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खेत, मकान और पति का बराबर बंटवारा PDF Print E-mail
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Monday, 02 December 2013 09:44

जनसत्ता ब्यूरो व एजंसी

खंडवा/नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए सहजीवन संबंध को शादी की तरह के रिश्ते में लाने और इस तरह उसे घरेलू हिंसा विरोधी कानून के तहत लाने के लिए कुछ दिशा-निर्देश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सहजीवन में रहने वाले एक दंपति के बीच के विवाद का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। इस मामले में महिला ने रिश्ता खत्म होने के बाद पुरुष से गुजारे भत्ते की मांग की थी। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में लोक अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पहले आए निर्देशों को ध्यान में रखते हुए अपने तरह का अनोखा फैसला भी सुना दिया है। खंडवा की लोक अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पति और पत्नी के साथ अब सहजीवन की साथी महिला भी रहेगी। लोक अदालत में पिछले शनिवार आए इस फैसले के तहत धार्मिक नगरी ओंकारेश्वर के मांधाता निवासी पति बसंत माहूलाल और पत्नी शांति के साथ बसंत के साथ पिछले दस साल से सहजीवन (लिव इन रिलेशनशिप) में रह रही रामकुमारी भी एक ही घर में रहेंगी।

लोक अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सहजीवन को मान्यता देने के मद्देनजर यह फैसला दिया है। उसे अपने जीवनसाथी के मकान, खेत व जमीन में आधा हिस्सा भी मिलेगा। इस फैसले में सबसे अनोखी बात तो यह है कि एक कमरे में पति रहेगा, जो घर के बीच में है। वहीं, उसके दूसरी ओर के एक कमरे में पत्नी और दूसरे कमरे में सहजीवन की साथी रहेगी। पति के कमरे का दरवाजा दोनों कमरों में खुलेगा और पति का कमरा दोनों की ओर पंद्रह-पंद्रह दिन के लिए खुलेगा।

खंडवा में


हुई लोक अदालत ने समझौते के आधार पर मकान, खेत और पति को भी दोनों के बीच बराबर के हक के साथ बांट दिया है। पत्नी शांति ने दो साल पहले अपने पति बसंत माहूलाल की अदालत में शिकायत की थी कि उसने लगभग दस साल से उसके अलावा एक दूसरी महिला रामकुमारी से सहजीवन का रिश्ता कायम किया है और उसे घर में ही रख लिया है। मामला परिवार परामर्श केंद्र में भी गया, लेकिन वहां कोई हल नहीं निकल सका। लोक अदालत के विशेष न्यायाधीश गंगाचरण दुबे ने इसकी जांच कराई।

जांच रिपोर्ट में घरेलू हिंसा होना पाया गया। तब पति बसंत और सहजीवन साथी रामकुमारी को नोटिस जारी हुआ। महिला का पति बिजली विभाग में लाइनमैन है। उसने लोक अदालत में कहा कि सहजीवन अदालत की नजर में भी पाप नहीं है। इसलिए हमारी शर्तों पर भी ध्यान दिया जाए। लोक अदालत के विशेष न्यायाधीश गंगाचरण दुबे ने तीनों पक्षों की आपसी सहमति के बाद यह समझौता कराया।

सुप्रीम कोर्ट ने सहजीवन संबंधों के बारे में जो दिशा-निर्देश तय किए हैं उनमें संबंध की अवधि, एक ही घर में रहना और वित्तीय संसाधनों में सहभागिता सहित कई अन्य मुद्दे शामिल हैं। न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष की पीठ ने कहा कि हालांकि इस मामले में हमारे दिए आठ दिशा-निर्देश ही पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन इनसे ऐसे रिश्तों को तय करने के मामले में कुछ हद तक मदद जरूर मिल सकेगी।

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