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थम गया चुनाव प्रचार, अब दौर अटकलों का PDF Print E-mail
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Tuesday, 03 December 2013 09:57

मनोज मिश्र

नई दिल्ली। राजधानी में चुनाव प्रचार थमते ही नतीजों पर अटकलों का बाजार काफी गर्म हो गया है। पिछले चुनाव में बसपा को मिलने वाले समर्थनों पर जीत-हार आंकी जा रही थी।इस बार बसपा के साथ एक और नई पार्टी आम आदमी पार्टी (आप)समेत

कई अन्य पार्टियां भी अलग-अलग इलाकों में चुनाव को बहुरंगी बनाने में जोर-शोर से जुटी रहीं। इसीलिए चुनाव पूर्व अनुमान पिछले चुनाव की तरह आसान नहीं है।

 

 

इस बार के चुनाव में पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर कौन-कौन-सी पार्टियां आएंगी, इस पर चुनाव प्रचार अभियानों के दौरान सभी पार्टियां और सर्वेक्षण एजंसियां अपने अलग-अलग दावे करती रही हैं। किसके दावे सही होंगे। कौन जीतेगा और कौन घर बैठेगा। यह सब कुछ पूरी तरह से आठ दिसंबर को सामने आएगा, लेकिन बुधवार को दिल्ली के मतदाता सभी पार्टियों और उम्मीदवारों की तकदीर लिख कर अपना फैसला कर देंगे।

अब तक के चुनाव में ‘आप’ के अलावा बाकी पार्टियों की मौजूदगी का लाभ अक्सर दिल्ली में भाजपा को मिलता था। लेकिन इस बार चुनाव का मंजर बदला हुआ है। चुनाव मैदान में पहली बार उतरी आप जैसी नई पार्टी का प्रदर्शन मतदाताओं को देखने मिल रहा है। इस बार आप भाजपा का ज्यादा नुकसान करेगी या तीसरी मजबूत पार्टी दिखेगी, यह खुलासा आठ दिसंबर को मतगणना के बाद हो जाएगा। आप के लिए तो पहला चुनाव रहा इसलिए उसने तो पार्टी बनने के साथ ही साल भर से चुनाव अभियान चलाया हुआ था। भाजपा और कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न है।

बताते हैं कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने प्रयास करके हर्षवर्धन का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए इसलिए घोषित करवाया कि वे अब लोकसभा चुनाव तक दिल्ली को अपना केंद्र बना सकें। माना जा रहा है कि अगर हर्षवर्धन की घोषणा नितिन गडकरी के प्रभारी बनते ही हो जाती या फरवरी में विजय गोयल के बजाय उन्हें ही प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता तो भाजपा का ग्राफ थोड़ा और ऊंचा होता। भाजपा के हर बड़े नेता पिछले दो हफ्ते के चुनाव प्रचार अभियानों में दिल्ली की गलियां छानते मिले।

चुनाव प्रचार अभियानों का आलम यह रहा कि अप्रत्याशित ढंग से बसपा प्रमुख मायावती ने भी इस बार दिल्ली में कई सभाओं को संबोधित कर दिया। मौजूदा विधानसभा में उसके दो विधायक थे। एक कांग्रेस में चला गया, दूसरे ने टिकट न मिलने पर बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ना तय किया। उसी तरह जनता दल (एकी) में विधायक शोएब इकबाल के जाने के बाद पार्टी के हौसले बढ़ गए। नतीजा यह हुआ कि पार्टी नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी कई रैलियां कर दीं। पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के जेल जाने से उनकी पार्टी इस बार चुनाव से अलग रही। अलबत्ता रामविलास पासवान और उनके पुत्र चिराग पासवान, सपा नेता रामगोपाल यादव समेत वाम दलों के अनेक नेता भी चुनाव प्रचार में आए। चुनाव प्रचार में आरोप-प्रत्यारोप तो खूब हुए और कई बार अप्रिय स्थिति भी आई। लेकिन गनीमत यह रही कि किसी ने ज्यादा सीमा नहीं लांघी।

सबसे अजूबा प्रचार अभियान तो सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी का रहा। शुरुआती दौर में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की एक और राहुल गांधी की दो सभाएं हुईं। राहुल गांधी की दूसरी सभा कांग्रेस की गुटबाजी में पिट गई तो उसके बाद उनकी कोई सभा ही नहीं हुई। प्रधानमंत्री की सभा भी आखिर समय में रद्द कर दी गई। प्रदेश कांग्रेस दफ्तर, जो चुनाव अभियान का केंद्र बनता था, वहां पूरे चुनाव में सन्नाटा फैला रहा। हालांकि पूरे चुनाव की कमान मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के हाथों में रही। वे हर बार की तरह इस बार भी दिल्ली की सभी 70 विधानसभा सीटों में से ज्यादातर पर सभा कर पाईं। उनकी सभाओं में भीड़ भी दिखी। यह इसलिए उल्लेखनीय है कि जिस मैदान में राहुल गांधी को सुनने के लिए लोग नहीं जुटे, वहीं  नरेंद्र मोदी की सभा में


खड़े होने की जगह न थी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल उसी तरह अपने लोकसभा क्षेत्र की विधानसभा सीटों पर प्रचार करते दिखे, जिस तरह से दिल्ली के बाकी कांग्रेसी सांसद। कुछ विधायकों ने अपने स्तर से अगल-बगल के कुछ नेताओं को चुनाव प्रचार में जोड़ा या कांग्रेस की ओर से चुनाव देखने वाले नेता चुनाव प्रचार में दिखे।

वैसे तो चुनाव आयोग की सख्ती का यह लाभ तो दिखता ही है कि दीवारें कम गंदी होती हैं या शोर-शराबा कम होता है। इसके कई फायदे हैं तो कई नुकसान भी हैं। एक तो चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व होता है। इसे आजादी के बाद से तो उत्सव की तरह मनाने की परंपरा रही है। चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन ने अति होने पर तमाम दिखावों और खर्चों पर अंकुश लगाया, उनके बाद के चुनाव आयुक्तों ने और सख्ती की और मतदान का स्वरूप ही बदल गया। एक तो अब दलों में कार्यकर्ता कम हो गए। हर कार्यकर्ता बिना पैसे लिए काम नहीं करता। दूसरे हर काम अब पैसों से ही होते हैं। चुनाव आयोग के हर प्रयास के बावजूद दिल्ली के चुनाव में पैसे का बोलबाला लगातार बढ़ता जा रहा है। आयोग और दिल्ली पुलिस की सख्ती के बावजूद शराब बंटती रही। बताते हैं कि आखिरी रात यानी मंगलवार की रात कयामत की रात बन जाएगी।

एक बात और जिक्र करने लायक है कि कांग्रेस और भाजपा का खेल बिगाड़ने के लिए उनके ही बागी अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ रहे हैं। एक कांग्रेस के नेता बता रहे थे कि पार्टी से टिकट के लिए करीब 1600 लोगों ने आवेदन किया था, उनमें से जिन 70 को टिकट मिले, उनके अलावा ज्यादातर से न तो उम्मीदवारों ने संपर्क किया और न ही वे किसी के चुनाव में लगे। कुछ लगे भी तो अलग-अलग क्षेत्रों में। इतना ही नहीं, कई तो बगावत कर चुनाव मैदान में उतर गए , जिनमें से 10 प्रमुख नेताओं को पार्टी से छह-छह साल के लिए निकाला भी गया है। अभी ऐसे तमाम नेता हैं, जो दूसरे दल के उम्मीदवारों के साथ मिलकर अपनी पार्टी के उम्मीदवार को हराने में लगे हुए हैं। यह परंपरा रही है कि जिसे टिकट मिलता है, वह सबसे पहले उन लोगों के घर जाता है जो उनके अलावा टिकट के दावेदार थे। अब पैसे के बूते ये सारी चीजें गायब हो गई हैं। और यह सब कुछ केवल कांग्रेस में ही नहीं, भाजपा में भी हुआ है। भाजपा के लिए एक लाभ का विषय था कि उनकी ओर से यह काम आरएसएस के लोगों ने किया।

बहरहाल चुनाव में पैसा खर्च करने में कोई भी दल पीछे नहीं रहा। चुनाव प्रचार में आडियो-वीडियो और सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया गया। चुनाव प्रचार के लिए अमूमन हर बड़े दल के उम्मीदवार ने निजी कंपनियों की सेवाएं लीं। ज्यादातर ने निजी स्तर पर ही चुनाव अभियान चलाया। चुनाव प्रचार में घर-घर जाना प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम बना। नुक्कड़ सभाएं , रोड शो या बड़ी सभाएं भी खूब हुईं। इसमें कांग्रेस ही पीछे रही। इसका एक कारण ज्यादातर कांग्रेस उम्मीदवारों का खुद को ‘हैवीवेट’ मानना भी है। सोमवार को कोई बड़ी सभा नहीं हुई। लेकिन रविवार की तरह ही सोमवार सुबह भी ज्यादातर उम्मीदवार रोड शो करके मतदाताओं को अपनी याद ताजा कराने में लगे रहे।

वैसे दिल्ली में सीधा चुनाव कांग्रेस और भाजपा में होता रहा है। 1993 में जनता दल ने चुनाव को तिकोना बनाने की कोशिश की थी। उसके बाद बसपा ही ऐसी कोशिश करती दिखी। पहली बार एक नई पार्टी ‘आप’ ने इस चुनाव को बहुरंगी बना दिया है, लेकिन उसकी सफलता पर अभी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

 

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