जाना पड़ा। हेलेन किलर ने अमेरिका में युद्ध-विरोधी अभियान छेड़ा। लेनिन ने क्रांति-पूर्व रूस में इस ‘साम्राज्यवादी युद्ध’ की मुखालफत की और क्रांति-पश्चात रूस को युद्ध से अलग कर लिया। भारत के रवींद्रनाथ ठाकुर युद्ध के दौरान ही 1916-17 में जापान और अमेरिका में राष्ट्रवाद और युद्ध के खिलाफ व्याख्यान दे रहे थे।

अफसोस, ये सभी प्रयास यूरोप में छाए युद्धोन्माद के मुकाबले कम पड़ गए। युद्ध होकर रहा और जब समाप्त हुआ, दुनिया कहीं और बड़े विनाश की ओर उन्मुख थी।

 

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