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मंत्री रजामंद होते तो कुछ और होती जांच की दिशा : पीसी पारख PDF Print E-mail
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Saturday, 26 October 2013 08:55

नई दिल्ली। पूर्व कोयला सचिव पीसी पारख ने सरकार की कार्रवाइयों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पारख के मुताबिक, एसईसीएल के सीएमडी एमके थापर के खिलाफ कदाचार किए जाने के पर्याप्त सबूत थे। इसलिए सीबीआइ को नियमित मामला दर्ज करने की इजाजत देने की मांग की गई थी। पारख ने बताया कि मंत्रियों ने इस सलाह पर रजामंदी नहीं जताई।

पारख ने कहा कि मंत्रियों के आदेशों का पालन किया गया जबकि मैंने इन्हें गलत आदेश माना था। यह अलग बात है कि कथित आदेश को कोयला मंत्रालय के प्रभारी मंत्री के तौर पर प्रधानमंत्री द्वारा बदल दिया गया।

पारख ने दावा किया था कि कोयला मंत्री मौखिक आदेश देते थे और अपनी सुविधानुसार फाइल नोटिंग चाहते थे न कि जनहित देखते हुए। तत्कालीन कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी को लिखे पत्र में पारख ने उन मामलों का ब्योरा दिया जिनमें उन्हें अपनी सलाह के विपरीत लिखित आदेशों का पालन करना पड़ा और जिन्हें वे गलत मानते थे। पारख को कोयला ब्लॉक आबंटन से जुड़े सीबीआइ के एक मामले में आरोपी बनाया गया है। पारख तत्कालीन कोयला मंत्री शिबू सोरेन के आरोपों को खारिज करते रहे हैं। सोरेन कथित अवहेलना के मामले में अपने मंत्रालय से उनका तबादला चाहते थे। पारख ने कहा था - अगर राजनीतिक नेतृत्व के लिए सम्मान का अर्थ मंत्री के हित साधने वाले और जनहित के खिलाफ मौखिक आदेशों का पालन करना या नोटिंग रिकार्ड है तो शायद कथित खामियों का दोषी हूं।

कैबिनेट सचिव को लिखे पत्र में उन्होंने कहा था कि सरकार के सचिव के नाते मंत्री को इस बारे में परामर्श देना उनका अधिकार और जिम्मेदारी दोनों हैं कि वे किसे विवेकपूर्ण, निष्पक्ष और जनहित में मानते हैं। उन्होंने कहा था-जाहिर है कि इस तरह की सलाह को स्वीकार करना या नहीं करना मंत्री पर निर्भर करता है।

पारख ने कहा-सीबीआइ ने एसईसीएल के सीएमडी एमके थापर के खिलाफ आइपीसी की धारा 420 के साथ 120 (बी) और भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धारा 12 (1) (डी) के साथ धारा 13 (2) के तहत एक नियमित मामला दर्ज करने का अनुरोध


किया था। आॅन रिकार्ड मौजूद सामग्री का अध्ययन करने के बाद फाइल कोयला मंत्री के नाते प्रधानमंत्री को सौंपी गई और इसमें सीबीआइ को मामला दर्ज करने की इजाजत देने की सिफारिश की गई। उन्होंने लिखा था-प्रधानमंत्री ने मुझे संबंधित अधिकारियों का पक्ष सुनने का और मामले के सभी पहलुओं पर विचार करते हुए एक नोट देने का निर्देश दिया था।

पारख ने कहा कि तदानुरूप वे रांची गए और उन्होंने सभी संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल की और संबंधित अधिकारियों से पूछताछ की। उन्होंने पाया कि थापर के कदाचार किए जाने के पर्याप्त साक्ष्य थे। इसलिए मैंने सिफारिश की कि सीबीआइ को नियमित मामला दर्ज करने की इजाजत दी जा सकती है। लेकिन मंत्रियों ने सलाह पर रजामंदी नहीं जताई। उन्होंने एक वाकए का भी उल्लेख किया जहां सोरेन ने मौखिक रूप से पारख को कोयला कंपनियों में निदेशकों के तबादला करने का निर्देश दिया था जिसकी उन्होंने सिफारिश करने से मना कर दिया था।

पारख ने शुक्रवार को दावा किया कि कोयला ब्लॉक आबंटन पर संसद सदस्यों के दबाव और ‘ब्लैकमेलिंग’ के बाद जब उन्होंने इस्तीफा दिया था तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे पद पर बने रहने के लिए कहा था। 2005 में इस्तीफा देने के बाद विदाई समारोह में वे प्रधानमंत्री से मिले थे। पारख ने कहा-लेकिन उन्होंने मुझसे पद पर बने रहने के लिए कहा। यह पूछे जाने पर कि क्या यह ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री की निजी ‘निराशा’ को दिखाता है, पारख ने कहा कि हां, एक तरह से।

पारख ने कहा कि उन्होंने ‘सांसदों के ब्लैकमेलिंग और दबाव’ के बारे में तत्कालीन कैबिनेट सचिव और सीवीसी को पत्र लिखा था और उन्हें नहीं पता कि उनकी शिकायत पर कोई कदम उठाया गया या नहीं। पारख ने आरोप लगाया कि सांसदों ने अपना काम कराने या अधिकारियों से रिश्वत लेने के लिए ब्लैकमेल और दबाव बनाने की रणनीति अपनाई।

 

(भाषा)

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