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किशनगंगा पर भारत के हक में फैसला PDF Print E-mail
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Sunday, 22 December 2013 09:18

नई दिल्ली। भारत को बड़ी राहत देते हुए हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत ने पाकिस्तान की आपत्तियों को खारिज कर दिया और जम्मू कश्मीर में किशनगंगा नदी से पानी का प्रवाह मोड़कर विद्युत उत्पादन करने के नई दिल्ली के अधिकार को बरकरार रखा है। भारत पाकिस्तान मध्यस्थता मामले में अंतिम फैसला सुनाते हुए अदालत ने यह भी फैसला दिया कि भारत को किशनगंगा जल विद्युत परियोजना के नीचे से ‘हर वक्त’ किशनगंगा-नीलम नदी में कम से कम नौ क्यूमेक्स (घन मीटर प्रति सेकेंड) पानी जारी करना होगा। इस साल 18 फरवरी को दिए गए आंशिक फैसले में न्यूनतम प्रवाह का मुद्दा अनसुलझा रहा था।

अदालत ने शुक्रवार को दिए अपने अंतिम फैसले में कहा कि किशनगंगा नदी से जल प्रवाह की दिशा प्रथम बार मोड़ने के सात साल बाद भारत और पाकिस्तान दोनों स्थायी सिंधु आयोग और सिंधु जल समझौते की रूपरेखा के मुताबिक निर्णय पर ‘पुनर्विचार’ कर सकते हैं। आंशिक फैसले में अदालत ने सर्वसम्मति से निर्णय किया था कि जम्मू कश्मीर में 330 मेगावाट की परियोजना में सिंधु जल समझौते की परिभाषा के तहत नदी का प्रवाह बाधित नहीं होना चाहिए। मध्यस्थता अदालत ने कहा कि विद्युत उत्पादन के लिए किशनगंगा-नीलम नदी से पानी के प्रवाह की दिशा मोड़ने के लिए भारत स्वतंत्र है।

अदालत ने भारत को परियोजना के लिए पानी मोड़ने का अधिकार दे दिया है और निर्बाध पानी के प्रवाह के पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर लिया है। भारत ने कहा कि वह जम्मू कश्मीर में किशनगंगा जल विद्युत परियोजना पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत के फैसले का वह अध्ययन कर रहा है। फैसले में नई दिल्ली से नदी में जल के कुछ प्रवाह को हमेशा बनाए रखने को कहा गया है।

विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि मौजूदा अंतिम फैसले में जिक्र है कि पर्यावरण के लिहाज से किशनगंगा नदी में हर


वक्त नौ क्यूमेक्स (घनमीटर प्रति सेकेंड) जल प्रवाह बनाए रखना होगा। पाकिस्तान सौ क्यूमेक्स प्रवाह चाहता था जिससे यह काफी कम है। उन्होंने कहा कि ये तकनीकी दस्तावेज हैं जिनका विशेषज्ञ अध्ययन कर रहे हैं।

पाकिस्तान ने दावा किया है कि परियोजना के कारण नदी जल में इसका करीब 15 फीसद हिस्सा गायब हो जाएगा। इसने भारत पर आरोप लगाए कि वह पाकिस्तान के नीलम-झेलम जल विद्युत परियोजना (एनजेएचईपी) को नुकसान पहुंचाने के लिए नदी जल को मोड़ने का प्रयास कर रहा है। अदालत ने कहा कि किशनगंगा जल विद्युत परियोजना (केएचईपी) की भारत ने पाकिस्तान के एनजेएचईपी परियोजना से पहले कार्ययोजना बनाई थी और परिणामस्वरूप केएचईपी को ‘प्राथमिकता’ मिलती है।  अंतिम फैसला दोनों देशों के लिए बाध्यकारी है और इस पर अपील नहीं किया जा सकता।

पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि 1960 के प्रावधानों के तहत 17 मई, 2010 को भारत के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अदालत का रुख किया था।

सिंधु जल समझौता अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिस पर भारत और पाकिस्तान ने 1960 में दस्तखत किए थे जिसके तहत दोनों देशों के बीच सिंधु नदी के जल के इस्तेमाल को लेकर दिशानिर्देश हैं। केएचईपी की रूपरेखा ऐसे तैयार की गई है जिसके तहत किशनगंगा नदी में बांध से जल का प्रवाह मोड़कर झेलम की सहायक नदी बोनार नाला में लाया जाना है। सात सदस्यीय मध्यस्थता अदालत की अध्यक्षता अमेरिका के न्यायाधीश स्टीफन एम. स्वेबेल हैं जो अंतराराष्ट्रीय न्यायालय के पूर्व अध्यक्ष थे।

अन्य सदस्यों में फ्रैंकलिन बर्मन और होवार्ड एस. वीटर (ब्रिटेन), लुसियस कैफलिश (स्विट्जरलैंड), जान पॉलसन (स्वीडन) और न्यायाधीश ब्रूनो सिम्मा (जर्मनी) पीटर टोमका (स्लोवाकिया) है। मध्यस्थता अदालत ने जून, 2011 में किशनगंगा परियोजना स्थल और आसपास के इलाकों का दौरा किया था।

 

(भाषा)

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