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उत्तर प्रदेश में सियासी फायदा उठाने के फेर में हैं मायावती PDF Print E-mail
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Wednesday, 13 November 2013 10:06

अंबरीश कुमार

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उत्तर प्रदेश के राजनैतिक हालात में जो बदलाव आ रहे हैं, उसमें बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती की ताकत बढ़ती नजर आ रही है। वे जल्द चुनावी दौरे और बड़ी रैलियों से शुरुआत करेंगी। बसपा ने लोकसभा चुनाव को देखते हुए जमीनी तैयारी शुरू कर दी है। वैसे भी उत्तर प्रदेश में सभी पार्टियों के मुकाबले बसपा के कार्यकर्ता ज्यादा प्रतिबद्ध और अनुशासित माने जाते हैं। इनके जरिए मायावती विधानसभा चुनाव में हुए नुकसान की भरपाई लोकसभा में करने की तैयारी में हैं।

 

मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के बाद राजनैतिक दूरदर्शिता के अभाव में सरकार और समाजवादी पार्टी दोनों बैकफुट पर हैं। ऐसे में मायावती के लिए यह बेहतर मौका भी है। पश्चिम में मायावती दलित, मुस्लिम और अगड़े उम्मीदवारों के जरिए अपनी ताकत बढ़ाना चाहती हैं। पश्चिम की जिन सीटों पर भाजपा से बसपा का सीधा मुकाबला होगा, वहां मुसलमानों का बड़ा हिस्सा मायावती के साथ जा सकता है। पश्चिम से संबंध रखने वाले एक वामपंथी नेता के मुताबिक, आगामी लोकसभा चुनाव में मायावती को ज्यादा फायदा पहुंच सकता है, खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। यहां मुसलमान मुलायम सिंह से नाराज हैं और कांग्रेस चौथे नंबर पर रहेगी। ऐसे में उनकी पहली वरीयता बसपा ही होगी। वैसे भी बसपा का जनाधार ज्यादा मजबूत है। दलित-मुस्लिम के साथ उनके अगड़े हिंदू उम्मीदवार का जातीय समीकरण फायदा दिला देता है, अलीगढ़ सीट इसका उदाहरण है ।

मायावती पश्चिम के साथ पूरब में भी ताकत बढ़ाना चाहती हैं, पर वैसी सफलता मुश्किल है, जैसी पश्चिम में मिल सकती है। इसकी एक वजह जातीय समीकरण भी है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद मुलायम सिंह अपना पिछड़ा वोट बैंक मजबूत करने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं। सामाजिक न्याय यात्रा इसका उदाहरण है। मायावती इस यात्रा को झांसा मानती हैं, जो पिछड़ों को भ्रमित करने के लिए निकाली जा रही है। पर पिछड़ों की राजनीति में पिछले विधानसभा चुनाव में मायावती को काफी नुकसान भी उठाना पड़ा था। बसपा के 93 पिछड़े उम्मीदवारों में सिर्फ 28 ही जीत पाए थे, जिनमें सबसे ज्यादा संख्या कुर्मी उम्मीदवारों की थी। इनमें कुल छह प्रत्याशी जीत पाए थे। दूसरी तरफ सपा के आठ लोध, छह कुर्मी उम्मीदवारों के साथ तीन निषाद और एक कुशवाहा उम्मीदवार जीता था। दलित जातियों में भी बसपा को झटका लगा था। उसके सिर्फ बारह जाटव और दो पासी उम्मीदवार जीत पाए थे जबकि सपा के बीस


पासी और तेरह जाटव उम्मीदवार जीते थे।

यही वजह है कि बसपा को पश्चिम से ज्यादा चिंता पूर्वांचल की है। राजनैतिक विश्लेषकों के मुताबिक, मुस्लिम वोटों के बंटवारे का जैसा फायदा मायावती को पश्चिम में मिल सकता है, वह पूरब में मिल पाना मुश्किल है। पूर्वांचल में राजनैतिक हालात पश्चिम जैसे नहीं हैं। पर इस अंचल में भी मुस्लिम वोट बंट सकते है, इसी पर बसपा का चुनावी समीकरण निर्भर है। मायावती इसी वजह से अब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रही हैं। वे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर चल रहे टकराव के साथ उग्र हिंदुत्व के खतरे को लेकर प्रचार में उतरेंगी और भाजपा -सपा गठजोड़ को मुद्दा बनाएंगी।

दंगों के बाद वाम दल भी इसी सवाल को उठा रहे हैं। भाजपा-सपा गठजोड़ का मुहावरा कुछ समाजवादियों ने भी गढ़ा है जो अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस की मदद कर रहे हैं। बाद में इसमें वाम दल भी शामिल हो गए। यह बात अलग है कि वाम दलों का राष्ट्रीय नेतृत्व मुलायम के साथ है, तो प्रदेश का नेतृत्व मुलायम के खिलाफ खड़ा है। इन सबके बावजूद उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले वोट बढ़ता हुआ तो मायावती का ही दिख रहा है। इसके बाद मोदी का नंबर है। अभी मायावती की रैली शुरू नहीं हुई है और उनकी एक रैली भी मोदी की दस रैली के बराबर होती है, यह उत्तर प्रदेश में सभी जानते हैं। वैसे भी सपा और बसपा चुनाव में उन्ही मुद्दों को लेकर उतरते हैं जिनकी वजह से उन्हें सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। इसमें कानून व्यवस्था प्रमुख है। मायावती के समय भी यह बिगड़ी थी और फिर अखिलेश यादव के समय में भी बिगड़ चुकी है। फर्क एक है, मायावती तक न कोई विधायक सांसद या मंत्री पहुंच पाता था, न उनकी धौंस जमकर अफसर को नीचा दिखा सकता था। पर अखिलेश सरकार की फजीहत, पार्टी का बड़ा-छोटा कोईभी नेता करा सकता है। भाटी से लेकर नरेश अग्रवाल जैसे बड़बोले नेता इसका उदाहरण हैं। ये पार्टी की लुटिया डुबोकर कभी किसी और दल में खड़े मिलें तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। इन्हीं सबका फायदा मायावती फिर लेने जा रही हैं।

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