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पूर्व न्यायाधीश के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप की जांच करेगी न्यायाधीशों की समिति PDF Print E-mail
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Tuesday, 12 November 2013 17:24

नई दिल्ली। अपने ही न्यायाधीशों में से एक के खिलाफ यौन कदाचार के आरोपों की चपेट में आए उच्चतम न्यायालय ने इस आरोप की जांच के लिए आज तीन न्यायाधीशों की समिति गठित कर दी। इस महिला इंटर्न का आरोप है कि पिछले साल दिसंबर में एक न्यायाधीश ने उसका यौन उत्पीड़न किया जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं।

न्यायपालिका के मुखिया के रूप में इस घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम ने कहा, ‘‘यौन उत्पीड़न के मामलों को हम हलके में नहीं ले सकते हैं।’’

अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने इस मामले का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘यह बहुत ही गंभीर मसला है।’’ इस पर प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति शिव कीर्ति सिंह की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने कहा, ‘‘हम कदम उठा रहे हैं।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले का उल्लेख सुबह साढ़े दस बजे भी किया गया था और भोजनावकाश के दौरान अन्य न्यायाधीशों के साथ भी इस पर चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने तीन न्यायाधीशों न्यायमूर्ति आर एम लोढा, न्यायमूर्ति एच एल दत्तू और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की समिति गठित की है।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समिति सारे मामले पर गौर करके तथ्यों का पता लगाएगी और फिर रिपोर्ट तैयार करेगी। यह समिति आज शाम से ही अपना काम शुरू कर रही है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘पहले समिति बयान की सच्चाई का पता लगाएगी।’’

न्यायमूर्ति सदाशिवम ने कहा, ‘‘संस्था के मुखिया के रूप में मैं भी इन आरोपों के बारे में चिंतित हूं। मैं जानना चाहता हूं कि क्या बयान सही है या नही।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्यायाधीशों से संबद्ध होने वाले इंटर्न और वकीलों का रिकार्ड होता है।

उच्चतम न्यायालय आने वाले व्यक्तियों के बारे में भी प्रविष्ठियां होती हैं और समिति इसकी भी जांच करेगी।

एक युवा महिला इंटर्न ने शीर्ष अदालत के एक पीठासीन न्यायाधीश, जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं, पर आरोप लगाया है कि पिछले साल दिसंबर में एक होटल के कमरे में उन्होंने उसके साथ उस समय दुर्व्यवहार किया जब राजधानी में एक महिला से सामूहिक बलात्कार की घटना से राष्ट्र जूझ रहा था।

एक अनाम न्यायाधीश के खिलाफ महिला वकील के इन आरोपों का मामला सुबह वकील मनोहर लाल शर्मा ने प्रधान न्यायाधीश के समक्ष उठाया था। उन्होंने अनुरोध किया था कि न्यायालय को मीडिया की रिपोर्ट के आधार पर स्वत: ही इसका संज्ञान लेकर जांच करानी चाहिए।

न्यायालय द्वारा आदेश लिखाए जाने के बीच ही शर्मा ने न्यायाधीशों से कहा कि उन्होंने सुबह ही इस मामले का उल्लेख किया था।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हां, आपने सुबह 10.30 पर इसका उल्लेख किया था। यह मेरे दिमाग में उस समय घूम रहा था जब एक अन्य मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता दलीलें दे रहे थे। हम तथ्यों के प्रति सचेत हैं।’’

न्यायमूर्ति सदाशिवम ने कहा कि शीर्ष अदालत परिसर में यौन उत्पीड़न के मामलों से निबटने और इस बुराई को खत्म करने के लिए दिशानिर्देश तैयार हो चुके है और इन्हें राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया है।

इस समिति में अभी सदस्यों को शामिल किया जाना है। इस बारे में उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन और लॉ क्लकर्स एसोसिएशन को सदस्यों के चयन के लिए संदेश भेजा गया है लेकिन उन्होंने अभी तक जवाब नहीं दिया है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समिति में सदस्यों के मनोनयन के लिए 30 नवंबर की समय सीमा निर्धारित की गई है।

भोजनावकाश के बाद प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ 20 मिनट देरी से बैठी।

अटार्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने एक प्रमुख अखबार में प्रकाशित खबर की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि यह इंटर्न द्वारा लिखे गए ब्लाग और बाद में उसके इंटरव्यू पर आधारित है।

वाहनवती ने कहा, ‘‘यह बहुत ही गंभीर मामला है और आपको इस पर गंभीरता से गौर करना होगा।’’

उन्होंने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की समस्या से निबटने के बारे में विशाखा प्रकरण में शीर्ष अदालत के फैसले


मे विनिर्दिष्ट दिशा निर्देशों के आलोक में इस मसले को गंभीरता से लेना होगा।

इस पर न्यायालय ने कहा कि बार के नेता के रूप में आपके प्रयासों की हम सराहना करते हैं। हम यह जानने के उत्सुक हैं कि बयान सही है या नहीं।

अटार्नी जनरल का पक्ष सुनने के बाद न्यायालय ने कहा कि पहले ही एक समिति गठित कर दी गई है और इसलिए याचिका को दो सप्ताह के लिए लंबित रखा जा रहा है।

इससे पहले, दिन में मनोहर लाल शर्मा ने प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष यह मामला उठाया था। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि इससे हम अवगत हैं।

न्यायालय ने उस समय कोई आदेश पारित करने से इंकार कर दिया था जब शर्मा ने कहा था कि यह बहुत ही गंभीर मसला है और न्यायपालिका के मुखिया के नाते प्रधान न्यायाधीश को इन आरोपों की जांच करानी चाहिए।

इस महिला ने इसी साल कोलकाता की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरीडिकल साइंस से स्नातक किया है। उसने कथित यौन उत्पीड़न की घटना के बारे में अपने ब्लाग में लिखा है।

जर्नल ऑफ इंडियन लॉ एंड सोसायटी के लिए 6 नवंबर को लिखे गए इस ब्लाग में महिला वकील ने कहा है कि शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के साथ उसके इंटर्न करने के दौरान यह घटना हुई।

ब्लाग के अनुसार, ‘‘पिछला दिसंबर देश में महिलाओं के हितों की रक्षा के आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि देश की लगभग समूची आबादी महिलाओं के प्रति हिंसा के खिलाफ स्वत: ही खड़ी हो गई थी। यह अजीबो गरीब विडंबना ही है कि दुनिया में हो रहे विरोध की पृष्ठभूमि में मेरा ऐसा अनुभव है।’’

ब्लाग में लिखा गया है कि दिल्ली में उस समय यूनिवर्सिटी में मेरे अंतिम वर्ष के शीतकालीन अवकाश के दौरान मैं इंटर्न थी। मैं अपने अंतिम समेस्टर के दौरान अत्यधिक प्रतिष्ठित, हाल ही में सेवानिवृत्त हुये उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के अधीन काम कर रही थी। उनकी सहायता के लिए उनके पास पहुंचने के लिए मैने अथक श्रम किया और पुलिस की बाधाओं को चकमा दिया।

ब्लाग में लिखा गया है, ‘‘मेरी कथित कर्मठता के पुरस्कार के रूप में मुझे यौन उत्पीड़न (शारीरिक नुकसान नहीं लेकिन हनन करने वाले) से एक वृद्ध व्यक्ति ने पुरस्कृत किया जो मेरे दादा की उम्र का था। मैं इस पीड़ादायक विवरण का जिक्र नहीं करूंगी लेकिन इतना जरूरी कहूंगी कि कमरे से बाहर निकलने के काफी बाद तक मेरी स्मृति में वह अनुभव रहा और वास्तव में आज भी है।’’

कानून की इस स्नातक ने एक वेबसाइट को इंटरव्यू भी दिया है। उसका कहना है कि होटल के कमरे में न्यायाधीश ने उसका उत्पीड़न किया और इस घटना का कोई अन्य गवाह भी नहीं है।

‘लीगली इंडिया’ से बातचीत में इस युवा वकील ने कहा, ‘‘यह होटल का कमरा था, (लोगों ने) मुझे स्वेच्छा से जाते देखा, मुझे शांति के साथ बाहर निकलते भी देखा। मैं भय के साथ नहीं भागी। उस समय मुझे लगा कि मुझे शांति के साथ चलना चाहिए। मैंने उस दिन किसी से भी इसका जिक्र नहीं किया।’’

इस महिला ने अपने ब्लाग में हादसे में इस घटना की तारीख का जिक्र नहीं किया लेकिन वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह पिछले साल 24 दिसंबर को हुआ था।

ब्लाग के अनुसार, ‘‘जैसा पहले कहा गया है मेरी दिल में उस व्यक्ति के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है और न ही उसके जीवन भर के काम और प्रतिष्ठा को दांव पर लगाना चाहती हूं। इसके विपरीत, मुझे लगा कि यह मेरी जिम्मेदारी है कि दूसरी युवा लड़कियां इस तरह की परिस्थिति में न पड़े। लेकिन मै इसका समाधान खोजने में विफल रही।’’

(भाषा)

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