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बहसों के तंग दायरे PDF Print E-mail
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Wednesday, 25 December 2013 11:53

अनिल चमड़िया

जनसत्ता 25 दिसंबर, 2013 : दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक (बीए) के बाद पत्रकारिता में डिप्लोमा का पाठ्यक्रम चलता है।

उसमें एक विषय है: शांति और निशस्त्रीकरण। एक शिक्षक के तौर पर इस विषय को एक दिन पढ़ा चुकने के बाद एक विद्यार्थी ने मुझसे पूछा कि शांति और निशस्त्रीकरण की आज क्या प्रासंगिकता है? विडंबना यह है कि यह सवाल उसने दुनिया के कई हिस्सों में विभिन्न देशों पर ताकतवर देशों के हो रहे हमले और आक्रमण की आशंकाओं के हालात के बीच पूछा था। यह भी पूछा कि पूरी दुनिया में नए-नए हथियारों को बनाने और उन पर अपना एकाधिकार रखने की होड़ क्यों मची हुई है। यह एक तरह से परेशान कर देने वाला सवाल था। पाठ्यक्रम का यह विषय मोटे तौर पर शांति की राजनीति और पूरी दुनिया में हिलटरशाही के दौर से चल रही हथियारों की होड़ को समझने की जरूरत पर बल देता है।

 

एक शिक्षक के नाते मेरे सामने एक नया प्रश्न यह उभरा कि आखिर छात्रा के दिमाग में प्रासंगकिता का सवाल क्यों खड़ा हुआ? प्रासंगिकता का मतलब यह कि आजकल उसका क्या महत्त्व है। मेरे प्रश्न के दो उत्तर मुझे मिले। मैंने पूछा कि उसकी दिनचर्या क्या है। उसका दिन भर का समय जिस तरह से और जिन लोगों और चीजों के बीच कटता है वह उसके अकेले की कहानी नहीं है। कक्षा में लगभग हर विद्यार्थी की यही स्थिति है। वे अपने माता-पिता के बीच जहां रहते हैं वहां ज्यादातर डिग्री की बात होती है। मसलन, किसी भी विद्यार्थी को ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने और रुतबा हासिल करने के लिए किस तरह की डिग्री हासिल करनी चाहिए। पाठ्यक्रम के बारे में भी कभी-कभार बातचीत हो जाती है।

पहली बात यह है कि समाज के विविध विषय पाठ्यक्रमों तक सिमट गए हैं। दूसरे, पाठ्यक्रमों में विषय की भी अपनी एक सीमा निश्चित हो गई है। वह सीमा परीक्षा में अंक हासिल करने तक पाठ्यक्रम के विषय को रट लेने की है। विषय छोटे होते जा रहे हैं। विषय को छोटा बनाने की एक लंबी प्रक्रिया अपनाई गई है। राजनीतिक चर्चाओं (सामूहिकता की विचारधारा) से दूर रखना और कैरियर (अकेला व्यक्ति) बनाने की होड़ इसके दो मुख्य ब्शिदु हैं।

उस छात्रा ने पिछले कई दिनों से शांति और निशस्त्रीकरण को छूने वाली न तो कोई खबर देखी थी और न ही पढ़ी थी। उसकी दिनचर्या में सवाल जो बनने शुरू होते हैं, वे समाचार पत्रों की सुर्खी या खबरों की प्रमुखता से आरंभ होते हैं। या फिर, टेलीविजन की सुर्खी से उसे किसी घटना और विषय की अहमियत समझ में आती है। उसके लिए प्रासंगकिता का अर्थ ‘ब्रेकिंग न्यूज’ जैसा है। वह केवल आजकल यानी चौबीस घंटे की समय सीमा में ही सोचने लगी है और उसके लिए ही प्रासंगिकता शब्द का इस्तेमाल करती है। जाहिर-सी बात है कि विषय का सिमटना शब्दों की अर्थवत्ता के सिमटने से भी जुड़ा होता है।

शब्दों के अर्थ किस तरह सिमट चुके हैं, उसका एक उदाहरण दिल्ली विश्वविद्यालय की एक शिक्षक ने दिया। उनके अनुसार, उन्हें अपने विद्यार्थियों के बीच यह देख कर हैरानी हुई कि उन्हें तीर और घड़ी के एक ही अर्थ की जानकारी है। तीर का वह अर्थ वे नहीं जानते जिसे नदी के किनारे के रूप में समझते रहे हैं। घड़ी का मतलब तो वे बस हाथ में बंधने वाली घड़ी ही जानते हैं।

पत्रकारिता की छात्रा ने बताया कि वह रोजाना एक समाचार पत्र पढ़ती है। रोजाना एक ही समाचार पत्र या एक ही भाषा के एक तरह के कई चैनलों को देखने वालों की तादाद सबसे ज्यादा है। मैंने एक दिन ऐसे कुछ पाठकों और दर्शकों से बातचीत करने की कोशिश की। पूछा कि क्या उन्होंने कभी दो-चार समाचार पत्रों को एक साथ पढ़ने की जहमत उठाई है? मैं दो-चार समाचार पत्र पढ़ने का कोई सुझाव नहीं दे रहा था। बल्कि अपने मूल सवाल की तरफ उन्हें ले जाने की कोशिश कर रहा था। उन्हें बताया कि दो-चार समाचार पत्रों को पढ़ने से उन्हें यह जानकारी मिलेगी कि उनमें आधे से ज्यादा सामग्री ऐसी है जो एक दूसरे से भिन्न है। यानी अखबारों या खबरिया और सामयिक चर्चा करने वाले टीवी चैनलों में जो आता है वह केवल उन अखबारों और चैनलों के लिए खबर या उपयोगी सामग्री कही जा सकती है। समाचार पत्र में छपना या टीवी के परदे पर दिखना समाचार या उपयोगी सामग्री या विषय का होना निश्चित नहीं करता है।

रोजाना दुनिया भर में हजारों की संख्या में समाचार पत्रों या चैनलों के उपयोग के लिए सामग्री का उत्पादन किया जाता है और उनमें हर समाचार पत्र और चैनल अपने अपने लिए उपयोगी सामग्री का चयन कर लेते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं हुआ कि जो घटनाएं बहस और विषय सामग्री के उत्पादन की हद में नहीं आ पाती हैं वे समाज के लिए उपयोगी नहीं होतीं। आज अधिकांश मीडिया का चरित्र ऐसा होता जा रहा है कि हम वही जान पाते हैं जो हमें परोसा जाता है। हमें क्या बताया-दिखाया जाए, यह घटनाओं के बारे में केवल पत्रकारों की समझ से तय नहीं होता, बल्कि


कारोबारी स्वार्थों से भी तय होता है। पत्रकारिता की दुनिया में भी पूंजी की गरज दिनोंदिन ज्यादा अहम होती जा रही है।

एक और उदाहरण से मैंने अपनी बात पूरी करने की कोशिश की। बताया कि देश और दुनिया के जितने सारे समाचार पत्र और चैनल हैं उनके संवाददाता या सामग्री भेजने वाले लोग जगह-जगह तैनात हैं। लेकिन वे सभी जगह नहीं हैं। उनके लिए जो उपयोगी जगहें हो सकती हैं, वे वहां-वहां तैनात हैं। देश और दुनिया के छोटे से छोटे भूगोल में एक साथ कई घटनाएं घटती हैं। घटनाएं जो दिखती हैं और जो भीतर-भीतर घटित होती हैं, जिन्हें आंखें कम दिल-दिमाग ज्यादा देख पाता है, उनमें वहां तैनात सामग्री-प्रेषक अपने लिए उपयोगी सामग्री का चयन करते हैं। यानी जनसंचार माध्यम पूरी दुनिया के सामने उस छोटे-से भूगोल की बहुत सारी घटनाओं को छोड़ देते हैं।

इस तरह से जनसंचार माध्यम स्थान विशेष की हकीकत को बेहद सीमित दायरे में ही प्रस्तुत कर पाते हैं। फिर ऐसी छोटी-छोटी जगहों से भेजी जाने वाली सामग्री में बहुत सारी सामग्री पाठकों-दर्शकों तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती है और उन तक पूरी दुनिया के बारे में आंशिक सच ही पहुंच पाता है। लेकिन यह तो हुई निहायत स्वभाविक-सी प्रक्रिया। इसमें सामग्री के उत्पादन से लेकर उसकी प्रस्तुति तक में भेदभाव के विचार घुस जाएं, सामग्री को दूसरे तरह के लाभ का जरिया बना लिया जाए तो वह दायरा कितना छोटा हो जाता है?

आखिर यह दायरा क्यों छोटा किया जा रहा है? और किस हद तक यह दायरा सिकुड़ गया है, इसका एक अंदाजा उस छात्रा के प्रासंगिकता वाले सवाल से लगाया जा सकता है। स्मृति में अगर समाज की निरंतरता और उसमें होने वाली बहसें न हों तो किसी विषय का कोई मतलब नहीं रह जाता है। तब विषय, विषय नहीं रह जाता है, वह वास्तव में सामान्य जानकारी का एक टुकड़ा भर रह जाता है। विचार के बनने की प्रक्रिया जहां से शुरू होती है, वह आधार ही खत्म किया जा रहा है। यह केवल कक्षा में नहीं हो रहा है। हर स्तर पर जारी है।

जनसंचार माध्यमों को ही लें। दैनिक समाचार पत्रों में विचारों के लिए एक पन्ना होता है। उसे संपादकीय पृष्ठ कहा जाता है। उस पर लेखों के अलावा संपादक के विचार भी होते हैं। उनमें विचार अब कितना शेष रह गया है, इसका अध्ययन किया जा सकता है। लेकिन इस पृष्ठ की एक बात जो दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा के सवाल से जुड़ती है, उसकी चर्चा यहां करना चाहूंगा। आमतौर पर इस पृष्ठ पर प्रासंगिक विषयों पर लेख प्रकाशित होते हैं। इसी तरह खबरिया चैनलों में सामयिक मुद्दों पर चर्चा होती है।

उस प्रासंगिकता का आशय यह है कि जो घटना समाचार पत्रों में छपती है उसे ही प्रासंगिक माना जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि समाचार पत्रों में वैचारिक लेख लिखने वालों का दायरा उनमें प्रकाशित होने वाली घटनाओं या प्रतिक्रियाओं तक सिमटता चला गया है। इसका एक अध्ययन हमने किया तो पाया कि कई समाजोन्मुख और जनोपयोगी विषय ऐसे हैं जो लगातार दबाए जा रहे हैं। स्थिति यह हो गई है कि सत्ता की दिनचर्या ही वैचारिक प्रतिक्रिया तक सीमित रह गई है। विचार के ढांचे में लिखने वाला लेखक विषयों को लेकर बेहद सीमित दायरे में सिमटता चला गया है। उसकी दुनिया समाचार पत्र और चैनल तक सीमित होती जा रही है।

जब वैचारिकी का स्रोत उत्पादित सामग्री होती है तो जाहिर-सी बात है कि विचार और उसकी प्रस्तुति का रंग-ढंग बदलेगा। वह सामाजिक रुचि का और जनपयोगी उस हद तक ही होगा जिस हद तक स्रोत सामग्री का उत्पादक उसे जनोपयोगी या समाजोपयोगी मानता आ रहा है। जब छात्र और लेखक का सीधा रिश्ता समाज और जन से टूट गया हो तो जाहिर-सी बात है कि उसके लिए भी प्रासंगकिता के अर्थ बदल जाते हैं। और खासतौर से अभी, जबकि यह घोषणा की जा रही है कि इतिहास का अंत हो गया, तो विषय को एक टुकड़े में बदलने की पूरी परियोजना और उसकी रूपरेखा की थाह ली जा सकती है।

किसी भी कक्षा में जाएं, बच्चे इतिहास-बोध से बिल्कुल कटे मिलते हैं। उन बच्चों को हमने ही तैयार किया है। हममें ही वे लोग हैं जो विषय को टुकड़ों में करने का अभियान चलाए हुए हैं। जो राजनीतिक समझ कल तक किसी भी बच्चे की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से शामिल होती थी, उसका राजनीतिक प्रक्रिया से जुड़ाव टूट चुका है। वे केवल रट सकते है और रटने के अभ्यास में अव्वल साबित हो रहे हैं। इसे उनकी प्रतिभा और विषय की विशेषज्ञता के रूप में गौरवान्वित किया जाता है और उन जनसंचार माध्यमों में वे हीरो कहलाते हैं। नई पीढ़ी के बीच शांति और निशस्त्रीकरण की प्रासंगिकता का प्रश्न हमारी सृजनात्मकता की पूरी प्रक्रिया पर एक बड़ा सवालिया निशान है।

 

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