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आप पर अटकलें बहुत, मगर नजरें हकीकत पर PDF Print E-mail
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Thursday, 05 December 2013 09:24

मनोज मिश्र

नई दिल्ली। दिल्ली चुनाव का सारा फोकस नई पार्टी ‘आप’ और राजधानी के सत्तर विधायकों पर रहा। चुनाव प्रचार में तो महंगाई, भ्रष्टाचार, बिजली, पानी जैसे सभी मुद्दे प्रमुखता से उठाए गए ही और मतदान स्थल पर उनका असर भी होता दिखा लेकिन चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा दिल्ली के सभी 70 विधायक थे और चुनाव पर लगने वाले सारे कयास नई पार्टी ‘आप’ की ताकत पर लगते दिखे।

यह पार्टी कितने वोट लेगी। किस दल को मिलने वाले वोट उसे मिल रहे हैं। शुरू में तो लगा कि भाजपा के परंपरागत मध्यमवर्गीय मतदाताओं में यह पार्टी सेंध लगा रही है। फिर कहा गया कि उसे सरकार विरोधी वोट ज्यादा मिल रहे हैं।

 

उनके खिलाफ स्टिंग आपरेशन होने तक तो कहा जाने लगा कि उसे कांग्रेस के कहे जाने वाले गरीब वोट भी मिल रहे हैं। सरकार बनाने और 50 तक सीटें लाने के उसके नेताओं के दावों को उसी तरह हवाई माना जाता रहा जैसे 50 फीसद बिजली बिल कम करने या हर घर में मुफ्त 700 लीटर पानी पहुंचाने की घोषणा को लोगों ने हवाई मान लिया। उसके नेता अरविंद केजरीवाल के बड़बोलेपन पर लोग खफा हुए लेकिन सत्ता के दावेदार दोनों दल कांग्रेस और भाजपा के नेता चाह कर भी आप पार्टी को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। यह मतदान के दिन दिल्ली के ज्यादातर इलाकों में दिखा।

शुरू से परंपरा रही है कि दिल्ली में कांग्रेस व भाजपा में सीधी लड़ाई होती है। इतना ही नहीं हर बार निगम, विधान सभा ( पहले महानगर परिषद) में सत्ता बदल जाती है। नगर निगम में जनसंघ (भाजपा का पुराना रूप) पहले एक बार और 2007 से लगातार दूसरी बार जीता। विधान सभा में कांग्रेस तीन बार लगातार जीत कर चौथी बार दावेदारी कर रही है। शायद यही कारण भी रहा कि लगातार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित का राजनीतिक कद दिल्ली में पार्टी से बड़ा हो गया और इस चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष समेत दूसरे नेताओं ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। 1998 की कांग्रेस की जीत को भाजपा की हार ज्यादा माना जाता है। पार्टी के झगड़े, तीन मुख्यमंत्री बदलना और प्याज- आलू की मंहगाई आदि भाजपा की हार के बड़े कारण थे। 2003 की कांग्रेस की जीत को शीला दीक्षित के अच्छे शासन की जीत माना जाता है। आज जैसे आप पार्टी का शोर है तब उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने वाली बसपा का दिल्ली में शोर था।

माना जाता है कि कांग्रेस की जीत में अल्पसंख्यकों के अलावा दलितों की बड़ी भागीदारी होती है, इसलिए गरीबों को कांग्रेस का सबसे बड़ा वोट बैंक माना जाता है। बसपा के असर कम करने के लिए कांग्रेस ने दिल्ली के सबसे बड़े दलित नाम चौधरी प्रेम सिंह को विधान सभा अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दिलाकर प्रदेश अध्यक्ष बनवाया। एक तरह से संदेश साफ था कि अगर कांग्रेस जीती तो प्रेम सिंह की मुख्यमंत्री के लिए दावेदारी बनेगी। इसे भांप कर शीला दीक्षित ने सभी विधायकों को फिर से टिकट


दिलाने की मुहिम चलाई। वे कामयाब रहीं और उनका व्यक्तिगत असर भी बढ़ गया। 2008 का चुनाव तो भाजपा ने कांग्रेस को तश्तरी में रख कर दे दिया। भाजपा ने चुनाव के ऐन मौके पर सालों पुराने नेता विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया । साल भर पहले जो भाजपा निगम चुनाव जीती वह पौने चार फीसद के अंतर से चुनाव हार गई। बसपा दिल्ली में बनी रही और उसे 10 से 14 फीसद वोट भी मिलते रहे। 1993 के चुनाव में भाजपा की जीत में जनता दल की भूमिका थी। उसने 18 फीसद वोट के साथ चार विधायक जीत लिए और अल्पसंख्यकों ने कांग्रेस के बजाए जद को एकतरफा वोट दिया।

इन चुनावों के समय काफी चीजें अभी की तरह थी लेकिन अभी की तरह न तो मीडिया था और न ही सर्वेक्षणों की होड़। इसने नई पार्टी को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा की। अगर आप पार्टी को बड़ी सफलता मिलती है तो इसमें बड़ी भूमिका इन दोनों की होगी। शायद शीला दीक्षित को इसका अंदाजा था, तभी तो उन्होंने इस साल के दिल्ली के बजट में अपने वोटरों को पकड़े रखने के लिए खजाना खोल दिया। दनादन पेंशन योजना शुरू हुई। अन्नश्री, केरोसिन फ्री दिल्ली से लेकर अन्न सुरक्षा कानून लागू कर दिए गए। इतना ही नहीं इस सब की चाभी उन्होंने विधायकों को दे दी। विधायकों ने जिसको चाहा उपकृत किया। अमूनन हर विधान सभा क्षेत्र में पांच से छह हजार परिवार ऐसे होंगे जिनको इन योजनाओं का सीधा लाभ मिल रहा है। इसके अलावा विधायकों ने चुनावी साल का लाभ उठाकर अपने क्षेत्र में खूब काम करवाए।

दिल्ली की कुल 20 सीटें ऐसी हैं जहां पिछले चुनाव में हार-जीत का अंतर 15 हजार से ज्यादा रहा। औसतन हर सीट पर डेढ़ से पौने दो लाख वोटर हैं, एक लाख से ज्यादा वोट कम ही क्षेत्रों में डल पाते हैं। कई-कई उम्मीदवार होने से जिसे चालीस-पचास हजार वोट भी आ गए वह चुनाव जीत जाता है।  अगर विधायक के निजी समर्थकों के अलावा पिछले साल के प्रयास से अगर उसे 15 से 20 हजार वोट का लाभ हो रहा है तो वह चुनाव भले ही न जीत पाए लेकिन मुकाबले में तो बना रहेगा। इतना ही नहीं ज्यादातर विधायकों ने भारी संख्या में नए मतदाताओं के नाम जुड़वाए और कटवाए। इसलिए यह चुनाव इस मायने में अनोखा रहा कि सभी 70 विधायक या तो खुद चुनाव मैदान में हैं या उनके परिवार के सदस्य और सभी मुख्य मुकाबले में भी हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है। चुनाव में हर जगह बहुकोणीय मुकाबले भी इसीलिए दिखे। सही जानकारी तो 8 को चुनाव नतीजों से होगी लेकिन इस बार चुनाव जीतने वाले विधायकों की संख्या पहले के मुकाबले ज्यादा हो सकती है।

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