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लोकतांत्रिक नैतिकता और तीन सौ सत्तर PDF Print E-mail
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Saturday, 07 December 2013 10:47

नंदकिशोर आचार्य

जनसत्ता 7 दिसंबर, 2013 : भारतीय संविधान के अनुच्छेद तीन सौ सत्तर अर्थात जम्मू-कश्मीर राज्य की विशेष संवैधानिक स्थिति को लेकर राजनीतिक वातावरण को गर्माने की ताजा कोशिश के पीछे कितनी भूमिका चुनावों की है- विशेषतया आगामी लोकसभा चुनावों की- और कितनी शुभ मंतव्य की, इसे लेकर बहस में न भी पड़ें तो भी यह समझना आवश्यक है कि यह अनुच्छेद वास्तव में है क्या और इसे निरस्त करने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है। यह अनुच्छेद, दरअसल, जम्मू-कश्मीर राज्य से संबंधित कानून बनाने के बारे में संसद की शक्ति को सीमित करता है और इसके अंतर्गत ही जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना अलग संविधान है।

लेकिन यह अलग संविधान भारतीय संविधान की अवहेलना या उल्लंघन नहीं है, जैसा कि अक्सर समझ लिया जाता है, क्योंकि इसकी अनुमति स्वयं भारतीय संविधान द्वारा ही दी गई है और भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिए गए आदेश के अनुसार ही जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए संविधान-सभा का गठन और उसके द्वारा निर्मित संविधान को वहां लागू किया गया है। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को एक अस्थायी प्रावधान माना गया है, लेकिन इसे हटाने या इसमें कोई संशोधन करने के लिए यह अनिवार्य है कि इसकी अनुशंसा जम्मू-कश्मीर राज्य की संविधान-सभा या उसकी उत्तराधिकारी उस राज्य की विधानसभा द्वारा की जाए। दूसरे शब्दों में, इसका तात्पर्य यह है कि राज्य की जनता के द्वारा निर्वाचित विधानसभा की ओर से किए गए प्रस्ताव के अभाव में इस अनुच्छेद में कोई परिवर्तन अथवा इसकी समाप्ति किया जाना असंवैधानिक होगा।

बहुत-से राजनीतिक विश्लेषक इस अनुच्छेद के औचित्य पर सवाल उठाते और इसे तत्कालीन नेहरू-सरकार की भूल मानते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर का प्रावधान स्वयं भारत की संविधान-सभा द्वारा किया गया था। यह मान लेना कि इसके पीछे केवल नेहरू का सुझाव था, प्रकारांतर से यह मान लेना होगा कि इस देश के संविधान-निर्माता पंडित नेहरू की कठपुतलियां थे और हमारा देश एक कठपुतली संविधान-सभा द्वारा बनाए गए संविधान द्वारा शासित होता रहा है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि इस प्रावधान को उन सरदार पटेल की भी स्वीकृति प्राप्त थी, जिन्हें हम ‘लौह-पुरुष’ कह कर याद करते हैं। कोई भी राजनीतिक निर्णय अपने समय की ऐतिहासिक परिस्थिति की समझ पर निर्भर होता है। उसे किसी एक व्यक्ति की मंशा के अनुरूप नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि हमारी पूरी संविधान-सभा की समझ को ही हम आज गलत मान लें, पर उसे किसी एक व्यक्ति की अनुगामिनी मान लेना तो उसकी नैतिक वैधता को ही संदेह के घेरे में ले आना होगा- यह भूलते हुए कि हमारे सभी त्यागमूर्ति माने जाने वाले स्वतंत्रता-सेनानी उसके सदस्य थे।

इस बात पर तो इतिहासकारों में बहस होती रह सकती है कि तत्कालीन परिस्थिति की संविधान-सभा की समझ सही थी या नहीं और जम्मू-कश्मीर राज्य की विशेष स्थिति का संवैधानिक प्रावधान किए जाने के औचित्य पर भी सवाल उठाए जाते रहे जा सकते हैं- जिन पर कोई सर्वस्वीकृति तो लगभग असंभव ही है- जैसे कि भारत-विभाजन को लेकर हम आज भी उठाते रहते हैं। लेकिन, जैसे अब पाकिस्तान के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के अस्तित्व से भी- और अब उसके बारे में कोई भी निर्णय आज की परिस्थिति और संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही लिया जा सकता है।

दरअसल, इसके संबंध में कोई भी निर्णय लिए जाने से पहले मोटे तौर पर तीन दृष्टियों से विचार किया जाना आवश्यक है। प्रथमत:, किसी भी राजनीतिक निर्णय को नैतिक दृष्टि से उचित होना चाहिए। क्या अपने वादे से मुकर जाना नैतिक कहा जाएगा? जम्मू-कश्मीर राज्य का भारत संघ में विलय करते समय- चाहे जिस कारण से हो- जो वादा किया गया था, क्या संविधान-सभा द्वारा उसी से मुकर जाना नैतिक होता? और यदि आज हम उसकी अनदेखी कर देते हैं तो क्या वह नैतिक दृष्टि से उचित कहा जा सकता है?

यह नहीं भूलना चाहिए कि महाराजा हरिसिंह भारत में विलय नहीं चाहते थे और पाकिस्तानी आक्रमण का मुकाबला नहीं कर पाने की स्थिति में ही उन्होंने विलय स्वीकार किया था।

कश्मीर को अलग दर्जा देने का यद्यपि विलय-पत्र में  जिक्र नहीं है, लेकिन भारत सरकार के तत्कालीन पत्र-व्यवहार में यह स्वीकार किया गया था कि आक्रांता से छुटकारा मिलने और कानून-व्यवस्था की स्थिति सामान्य हो जाने पर विलय का मसला जम्मू-कश्मीर के लोगों की सहमति से हल किया जाएगा। शेख अब्दुल्ला और उनकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस कश्मीरी जनता का प्रतिनिधित्व व नेतृत्व उसी तरह करते थे, जिस प्रकार तत्कालीन कांग्रेस पूरे देश का। अब सवाल यह है कि क्या आज हमारा इस वादे से इनकार कर देना नैतिक होगा! लोगों की इच्छा जानने के दो तरीके हो सकते हैं- जनमत-संग्रह या जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा गठित कोई निकाय अर्थात विधानमंडल।

यह पूछा जाता है कि क्या विशेष संवैधानिक प्रावधान जम्मू-कश्मीर राज्य के हित में है। इसका फैसला तो वहां की जनता या विधानसभा ही कर सकती है। हां, इतना अवश्य है कि यदि यह विशेष अनुच्छेद नहीं होता तो निश्चय ही कश्मीर में भी उसी तरह का आंतरिक उपनिवेशीकरण हो गया होता जैसा छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, आंध्र, ओड़िशा, महाराष्ट्र आदि के कुछ क्षेत्रों में हो रहा है।

हमें यहां यह भी स्मरण रखना चाहिए कि विशेष संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था केवल जम्मू-कश्मीर के लिए नहीं है। नगालैंड, मिजोरम, सिक्किम, मणिपुर, अरुणाचल, आंध्र आदि राज्यों के बारे में भी उनकी आवश्यकता के अनुरूप कुछ विशेष प्रावधान किए गए हैं। कई राज्यों में भूमि खरीदने के लिए भी कुछ विशेष प्रतिबंध लगाए हुए हैं। लेकिन, नैतिक दृष्टि से मुख्य सवाल यही है कि क्या हमारे द्वारा उस वचन को भुला दिया जाना उचित होगा, जिसे स्वयं हमने ही कभी एक आधारभूत नैतिक अनिवार्यता माना था।

दूसरा मुद्दा राजनीतिक औचित्य का है। किसी भी लोकतांत्रिक राजन                       ीति की


बुनियादी शर्त ही यही है कि उसमें जनता की इच्छाओं की अवहेलना नहीं की जा सकती। अच्छा लोकतंत्र वही है, जहां स्थानीय मुद्दों को स्थानीय लोगों की सहमति और सहभागिता के आधार पर सुलझाया जाए। मानवाधिकारों की बुनियादी संकल्पना ही यही है कि किसी भी प्रदेश का शासन और विकास वहां के निवासियों की राय और सहभागिता के आधार पर ही होना चाहिए। हमारे देश में मानवाधिकारों से प्रेरित जितने जन-आंदोलन चल रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि में अधिकांशत: स्थानीय निवासियों के हितों और आकांक्षाओं की अवहेलना या दमन रहा है। अच्छा लोकतंत्र वही है, जिसमें अधिकाधिक विकेंद्रीकरण हो और स्थानीय संस्थाओं का कार्यक्षेत्र अधिकाधिक विस्तृत हो। एक संघ राज्य में प्रदेशों और उप-प्रदेशों के वैशिष्ट्य और स्वायत्तता का अधिकाधिक सम्मान अपेक्षित है। कश्मीर ही नहीं, अन्य प्रदेशों और उनके उप-प्रदेशों को अधिकाधिक स्वायत्तता ही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को औपचारिक से वास्तविक बना सकती है। यदि हम मानते हैं कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर की अब कोई आवश्यकता नहीं है तो भी जम्मू-कश्मीर के लोगों की सहमति के बिना उसे समाप्त करने की कोई भी कोशिश राजनीतिक दृष्टि से भी न केवल अलोकतांत्रिक बल्कि आत्मघाती ही सिद्ध होगी।

तीसरी कसौटी संवैधानिक है। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के विरोधियों का कहना है कि राष्ट्रपति जब चाहें अपने एक आदेश मात्र से इस अनुच्छेद को निरस्त कर सकते हैं। अभी-अभी भारतीय जनता पार्टी के एक नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी इसी आशय का एक बयान दिया है। जब इन विरोधियों से यह कहा जाता है कि इस अनुच्छेद को निरस्त करने की प्रक्रिया को स्वयं इस उपबंध की उपधारा तीन में ही स्पष्ट करते हुए निर्देश दिया गया है कि इस अनुच्छेद में किसी भी संशोधन अथवा इसके ‘प्रवर्तन में न रहने’ के बारे में ‘राष्ट्रपति द्वारा कोई भी अधिसूचना निकाले जाने से पहले उस राज्य की संविधान-सभा की सिफारिश आवश्यक होगी’। संविधान-सभा क्योंकि अब नहीं है, अत: स्वाभाविक ही उसकी वैधानिक उत्तराधिकारी विधानसभा द्वारा ऐसी सिफारिश किया जाना एक संवैधानिक अनिवार्यता है।

अत: स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर राज्य की सिफारिश के बिना इस अनुच्छेद में कोई भी परिवर्तन या इसे निरस्त करना घोर असंवैधानिक होगा। इसके उत्तर में कभी-कभी यह भी कहा गया है कि संविधान-संशोधन के लिए विनिर्दिष्ट प्रक्रिया अर्थात अनुच्छेद तीन सौ अड़सठ के अनुसार इस अनुच्छेद को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि स्वयं संविधान में ही यह स्पष्ट कर दिया गया है कि तीन सौ अड़सठ में दी गई संशोधन-प्रक्रिया अनुच्छेद तीन सौ सत्तर पर लागू नहीं होगी।

यहां यह भी स्मरणीय है कि कश्मीर का अलग संविधान बनने और उसमें समय-समय पर हुए परिवर्तनों की प्रक्रिया सदैव अनुच्छेद तीन सौ सत्तर के अनुसार ही पूरी की गई है। अब अचानक यदि हम तीन सौ अड़सठ की सामान्य संशोधन-प्रक्रिया को तीन सौ सत्तर पर लागू करते हैं तो उसकी कोई न्यायिक वैधता नहीं होगी क्योंकि कानूनी प्रक्रिया के अनुसार भी पूर्वोदाहरण या मिसाल- प्रिसिडेंट- भी कानून की हैसियत अख्तियार कर लेता है।

लेकिन, साथ ही, यह भी विचार कर लिया जाना चाहिए कि आज इस अनुच्छेद के अंतर्गत व्यावहारिक स्थिति क्या है। इसी अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति ने समय-समय पर कई संशोधन आदेश जारी किए हैं जो जम्मू-कश्मीर राज्य पर आज लागू हैं। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह आदेश है कि संघ की कार्यपालिका-शक्ति जम्मू-कश्मीर पर भी प्रभावी है, जिसके अनुसार राज्यपालों की नियुक्ति की गई है और कई बार विधानसभा को निलंबित या भंग किया गया और राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता रहा है व राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग केंद्रीय विधि के आधार पर केंद्र के निर्देशानुसार होता है।

उच्चतम न्यायालय के निर्णय जम्मू-कश्मीर राज्य पर भी लागू होते हैं। चुनाव-प्रक्रिया का नियंत्रण चुनाव आयोग द्वारा होता है। केंद्र की आर्थिक नीतियां अन्य राज्यों की तरह जम्मू-कश्मीर पर भी विधि के अनुसार लागू होती हैं। महालेखा परीक्षक का नियंत्रण भी राज्य पर लागू है।

यहां इस बात का संज्ञान भी लिया जाना चाहिए कि भारतीय संविधान के अनुसार प्रत्येक राज्य कई विषयों पर अपने कानून और नीतियां बना सकता है। यह अधिकार जम्मू-कश्मीर को भी प्राप्त हो तो इसे अन्यथा नहीं समझा जा सकता। दोहरी नागरिकता की स्वीकृति कई देशों में है। यदि कोई भारत का नागरिक होते हुए किसी अन्य देश का नागरिक तक भी हो सकता है, तो देश में भी विशेष परिस्थिति में दोहरी नागरिकता कोई ऐसा मसला नहीं है, जिसे अलगाववादी समझा जाए। देश के अन्य कई राज्यों में भी भूमि-संपत्ति आदि खरीदने के बारे में मूल निवासी संबंधी कई प्रतिबंध लागू होते हैं। दरअसल, इस तरह की अबाध छूट देना स्थानीय निवासियों के हितों के अधिकांशत: प्रतिकूल ही होता है। देश के आदिवासी-वनवासी इलाकों में जो असंतोष और हिंसापूर्ण प्रतिरोध देखने में आ रहा है, वह मूलत: इस अबाध छूट का ही नतीजा है।

वस्तुत:, अनुच्छेद तीन सौ सत्तर और कश्मीर पर पाकिस्तान से हमारा विवाद दो अलग मसले हैं। उनमें घालमेल करना उचित नहीं है। किसी भी आंतरिक राजनीतिक मसले का हल लोकतांत्रिक नैतिकता, मानवाधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही होना चाहिए- जैसे अंतरराष्ट्रीय विवादों का हल भी शांतिपूर्ण उपायों से किया जाना अपेक्षित होता है। किसी भी मसले का हल तभी उचित रूप से निकल सकता है, जब हम संबंधित पक्ष को सहानुभूति से समझ सकें। हर मसले पर बातचीत और विचार-विमर्श संभव है, यदि हमारा मंतव्य और नीयत केवल राजनीतिक लाभ के बजाय लोकतांत्रिक नैतिकता से अनुप्राणित हो। लोकतंत्र बहुमत की तानाशाही नहीं होता।

 

 

 

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