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दक्षिणावर्त : बदलाव की गंध PDF Print E-mail
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Sunday, 08 December 2013 09:50

तरुण विजय

जनसत्ता 8 दिसंबर, 2013 : सेंगखासी मेघालय का बेहद अल्पसंख्यक जनजातीय समुदाय है। एक समय था जब खासी, जयंतिया और गारो की पहाड़ियों पर इन्हीं का राज्य था और वीरता में ही नहीं, ज्ञान और संस्कृति के मामले में भी यह समुदाय अद्वितीय था। इस समाज का प्रभाव इंडोनेशिया, लाओ और कंबोडिया के जनजातीय पहनावे, बोलचाल और रीतिरिवाजों तक देखा गया। लगभग डेढ़ सौ साल पहले अंग्रेज वहां आए और अपनी सत्ता को मजबूत करने के तमाम उपकरण और तौर-तरीके अपनाते हुए ब्रिटिश मिशनरी भी अपनी छत्रछाया में ले आए।

खासी समाज के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी तीरथ सिंह (जिन्हें खासी भाषा में श्री के लिए यू का प्रयोग करते हुए यू तीरोथ सिंह कहा जाता है) की शहादत आज भी प्रेरणा का स्रोत है। जब ब्रिटिश अत्याचार और धर्मांतरण की तीव्रता बढ़ी तो 23 नवंबर, 1899 को सोलह खासी नौजवानों ने अपनी जनजातीय आस्था और परंपरा बचाने के लिए सेंगखासी संगठन की स्थापना की। अब यह दिन एक त्योहार बन गया है, जिसे सेंगकुट स्नेम कहा जाता है। इस दिन चावल और जल के साथ निराकार ईश्वर की पूजा की जाती है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्थापित सेंगखासी आंदोलन के नायकों का स्मरण करते हुए नई पीढ़ी में अपनी संस्कृति और समाज की धार्मिकता के संस्कार रोपे जाते हैं। इस दिन एक प्रसिद्ध खासी उक्ति दोहराई जाती है- ‘लाएद लालादेय, बुरोम इया कीवेई’ यानी अपना भी सम्मान करो और दूसरों का भी सम्मान करो।

ये सीधे-साधे जनजातीय लोग आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस वर्ष 23 नवंबर को मैं उनके उत्सव में सम्मिलित होने शिलांग में था। बहुत सुंदर शहर है। चारों ओर विश्व प्रसिद्ध वृक्ष चीड़ के सघन वन, पहाड़ी घुमावदार सड़कें, विनम्र और सुशिक्षित लोग। आज मेघालय में नब्बे प्रतिशत से अधिक ईसाई समाज है। यहां का जनजीवन ही नहीं, राजनीति भी चर्च द्वारा नियंत्रित होती है। यहां के केंद्रीय और बहुत बड़े क्षेत्र में फैले कैथेड्रल में भी गया, जहां के मुख्य पास्टर फादर पोएस से मुलाकात हुई। काफी विषयों पर चर्चा हुई। इनके विद्यालय बहुत प्रसिद्ध और अच्छी शिक्षा के लिए जाने जाते हैं। शिलांग में भारतीय प्रबंधन संस्थान और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे शिखर शिक्षा केंद्र भी हैं। नार्थ ईस्ट हिल यूनिवर्सिटी का विराट परिसर है। यह सब होते हुए भी हवा में असंतोष, गुस्सा और दिल्ली से दूरी बढ़ाने की आवाजें सुनाई देती हैं। यहीं आकर पता चला कि सेंगखासी समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा तक नहीं दिया गया है और यह दर्जा दिलाने के लिए इस समुदाय का नब्बे प्रतिशत हिस्सा और उसके हाथ में केंद्रित सत्ता पूरी तरह से जुटी हुई है।

सेंगखासी समाज के लोग शांतिपूर्ण ढंग से अपने स्कूल चला रहे हैं। बड़ी मुश्किल से कुछ सरकारी नौकरियों, छोटी-मोटी दुकानदारियों और खेती-बाड़ी से अपना गुजारा करते हैं। मेघालय में आठ-नौ आतंकवादी और भारत-विरोधी संगठन सक्रिय हैं। इन्हें म्यामां और बंग्लादेश में शरण भी मिलती है और उन्हीं रास्तों से इन्हें विदेशी सहायता भी। पर सेंगखासी के नौजवान न भारत से विद्रोह करते हैं, न आतंकवाद फैलाते हैं। ‘शायद यही हमारा अपराध या हमारी सबसे बड़ी कमजोरी भी है’, व्यंग्य से एक सेंगखासी नौजवान ने कहा।

दुनिया में शायद अकेला यहां का उदाहरण होगा कि नब्बे प्रतिशत समाज को जनजातीय समाज की सुविधाओं और केंद्रीय सहायताओं के साथ-साथ अल्पसंख्यक वर्ग को मिलने वाले केंद्रीय अनुदान और छात्रवृत्तियां भी मिलती हैं, लेकिन जो वास्तविक दस प्रतिशत अल्पसंख्यक गैर-हिंदू, गैर-ईसाई जनजातीय आस्था और प्रकृति में विश्वास का हजारों वर्ष पुराना समुदाय है, उसे बहुसंख्यक मान कर सुविधा और छात्रवृत्तियों से वंचित कर दिया गया है।

मेघालय का निर्माण 1972 में हुआ था और तब खासी, जयंतिया और गारो के परंपरागत जनजातीय नेताओं ने सोचा था कि अंग्रेजों के समय उन पर जो अत्याचार और अन्याय हुआ अब उससे भी बचेंगे और अपनी रक्षा कर पाएंगे। लेकिन हुआ ठीक उल्टा। सबसे ज्यादा खासी और जयंतिया समाज का


धर्मांतरण 1972 के बाद हुआ, क्योंकि सत्ता और राजनीति की शक्ति मिलने के बाद धर्मांतरण का काम और मजबूती से चला तथा जो धर्मांतरित नहीं हुए उन्हें सरकार की सभी केंद्रीय सुविधाओं और ढांचागत विकास से अलग रखा गया।

सेंगखासी नेता बानतीलॉग सिंह रूमोंग कहते हैं कि हम दिल्ली कैसे जाएं? गुवाहाटी से ही रास्ता है जो खराब ही नहीं, अक्सर आतंकवादी, विद्रोही गतिविधियों के कारण अव्यवस्थित रहता है। दिल्ली से शिलांग की कोई सीधी उड़ान नहीं है। दिल्ली से आकर कोई हमारी शिकायतें सुनने के लिए उत्सुक नहीं होता। हमें अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। अगर हम हथियार उठाएंगे तो दिल्ली वाले कहेंगे कि हम देश के विरुद्ध काम कर रहे हैं। जब हम देश के साथ अपनी निष्ठा जोड़ते हैं तो देश हमारे खिलाफ काम करता है।

देश के अल्पसंख्यक आयोग ने संविधान की धारा 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यक शब्द की व्याख्या में मेघालय के सेंगखासी समुदाय को जोड़ने के लिए कहा और राज्य सरकार से आग्रह किया कि वह प्रदेश में ऐसा अल्पसंख्यक विकास और वित्त आयोग बनाए, जिसमें सेंगखासी समाज को भी शामिल किया जाए। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। प्रदेश में सेंगखासी समुदाय के जितने भी विद्यालय चल रहे हैं उनमें से किसी में भी न तो अल्पसंख्यक वर्ग को मिलने वाली छात्रवृत्तियां दी जाती हैं और न ही शिक्षा की वे सुविधाएं, जो इस वर्ग के लिए सरकार ने घोषित की हैं। जबकि ईसाई बहुल विद्यालयों में अच्छे संपन्न वर्ग के बच्चे भी अल्पसंख्यक और जनजातीय दोनों सुविधाएं बटोर लेते हैं। 2010 से सेंगखासी का आंदोलन चल रहा है कि उन्हें अल्पसंख्यक दर्जा दिया जाए। मगर न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार उन्हें जवाब देती है।

कोई यह प्रश्न नहीं पूछना चाहता कि अत्यंत मेधावी और उद्यमी नौजवानों के बावजूद जम्मू-कश्मीर उद्योग विहीन क्यों है? क्यों शेष देश के निवेशक और उद्यमी वहां कारखाने और अन्य क्षेत्रों में पैसा नहीं लगा सकते? क्यों वहां श्रेष्ठ और विशेष सुविधाओं वाले अस्पताल नहीं खोले जाते? इन सबका एक ही जवाब है- धारा 370 शेष देश से किसी को यहां समान अधिकार ही नहीं देती। उमर अब्दुल्ला की बहन को भले सत्तावन साल बाद उच्च न्यायालय के आदेश से समान अधिकार मिले हों, लेकिन क्या जो अधिकार उमर अब्दुल्ला की संतान को प्राप्त हैं वे सारा या सुनंदा पुष्करणा की संतान को भी प्राप्त हैं? नहीं।

भारत को संकुचित करने वाली इन सब स्थितियों पर राजनीतिक मतैक्य क्यों नहीं होना चाहिए?

भारत संभवत: अग्निमंद हो गया है। जो अग्नि इन तमाम द्वेष, वैमनस्य, ऐक्य-संहारक तत्त्वों को भस्म कर अंतर्निहित तेजस्वी अटूट भाईचारे को पैदा करे, उस अग्नि का आवाहन ही इस अग्निमंदता को दूर कर सकता है।

कश्मीर में सिर्फ तिरंगा फहराने पर रोक नहीं है, पाठ्यपुस्तकों में राष्ट्रगीत भी नहीं छापा जाता। विद्यालयों में गांधी, नेहरू, सुभाष, शिवाजी या क्रांतिकारियों के चित्र नहीं लगते। मणिपुर में हिंदी प्रतिबंधित है। मेघालय में राष्ट्र के प्रति निष्ठा रखने वाले सिर्फ इसलिए दंडित होते हैं, क्योंकि वे धर्मांतरित नहीं हुए। लद्दाख में चारों तरफ से इस्लामी समाज से घिरे हुए बौद्ध अपनी भोटी भाषा बचाने के लिए संघर्ष करते हैं। अरुणाचल प्रदेश में चीनियों के अहंकारी विस्तारवाद को जवाब दे रहे नौजवान खेल का अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक मैदान, दिल्ली-कोलकत्ता-मुबंई से जोड़ने वाली उड़ानों से युक्त हवाई अड््डा और गुवाहाटी से जोड़ने वाली रेल-लाइन की मांग करते-करते विद्रोही हो रहे हैं। लेकिन क्या दिल्ली उनकी सुनती है?

यह देश इन महान देशवासियों के प्रति न्याय करे, इसके लिए जरूरी है कि अब यह माहौल बदले। हवा में बदलाव की गंध तो तिरती दिखती है।

 

 

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