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अमेरिकी रुख के विरोधाभास PDF Print E-mail
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Tuesday, 24 December 2013 10:55

पुष्परंजन

जनसत्ता 24 दिसंबर, 2013 : अमेरिका भारतीय विदेश सेवा की महिला अधिकारी से बदसलूकी के लिए माफी नहीं मांगता,

तो उस पर आश्चर्य वाली कोई बात नहीं है। दबंगई उसकी फितरत में है। उसे मुंबई के बांद्रा में रविवार को हुई नरेंद्र मोदी की रैली पर आपत्ति थी। भीड़ के कारण अमेरिकी वाणिज्य-दूतावास उसे खतरे में नजर आ रहा था। मोदी की रैली में अमेरिकी राजदूत नैंसी पावेल भी आमंत्रित थीं, जिनका न्योता भाजपा ने निरस्त कर दिया था। सुरक्षा और अपने राजनयिकों को विशेष सुविधाएं देने के सवाल पर अमेरिका आगे भी अडंगेबाजी करेगा। विएतनाम से इराक, अफगानिस्तान तक अमेरिकी कब्जे का इतिहास देखें, तो साफ पता चलता है कि इन लोगों ने सबसे अधिक औरतों-बच्चों पर जुल्म ढाए हैं, जिसका उन्हें जरा भी अफसोस नहीं है। अमेरिका ने दो टूक कह दिया कि न्यूयार्क में भारत की उप-महावाणिज्यदूत रहीं देवयानी खोबरागड़े के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले नहीं हटाएंगे। हमें इस पर भावुक होने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि इसका सामना करने की कूटनीतिक तैयारी करनी चाहिए। ठीक उसी तरह से जैसा कि अमेरिका दूसरे देशों में करता रहा है। आपको ऐसे पांच उदाहरण देते हैं, जहां अमेरिका ने अपने लोगों को कूटनीतिक छूट के नाम पर बचा लिया था।

 

पहली घटना 27 अक्तूबर 1998 की है। रूस के शहर ब्लादीवोस्तोक में अमेरिकी वाणिज्य दूत डगलस केंट की कार ने राह चलते चार लोगों को टक्कर मार दी थी, जिसमें एक सोलह साल की युवती की मौत हो गई। जांच में अमेरिकी दूत नशे में पाया गया। 24 अप्रैल 1964 से प्रभाव में आए ‘विएना कन्वेंशन आॅन डिप्लोमेटिक रिलेशंस’ द्वारा कूटनीतिकों को विशेष दर्जा दिए जाने के बहाने केंट को बचाने की कवायद की गई। मामला रूस में नहीं, अमेरिका की अदालत में चला। तर्क दिया गया कि केंट, दूतावास की गाड़ी चला रहा था, और ड्यूटी समाप्त कर लौट रहा था, इसलिए उसे दुर्घटना और युवती की मौत का जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता।

तीन दिसंबर 2004 को रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में अमेरिकी दूतावास में तैनात सैनिक क्रिस्टोफर फोन गोथम ने ट्रैफिक सिगनल तोड़ते हुए एक टैक्सी वाले को मार डाला। ‘ब्रेथलाइजर टेस्ट’ में उसके नशे में होने की पुष्टि हो गई थी। अमेरिकी मरीन क्रिस्टोफर रोमानिया से जर्मनी निकल भागा। उसे बचाने के कुप्रयासों में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने क्रिस्टोफर को दी गई कूटनीतिक छूट हटाने से मना कर दिया। एक और बहुचर्चित घटना 27 जनवरी, 2011 की है। लाहौर में दो पाकिस्तानियों को रेमंड डेविस नामक एक अमेरिकी ने गोलियों से उड़ा दिया। सीआइए के लिए अनुबंध पर काम करने वाले रेमंड ने कहा कि ये पाकिस्तानी उसे सरेआम लूटना चाह रहे थे। अमेरिका ने रेमंड को आनन-फानन में ‘डिप्लोमेट’ घोषित कर दिया। कहते हैं कि रेमंड डेविस, मृतकों के परिवार वालों को डेढ़ लाख डॉलर देकर पाकिस्तान से निकल आया।

चौथी घटना इसी साल चौदह फरवरी की है। इस्लामाबाद में अमेरिकी दूतावास की एक गाड़ी ने दो लोगों को कुचला। एक की मौके पर ही मौत हो गई। हत्या का मामला दर्ज होने के बावजूद अमेरिकी राजनयिक के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। पांचवीं घटना पांच माह बाद ग्यारह जुलाई को घटित हुई। केन्या के नैरोबी में एक अमेरिकी राजनयिक, जोशुवा वाल्दे ने दूतावास की एसयूवी से नौ लोगों को कुचल दिया, जिनमें से एक की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने केन्या सरकार से कहा कि आप हमारे राजनयिक के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकते।

भारतीय विदेश मंत्रालय को चाहिए कि वह अमेरिका से कहे कि जिस तरह राजनयिक छूट के नाम पर आप अपने लोगों को बचाते रहे, हम भी देवयानी खोबरागड़े को भारत लाते हैं, और उनके मामले की जांच करते हैं। यों भी, देवयानी खोबरागड़े को झांसी की रानी बनाने की आवश्यकता नहीं है। अगर उन्होंने वीजा के कागजात में गड़बड़ी की है, तो भारत सरकार को उसकी जांच करनी चाहिए, और जो भी प्रशासनिक कार्रवाई हो, करनी चाहिए। पर यह सब अमेरिका में नहीं, यहां, अपनी भूमि पर होना चाहिए। देवयानी खोबरागड़े, न्यूयार्क में भारत के उप-महावाणिज्यदूत के पद पर नियुक्ति से पहले पाकिस्तान, इटली और जर्मनी के दूतावासों में रह चुकी हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय को इसका पता करना चाहिए कि देवयानी ने नौकरों को लाने के मामले में क्या इस तरह की गड़बड़ी पहले भी की थी?

भारत सरकार को देवयानी को बचाने के लिए न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र के स्थायी मिशन में तबादला इसलिए करना पड़ा ताकि उन्हें विएना कन्वेंशन के तहत कूटनीतिक छूट मिल सके। सवाल यह है कि इससे पहले भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी देवयानी को कूटनीतिक का दर्जा क्यों नहीं दिया गया था?

हमसे बेहतर तो अमेरिकी हैं, जिनके दूतावास में तैनात चंगू-मंगू लोग भी डिप्लोमेट बने बैठे हैं। अमेरिकी दूतावास की दनदनाती गाड़ियों को भारतीय हवाई पट्टी तक जाने देने की छूट रही है। इसके उलट पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीज, उत्तर प्रदेश के मंत्री आजम खान, राजदूत मीरा शंकर, अभिनेता शाहरुख खान आदि को अमेरिकी हवाई अड्डे पर सुरक्षा-जांच के नाम पर अपमान झेलना पड़ा। मामला तूल पकड़ने पर हम अमेरिका को थोड़ा-बहुत कोस कर चुप हो


जाया करते थे।

कोई भारतीय बिना वर्क परमिट के अमेरिका में काम नहीं कर सकता। यहां भारत के अमेरिकी स्कूलों में राजनयिकों की बीवियां बिना किसी वर्क परमिट के पढ़ा रही हैं। अमेरिकी दूतावास, उसके वाणिज्य दूतावासों की सुरक्षा पर भारतीय करदाताओं के करोड़ों रुपए फूंके जा चुके हैं। क्या कभी उन खर्चों की मांग की गई? जितनी सुविधाएं, सुरक्षा और जगह अमेरिका में भारतीय दूतावास और मिशन को मिली हुई हैं, अपने यहां अमेरिकी दूतावास को उसके बराबर की ही सुविधाएं क्यों नहीं दी जातीं?

अमेरिका को सिर चढ़ाने का परिणाम कभी न कभी भुगतना ही था। डर और लालच के कारण हम लगातार अपनी राष्ट्रीय अस्मिता और गरिमा को गंवाते रहे। डर यह कि कहीं वह हमें इराक, अफगानिस्तान की तरह धूल में न मिला दे। लालच यह कि हमारी आउटसोर्सिंग वाली कमाई के दरवाजे अमेरिका बंद न कर दे, या भारत के नेताओं, भारतीय कंपनियों के विदेशी खाते बंद न करा दे। सच तो यह है कि पूरे एशिया में भारत अमेरिका का सबसे बड़ा बाजार है। उस कारण लाखों अमेरिकियों का रोजगार चल रहा है। अमेरिका ने शायद ही कभी चीन के विरुद्ध कूटनीतिक धौंस दिखाने की हिम्मत की हो। ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिल रहा जिसमें किसी चीनी नेता-अभिनेता की अमेरिकी हवाई अड्डे पर बेइज्जती हुई हो।

देवयानी कांड से दो हफ्ते पहले न्यूयार्क के उसी महा वाणिज्यदूतावास में संयुक्त सचिव नीना मल्होत्रा को पासपोर्ट-वीजा विभाग से हटा कर ‘आर्काइव डिवीजन’ में भेज दिया गया। नीना मल्होत्रा का कसूर यह था कि उन्होंने दिल्ली में तैनात एक समलिंगी अमेरिकी राजनयिक की ‘संगिनी’ को वीजा देने से मना कर दिया था। संयोग की बात है कि नीना मल्होत्रा पर भी न्यूयार्क में अपनी नौकरानी के शोषण का आरोप लगा था। क्या आर्काइव डिवीजन में नीना मल्होत्रा का तबादला अमेरिकी दबाव में किया गया था? इस प्रश्न का उत्तर भारतीय विदेश मंत्रालय ही बेहतर दे सकता है। नीना मल्होत्रा के तबादले पर दिल्ली में किसी भारतीय राजनयिक की हिम्मत नहीं थी कि वह सवाल उठाए।

सच यह है कि भारतीय विदेश सेवा में कई लॉबियां सक्रिय हैं, जो एक-दूसरे की काट में हैं। भारत के कोई डेढ़ सौ दूतावास और वाणिज्य दूतावास हैं, जिनमें लगभग साढ़े सात सौ राजनयिक नियुक्त हैं। उत्तर अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया सबसे ‘प्राइज पोस्टिंग’ वाली जगहें हैं, दूसरे दर्जे में मध्य एशिया है। भारतीय विदेश सेवा के अधिकतर राजनयिकों को पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अफ्रीकी देशों (दक्षिण अफ्रीका छोड़ कर) में नियुक्ति पसंद नहीं है।

गौरतलब है कि शायद ही जर्मन, फ्रांसीसी, इतालवी राजनयिक अपने देश से घरेलू नौकर लाते हैं। भारत स्थित विदेशी मिशनों में घरेलू नौकर आपको स्थानीय ही मिलेंगे। इसके ठीक उलट बहुत-से भारतीय राजनयिक भारत से घरेलू नौकरानी ले जाने में अपनी शान समझते हैं। घरेलू नौकरानी को लेकर पहले भी कई बार भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी फंस चुके हैं, और देश का सिर झुका है। आज से बीस साल पहले जेनेवा में व्यापार-दूत रहे इमैनुअल बरुआ, भारतीय नौकरानी के शोषण के आरोप से इतने घिर गए कि उन्हें समय से पहले ही नौकरी छोड़नी पड़ी।

सन 2008 में स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में भारतीय नौकरानी वाला झमेला एक बार फिर आया, जिससे मुक्ति के लिए एक दूसरे भारतीय राजनयिक को लाखों रुपए देने पड़े। 1999 में पेरिस स्थित भारतीय दूतावास के प्रथम सचिव अमृत लुगून पर भारत से लाई गई नौकरानी के शोषण का आरोप लगा। कांग्रेस की एक नेता के दामाद अमृत लुगून पूरे समय पेरिस में रहे, और इस प्रश्न पर फ्रेंच मीडिया उनकी छीछालेदर करता रहा। हम तब भी नहीं चेते। क्या विदेश मंत्रालय को तभी यह दिशा-निर्देश नहीं बनाना चाहिए था कि भारतीय राजनयिक घरेलू नौकर रखेंगे, तो उनकी सेवा शर्तें क्या होंगी?

सोच कर आश्चर्य होता है कि अमेरिका से दोस्ती का भ्रम पालने वाला हमारा विदेश मंत्रालय अब तक भारतीय दूतावास के सभी कर्मचारियों को कूटनीतिक दर्जा दिलाने में कोताही क्यों बरतता रहा, जबकि अमेरिका स्थित रूसी, चीनी दूतावास के सभी कर्मी राजनयिक विशेषाधिकार से लैस हैं। अमेरिका ने यही विशेषाधिकार भारत स्थित अपने कूटनीतिक मिशनों के कर्मचारियों के लिए हासिल किया हुआ है।

भारत को अब क्यों होश आया कि अमेरिका के साधारण कर्मियों को हमने राजनयिक का दर्जा देकर गलती की है। इन राजनयिकों के बाल-बच्चे बिना वर्क परमिट के यहां कैसे काम कर रहे हैं? क्या उनके विरुद्ध टैक्स-चोरी का मामला नहीं बनता? अगर वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास, न्यूयार्क स्थित प्रधान वाणिज्य दूतावास के इर्दगिर्द बैरीकेड्स की सुरक्षा नहीं है, तो दिल्ली में क्यों? यों भी अमेरिकी दूतावास के आगे से बैरीकेड्स हटा कर हमने कोई बड़ा तीर नहीं मार लिया था। यह अमेरिका के विरुद्ध प्रतीकात्मक आक्रोश व्यक्त करने से अधिक कुछ नहीं है। पाकिस्तान में यही कुछ हुआ होता तो जवाब में हम उसके किसी राजनयिक को दिल्ली में हथकड़ी पहना चुके होते।

 

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