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'माईलार्ड और योर लार्डशिप गुलामी की निशानी , इस पर पाबंदी लगनी चाहिए' PDF Print E-mail
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Monday, 11 November 2013 18:58

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय में आज कहा गया कि अदालतों में न्यायाधीशों को माई लार्ड या योर लार्डशिप के संबोधन ब्रितानी हुकूमत के दौर के गुलामी के संकेत हैं जिनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

इस संबंध में 75 वर्षीय वकील शिव सागर तिवारी ने जनहित याचिका में शीर्ष अदालत से अनुरोध किया है कि सारे भारत की अदालतों में माई लार्ड या योर लार्डशिप जैसे संबोधनों के इस्तेमाल पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया जाए। उनका तर्क है कि इनका प्रयोग ‘देश की गरिमा के खिलाफ है।’’

प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की खंडपीठ के समक्ष तिवारी ने कहा, ‘‘माई लार्ड और योर लार्डशिप जैसे संबोधनों का प्रयोग गुलामी की निशानी हैं और अदालतों में इनके इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए।

न्यायाधीशों ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद कहा कि वे इस बारे में निर्देश कैसे जारी कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने सवाल किया कि क्या देश में कोई अदालत उन्हें इन संबोधनों से संबोधित करने के लिए बाध्य करती है।

इस पर तिवारी ने जवाब दिया कि शीर्ष अदालत में उनकी याचिका कथित रूप से इसी वजह से खारिज हो गई थी क्योंकि उन्होंने इस तरह से न्यायालय को संबोधित नहीं किया था।

इस मामले


में सुनवाई आगे नहीं हो सकी क्योंकि न्यायमूर्ति गोगाई ने इससे खुद को अलग कर लिया। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला अब किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।

तिवारी ने याचिका में कहा है कि 2006 में बार काउन्सिल ऑफ इंडिया ने इस बारे में एक प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि भारत में कोई भी अदालत को माई लार्ड और योर लार्डशिप के रूप में संबोधित नहीं करेगा लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति एस मुरलीधर ने इस प्रस्ताव पर कार्यवाही की और कहा कि कोई भी वकील उनकी अदालत को माई लार्ड और योर लार्डशिप से संबोधित नहीं करेगा।

याचिकाकर्ता का कहना है कि जब तक यह न्यायालय निर्देश जारी नहीं करेगा अदालतों में न्यायाधीश और पेश होने वाले वकील बार काउन्सिल ऑफ इंडिया के नियम में किए गए संशोधन का पालन नहीं करेंगे।

(भाषा)

 

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