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सवालों से घिरी खामोशी PDF Print E-mail
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Saturday, 28 December 2013 10:22

विजय विद्रोही

जनसत्ता 28 दिसंबर, 2013 :  दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार इतनी बड़ी खबर नहीं थी। पंद्रह सालों से राज कर रहीं मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की करारी हार भी इतनी बड़ी खबर नहीं थी। सबसे बड़ी खबर थी आम आदमी पार्टी का दिल्ली की सत्तर में से अट्ठाईस सीटें जीतना। अण्णा हजारे के साथी रहे अरविंद केजरीवाल की नवोदित पार्टी ने ऐसा झाड़ू चलाया कि दिल्ली से कांग्रेस साफ हो गई। यूपीए-2 यानी मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल को सबसे ज्यादा धक्का अण्णा आंदोलन और उसकी परछार्इं से निकली ‘आप’ ने पहुंचाया। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने तो इसका फायदा मात्र उठाया है।

वर्ष 2009 में आम चुनाव फिर से जीतने के बाद लोकसभा में एक बहस के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक शेर पढ़ा था: ‘न तलवारें चलेंगी न खंजर उठेंगे, ये बाजू हमारे आजमाए हुए हैं।’ लेकिन बातों के खंजर भी उठे और बयानों की तलवारें भी चलीं। वह भी खुद की सरकार के अंदर से, खुद की पार्टी के अंदर से। सबसे बड़ी तलवार तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ही चला दी। याद है आपको, दागी नेताओं को बचाने के लिए लाए गए अध्यादेश को राहुल गांधी ने खारिज कर दिया। राहुल ने तब कहा था कि इस अध्यादेश को कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाना चाहिए।

यही मनमोहन सिंह 2009 में मध्यवर्ग के नायक थे। ‘सिंह इज किंग’ का नारा बुलंदी पर था। 2009 के लोकसभा चुनावों में यूपीए की वापसी हुई। कांग्रेस को 206 सीटें मिलीं। इतनी सीटें उसने 1984 के बाद कभी नहीं जीती थीं। सब कुछ बढ़िया चल रहा था। आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने और गति देने का सुनहरा मौका था। लेकिन हो गया उलटा। मनमोहन सिंह सरकार एक के बाद एक घोटालों में घिरती चली गई। कुछ इस तरह घिरी कि सरकार का इकबाल ही जाता रहा। कोयला घोटाले में तो तार सीधे प्रधानमंत्री तक से जोड़े गए। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। सवाल उठता है कि मनमोहन सिंह सरकार पर क्यों लुंजपुंज होने के आरोप लगे। सरकार काम नहीं कर पाई या उसे काम नहीं करने दिया गया?

वर्ष 2009 में जब मनमोहन सिंह ने दोबारा सरकार बनाई तब लगातार दूसरी बार की हार से भाजपा पस्त थी। यूपीए-एक के समय आर्थिक सुधारों में अड़ंगा डालने वाले वाम मोर्चे से भी कांग्रेस का पीछा छूट गया था। उससे पहले सरकार आरोप लगाती रही थी कि वाम दल आर्थिक सुधारों की गाड़ी को पटरी पर आने से रोकते रहते हैं। 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु करार के विरोध में तो वाम दलों ने यूपीए सरकार से समर्थन ही वापस ले लिया था। सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद भी सुस्त पड़ी थी। राहुल गांधी को देश भर में घूमने से फुरसत नहीं थी। विकास दर नौ फीसद को छू रही थी। कई सालों से बारिश भी अच्छी हो रही थी। बाहर से पैसा भी आ रहा था। यानी कुल मिलाकर सरकार के पास अब अपने एजेंडे को बढ़ाने का सुनहरा मौका भी था और अनुकूल माहौल भी।

अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को इससे बेहतर मौका नहीं मिल सकता था। उन्हें अब आर्थिक सुधारों को नई गति देनी थी। भूमि अधिग्रहण विधेयक पास करवाना था। बीमा क्षेत्र को खोलना था। पेंशन फंड के बेहतर इस्तेमाल के उपाय करने थे। प्रत्यक्ष कर संहिता और वस्तु एवं सेवा कर जैसे विधेयकों पर राज्यों की सहमति लेने की कोशिशें तेज करनी थीं। हुनर के विकास पर जोर देना था। नौकरियां और ज्यादा खुलें, मध्यवर्ग को और राहत मिले इसके रास्ते तलाशने थे। प्रधानमंत्री के पास योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलूवालिया थे।

प्रणब मुखर्जी जैसे अनुभवी वित्तमंत्री थे। कौन था जो राह रोक रहा था? प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद चिदंबरम को वित्तमंत्री बनाया गया। चिदंबरम ने भी दबे शब्दों में स्वीकार किया था कि 2009 से 2011 के बीच जितना कुछ आर्थिक मोर्चे पर किया जाना जरूरी था, उतना हो नहीं सका। साफ-साफ इशारा प्रणब मुखर्जी की तरफ था।

यह वही प्रणब मुखर्जी थे जिन्हें टीम अण्णा के साथ लोकपाल विधेयक का मसविदा बनाने वाली समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। बात अप्रैल 2011 की है, जब अण्णा हजारे पहली बार जंतर मंतर पर आमरण अनशन पर बैठे थे। लेकिन तब प्रणब दा इस आंदोलन की आंच को महसूस नहीं कर सके। हालांकि बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि नए तरह के आंदोलनकारियों का दौर है जो अपने हिसाब से कानून बनवाने के लिए जोर देते हैं। लेकिन न तो प्रणब दा और न ही यूपीए सरकार या कांग्रेस का कोई नेता नए दौर की राजनीतिक ताकत को पहचान सका।

एक वक्त था जब प्रणब मुखर्जी एक दर्जन से ज्यादा मंत्री-समूह के अध्यक्ष थे। उन्हें संकटमोचक दादा कहा जाने लगा था। लेकिन कुछ का कहना है कि वे फाइलों पर बैठ जाते, फैसला लेने के नफा-नुकसान इस अंदाज में बताते कि सरकार न तो हां कह पाती और न ही ना। फिर धीरे-धीरे विकास बनाम पर्यावरण की उलझन भी खड़ी हो गई।

एक खेमा विकास की बात करता तो दूसरा खेमा पर्यावरण की चिंता करता। उदाहरण के लिए, हाल ही में परियोजनाएं अटकाने के कथित आरोप में सरकार से संगठन में भेजी गर्इं जयंती नटराजन के इस्तीफे के बाद स्वयं राहुल गांधी ने कहा था कि पांच लाख करोड़ की तीन सौ परियोजनाएं अटकी रहीं। इनमें से दो लाख करोड़ की पेट्रोलियम से जुड़ी परियोजनाएं भी शामिल हैं। लेकिन यही राहुल गांधी ओड़िशा के नियमगिरि में आदिवासियों से मिले थे जो वेदांता के इस्पात कारखाने का विरोध कर रहे थे। उनसे राहुल ने कहा था


कि वह उनके दिल्ली में सिपाही हैं। नतीजा यह हुआ कि वेदांता को आखिरकार कारखाने का विस्तार टालना पड़ा।

इसी तरह ओड़िशा में ही दक्षिण कोरिया की कंपनी पोस्को पचास हजार करोड़ रुपए का निवेश इस्पात क्षेत्र में करना चाहती है। लेकिन कई सालों से यह मामला अटका पड़ा है। इसी तरह कोयला खनन और गैस उत्पादन पर साफ नीति नहीं होने के कारण बीस हजार मेगावाट क्षमता के संयंत्र कोयले या गैस के इंतजार में बंद पड़े हैं। निजी और सरकारी कंपनियों के पास चार लाख करोड़ से ज्यादा पैसा पड़ा हुआ है, लेकिन वे कहां कैसे निवेश करें यह उन्हें सरकार की सुस्ती के कारण समझ नहीं आ रहा है।

सरकार किस तरह काम कर रही है इसका ताजा उदाहरण संसद का शीतकालीन सत्र है। राहुल चाहते थे कि लोकपाल विधेयक पास हो, इसलिए वह विधेयक तो विपक्ष की लगभग हर मांग मानते हुए पास करवा दिया गया लेकिन दो दिन पहले ही सत्रावसान भी कर दिया गया। इससे पहले भी कभी 2-जी, कभी कोयला घोटाला, कभी तेलंगाना तो कभी किसी अन्य मसले पर सदन लगातार बाधित होता रहा। जब सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण विधेयक और खाद्य सुरक्षा विधेयक को पास करवाने पर जोर दिया तो सरकार ने उन्हें जैसे-तैसे पास करवा लिया। सवाल उठता है कि ऐसी ही सहमति अन्य विधेयकों को लेकर क्यों नहीं बन पाई। सरकार आरोप लगाती रही कि विपक्ष खासतौर से भाजपा ने संसद नहीं चलने दी, सरकार को काम नहीं करने दिया। लेकिन संसद में तो कानून बनते हैं, नीतिगत फैसले लेने से सरकार को किसने रोका था? किराना में एफडीआइ का फैसला आखिर सरकार ने लिया ही था जिस पर भाजपा और कुछ अन्य दलों ने हो-हल्ला मचाया। सरकार ऐसे दूसरे फैसले लेने से क्यों हिचकती रही, जो अर्थव्यवस्था को गति दे सकते थे?

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए कहा जाता रहा कि वे गैर-राजनीतिक व्यक्ति हैं। राजनीति नहीं जानते और राजनीति नहीं करते। लेकिन गठबंधन राजनीति के दौर में साथी दलों को साथ लेकर चलना ही पड़ता है। कभी मान-मनौव्वल से काम चलाना पड़ता है तो कभी आंख भी दिखानी पड़ती है। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार सही समय पर सही फैसले नहीं ले सकी। 2-जी मामले में दूरसंचारमंत्री ए राजा को शुरूमें ही हटा दिया जाता तो सरकार का इकबाल बना रहता। संसद से लेकर सड़क तक अपनी किरकिरी करवाने के बाद ही मजबूरी में ए राजा को हटाया गया।

कुछ चुनिंदा संपादकों के साथ एक बातचीत में मनमोहन सिंह से गठबंधन सरकार की मजबूरियों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसे स्वीकार भी किया। गठबंधन की मजबूरी को सरकार की साख से ऊपर रखने की गलती मनमोहन सिंह सरकार को भारी पड़ी। यहां तक कि अपनी ही कांग्रेस पार्टी के मंत्रियों पर आरोप लगे तो न मनमोहन सिंह ने तुरंत फैसला लिया और न ही सोनिया और राहुल ने उन्हें तुरंत ऐसा करने को कहा।

कोयला मामले में कानूनमंत्री अश्विनी कुमार पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी आने तक उन्हें हटाने का फैसला नहीं किया जा सका। रेलवे बोर्ड में नियुक्ति के लिए पैसा लेने के आरोप रेलमंत्री पवन कुमार बंसल के रिश्तेदारों पर लगे तब भी मनमोहन सिंह चुप्पी साध कर बैठ गए। मनमोहन सिंह गठबंधन की मजबूरी के चलते वह सब नहीं कर सके जो करना चाहते थे। क्या यह मजबूरी घर के अंदर की थी? दस जनपथ की मजबूरी? दो सत्ता-केंद्र की बात भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के नेता भी कहने लगे थे। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी कहा था कि दो सत्ता-केंद्र नहीं होने चाहिए।

अब तय है कि अगर यूपीए 2014 के लोकसभा चुनावों में फिर सत्ता में आ जाए तब भी मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री नहीं होंगे। इस समय वे प्रधानमंत्री हैं लेकिन उनके नेतृत्व में अगला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा जाएगा। यह बात खुद सोनिया गांधी ने साफ कर दी है। चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि समय आने पर कांग्रेस प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार की घोषणा करेगी। अब कहा जा रहा है कि सत्रह जनवरी को दिल्ली में कांग्रेस का बड़ा सम्मेलन होगा, जिसमें हो सकता है राहुल गांधी को बाकायदा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए।

पिछले लोकसभा चुनावों के समय ऐसा नहीं था। उस समय भी मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। तब सोनिया गांधी से, चुनावों से पहले घोषणापत्र जारी करते समय, यही सवाल पूछा गया था। सोनिया ने तब घोषणापत्र पर छपी अपनी तस्वीर पर हाथ रख लिया था ताकि सिर्फ मनमोहन सिंह का चेहरा दिखे। मनमोहन सिंह शायद देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जिनकी राजनीतिक पारी प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए ही खत्म हो रही है। उन्होंने एक बार संसद में बहस के दौरान एक शेर पढ़ा था: ‘हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी।’ मनमोहन सिंह अधिकतम समय मौन रहे। उनकी इस बात को लेकर आलोचना भी हुई, भाजपा ने मजाक भी उड़ाया। लेकिन मनमोहन सिंह ही जानते हैं कि उनकी खामोशी ने किन-किन की आबरूको बचाए रखा, बनाए रखा। एक सवाल मनमोहन सिंह के लिए। जब आपकी राजनीतिक पारी खत्म होगी तब क्या हम उम्मीद रखें कि खामोशी टूटेगी!

 

 

 

 

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