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अनुशासन की डींग के बाद कांग्रेस में टिकटों की बंदरबांट PDF Print E-mail
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Saturday, 16 November 2013 09:04

मनोज मिश्र

नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के टिकटों में पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी का फार्मूला फेल रहा। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आग्रह पर सभी विधायकों को टिकट दिया गया तो बाकी सीटों पर सांसदों और बड़े नेताओं में जम कर बंदरबांट हुई। इस कारण बागी, दागी सभी टिकट पा गए। हाईकमान का नाम लेकर खूब मनमानी की गई। ज्यादातर टिकट पैसे वालों को मिले।

पश्चिमी दिल्ली के सांसद महाबल मिश्र के पुत्र विनय मिश्र को टिकट तो मिला लेकिन वह उनकी मनचाही सीट से नहीं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रवासियों के वोट पर राज करने वाली कांग्रेस 70 में से केवल एक टिकट विनय मिश्र को दे पाई। बदले में पश्चिमी दिल्ली की ज्यादातर टिकटें दूसरों ने बांट लीं। गंभीर आपराधिक मुकदमे वाले ओखला के विधायक आसिफ मोहम्मद खान को सारे नियम ताक पर रख कर टिकट दिया गया और अदालत से सजा पाए राजौरी गार्डन के विधायक दयानंद चंदेला की पत्नी दमयंती चंदेला को उनके स्थान पर उम्मीदवार बनाया गया।

मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने पिछले चुनाव में तीन विधायकों के टिकट काटने के बाद उन सीटों पर हुई हार को ही आधार बना कर सभी विधायकों को टिकट दिलवाने की मुहिम चलाई। उन तीनों को इस बार भी टिकट नहीं दिए गए। पिछली बार परिसीमन में कोई बदलाव हुए बिना जिले सिंह चौहान (बुराड़ी), ब्रह्मपाल (त्रिलोकपुरी) और विनय शर्मा (बाबरपुर) के टिकट काटे गए। तीनों सीटें कांग्रेस हार गई। माना गया कि ऐसा विधायकों की नाराजगी के कारण हुआ। मुख्यमंत्री लगातार इसी बात को दुहरा कर सभी विधायकों को टिकट देने की वकालत कर रही थीं। आखिर-आखिर तक तीनों को इस बार टिकट का भरोसा दिया गया और 14 को उनकी जगह किसी और को टिकट दिया गया। बुराड़ी तो पिछला चुनाव हारने वाले को ही दिया गया जबकि त्रिलोकपुरी से तो इस बार पश्चिमी दिल्ली में रहने वाले हरनाम सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है। उन्हें पिछली बार देवली से टिकट दे कर पूर्व केंद्रीय मंत्री बूटा सिंह के बेटे अरविंदर सिंह लवली को टिकट देने के लिए टिकट काट दिया गया। जबकि दो साल लग कर दिल्ली का कांग्रेस के अनुकूल परिसीमन करने वाले चतर सिंह को बाहरी के नाम पर करावल नगर से टिकट नहीं दिया गया।

पिछले साल हुए नगर निगम चुनाव में कांग्रेस ने सांसदों और विधायकों को टिकट तय करने की जवाबदेही देने का अनोखा प्रयोग किया। उसी का नतीजा हुआ कि सभी ने अपने-अपने चहेतों को टिकट दिलवाया और एक का तीन निगम करने के बावजूद एक भी निगम में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया। 43 में से 42 विधायकों को टिकट दिए गए। जबकि दिल्ली चुनाव समिति की बैठक में ही एक तिहाई का विरोध हो रहा था। 12 के विरोध की बात तो सार्वजनिक रूप से मानी गई और दिल्ली चुनाव समिति से सभी के नाम जाने के बाद छानबीन समिति की मंजूरी के बावजूद 28 अक्तूबर की केंद्रीय


चुनाव समिति की बैठक में खुद राहुल गांधी ने उनके नाम प्रतीक्षा में डाले। बावजूद इसके 11 को जारी पहली सूची में 42 के नाम घोषित किए गए। चंदीला के बजाए उनकी पत्नी को और भाजपा से टिकट न मिलने से कांग्रेस में शामिल हुए हरशरण सिंह बल्ली को हरिनगर से टिकट तो हाईकमान से सीधे तय कराया गया।

बताते हैं कि इसके अलावा बाकी बचे 27 सीटों में सांसदों के कहने पर 20 टिकट दिए गए। उत्तर पूर्व के सांसद और प्रदेश अध्यक्ष जय प्रकाश अग्रवाल के इलाके में पांचों टिकट उनकी मर्जी से मिले। इसी के कारण पूर्वी दिल्ली के सांसद और मुख्यमंत्री के पुत्र संदीप दीक्षित ने तीनों सीटें अपने हिसाब से बांटी। दक्षिणी दिल्ली के  सांसद रमेश कुमार को अपने भतीजे जगप्रवेश कुमार और ओमप्रकाश बिधूड़ी को टिकट दिलाने के एवज में दो सीटें छोड़ दीं। जगप्रवेश काफी दिनों से संगम विहार में सक्रिय थे। उन्हीं में से एक पालम से महाबल मिश्र के पुत्र विनय को टिकट मिला है। यह सीट भी पूर्वांचल बहुल है लेकिन वे पहले महाबल मिश्र की सीट द्वारका से टिकट मांग रहे थे। बदले में पश्चिमी दिल्ली की टिकटों में उनकी कम चली है। जनकपुरी से रागिनी नायक और तिलक नगर से अमृता धवन सीधे हाईकमान से टिकट ले आई हैं। दोनों दिल्ली विश्वविद्याल छात्र संघ की पूर्व अध्यक्ष रही हैं। नजफगढ़ से उम्मीदवार बनाए गए विजेंद्र दत्त शर्मा पिछले चुनाव में बसपा उम्मीदवार थे। केंद्र सरकार के मंत्री और चांदनी चौक के सांसद के इलाके में ज्यादातर टिकट उनके कहने से ही तय हुए हैं। वहीं दूसरी मंत्री और उत्तर पश्चिम की सांसद कृष्णा तीरथ भी रिठाला और मुंडका से टिकट पाने वालों की पैरवीकार थीं। लेकिन रोहिणी और रिठाला के टिकट उनके हिसाब से नहीं दिए गए हैं। हाईकमान के करीबी माने जाने वाले नई दिल्ली के सांसद अजय माकन के कहने से तीन में से दो सीटें दी गई हैं। कहा जा रहा है कि दिल्ली छावनी से टिकट पाए पूर्व मेयर अशोक जैन के पैरवीकार कई लोग थे। वे काफी अमीर नेता माने जाते हैं।

टिकटों में बंदरबांट से कांग्रेस की दावेदारी कमजोर हुई है। राहुल गांधी के सारे प्रयोग दिल्ली में फेल हो गए। तरह-तरह के फार्म भरवाए गए थे। सैकड़ों फाइलें बनीं और महीनों कसरत होता रहा। लेकिन टिकट बंटवारे में वही हुआ जो पहले से होता रहा है। कांग्रेस की तो पूंजी ही उम्मीदवार थे और उसी बूते कांग्रेस विपरित माहौल में चुनाव जीतने का दंभ भर रही थी। चूंकि विधायकों के टिकट नहीं कटे हैं इसलिए बगावत खुलेआम नहीं दिख रही है। लेकिन इस टिकट बंटवारे से कांग्रेस पार्टी के बड़े तबके में भारी असंतोष है। इसका असर अगर चुनाव पर हुआ तो सारे समीकरण बदल जाएंगे।

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