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चुनाव से ठीक पहले भाजपा मुश्किल दौर में PDF Print E-mail
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Saturday, 19 October 2013 10:13

नरेंद्र भंडारी
नई दिल्ली। दिल्ली भाजपा अपने गठन के बाद मौजूदा दौर में सबसे गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। संगठन भीतर से कई हिस्सों में बंट चुका है। उसकी चरमराई हुई स्थिति आगामी विधानसभा चुनाव में उसके लिए एक कड़ी अग्निपरीक्षा है। संगठन से जुड़े कई नेता इन दिनों अपने आपको सर्वोच्च मानकर संगठन को ही चुनौती देने में लगे हैं। दिल्ली में आगामी 4 दिसंबर को विधानसभा चुनाव है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा की ओर से विशेष जिम्मेदारियां संभालने वाले वरिष्ठ नेता ने इन दिनों पार्टी की अंदरूनी स्थिति देखकर चुप्पी साध ली है। किसी को भी कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या कदम उठाकर संकट का हल निकाला जाए। वैसे सारा मामला दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने का है।
दिल्ली भाजपा पहले भी अपने कार्यकाल में चुनौतियां झेलती आई है। लेकिन उस समय चुनाव इतने करीब नहीं होते थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता जैसे तैसे करके चुनौतियों को झेल लेते थे। करीब छह साल पहले भाजपा के दिग्गज नेता मदन लाल खुराना ने भी संगठन के वरिष्ठ नेताओं को चुनौती दे दी थी। उस समय उनकी चुनौती का शिकार भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी हुए थे। उस समय खुराना एक बार फिर से दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचना चाहते थे।
खुराना कई महीनों तक राजनीतिक तीर चलाते रहे और एक दिन तो उन्होंने संगठन से ही किनारा कर लिया। उस समय दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष डा. हर्षवर्धन थे। उसी दौरान दिल्ली नगर निगम चुनाव भी हुए। खुराना ने भाजपा के उम्मीदवारों के सामने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए। चुनाव नतीजे आए तो डा. हर्षवर्धन की अगुआई में भाजपा की जीत हुई। उसके बाद खुराना समझ गए कि एक बड़े संगठन के सामने वे कुछ भी नहीं हैं। उन्होंने भाजपा में वापसी को कोशिशें शुरू कर दी। उसके काफी समय बाद आडवाणी को मनाकर राजनाथ सिंह ने खुराना को भाजपा में वापिस लिया।
भाजपा के सामने करीब वैसी ही चुनौती दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष विजय गोयल ने खड़ी कर दी है। मौजूदा विधानसभा चुनाव में वे मुख्यमंत्री के पद के लिए अपना नाम घोषित करवाने या फिर किसी का भी नाम घोषित नहीं करने की मांग पर अड़ गए हैं। गोयल का कहना है कि पिछले 8 माह में उन्होंने संगठन को नए सिरे से खड़ा किया है। इसके अलावा वे डा. हर्षवर्धन को निष्क्रिय नेता बता रहे हैं। इस मामले में भाजपा से जुड़े कई वरिष्ठ नेताओं का कुछ और ही कहना है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि डा. हर्षवर्धन करीब पांच साल तक दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष रहे हैं। उनके कार्यकाल में भाजपा ने दिल्ली नगर निगम का चुनाव जीता था। इसी तरह से उनके कार्यकाल में ही भाजपा का प्रदेश से लेकर करीब 10 हजार वार्डों का व करीब 50 सेलों का गठन हुआ था।
भाजपा नेता ने


कहा कि जहां तक निष्क्रियता वाली बात है, विजय गोयल व डा. हर्षवर्धन दोनों ही मंत्री रहे हैं। गोयल प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री थे। बाद में उन्हें हटाकर युवा मामलों का मंत्री बना दिया गया था। डा. हर्षवर्धन दिल्ली सरकार में मंत्री थे और उनके पास दो विभाग थे। दिल्ली में भाजपा की जब तक सरकार थी, तब तक डा. हर्षवर्धन उसमें मंत्री रहे थे। बाद में उन्हें मुख्यमंत्री भी बनाया जा रहा था, लेकिन उस समय भी उन्हें उनके राजनीतिक विरोधियों मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंचने दिया था।
अब फिर से मामला दिल्ली की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का है। करीब चार महीने पहले भाजपा संगठन ने पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव करवाने की कमान सौंपी। यदि उसी समय गडकरी ने दिल्ली संगठन की समस्याओं को समझना और यहां के प्रमुख नेताओं से विचार विमर्श शुरू कर दिया होता तो संगठन को जो आज स्थिति झेलनी पड़ रही है, वह सामने नहीं होती। पार्टी के सूत्रों के मुताबिक गडकरी ने दिल्ली भाजपा संगठन की समस्याओं को समझने के बजाय चुनावी सर्वे करवाने शुरू कर दिए। अब तक वे दिल्ली के चुनावों को लेकर पांच सर्वे करवा चुके हैं।
भाजपा संगठन की आंतरिक कलह उभर कर सामने तब आई जब गडकरी ने कह दिया कि दिल्ली के चुनाव के लिए किसी का भी नाम मुख्यमंत्री पद के लिए प्रस्तावित नहीं किया जाएगा। उनकी इस घोषणा के बाद संगठन में कुछ दिनों तक शांति छाई रही। नेता अपने अपने करीबियों की टिकट की जुगत में लग गए। भाजपा से जुड़े लोग टिकटों के जल्द से जल्द वितरण की इंतजार करने लगे। अब संगठन में उबाल फिर से तब आया जब दिल्ली के प्रस्तावित मुख्यमंत्री के पद की घोषणा का फैसला कर लिया गया। भाजपा में अब उम्मीदवारों के  चयन पर विचार करने के बजाय मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ही विचार होने लगा है। पार्टी के सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में टिकटों पर विचार करने को लेकर अब तक भाजपा टिकट वितरण कमेटी की सिर्फ दो ही बैठके हुईं हैं। अभी अकालियों को भी टिकट देने पर विचार होना है। पार्टी के अंदरूनी हालात जानकर गडकरी ने झगड़े की सारी कमान भाजपा संसदीय बोर्ड पर छोड़ दी है। इसकी बैठक आगामी सप्ताह के शुरू में होनी है।
भाजपा में संगठन का सारा झगड़ा अब किसी भी दिन सड़कों पर आने की संभावना है। अंदरूनी झगड़ों की वजह से भाजपा की शीला सरकार के खिलाफ मोर्चेबंदी लगता है कि भाजपा नेताओं के आपस में ही शुरू हो जाएगी। यदि संगठन के हालात नहीं सुधरे तो भाजपा का घर-घर चलों अभियान मतदाताओं को पोलिंग स्टेशनों तक ले जाने के बजाय घर तक ही सिमट कर रह जाएगा।

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