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बिखरते वोट बैंक से संकट में मुलायम सिंह यादव PDF Print E-mail
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Monday, 14 October 2013 09:12

अनिल बंसल
नई दिल्ली, 13 अक्तूबर। तीसरे मोर्चे के जरिए प्रधानमंत्री पद का ख्वाब देख रहे मुलायम सिंह यादव इस समय संकट में हैं। मुजफ्फरनगर के दंगों के कारण उन्हें अपने वोट बैंक में बिखराव का डर सता रहा है। एक तरफ वे मुसलमानों को अपने साथ बनाए रखने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी ओर राजपूत मतदाताओं के भाजपा के साथ जाने के खतरे से निपटने की रणनीति भी बना रहे हैं। इसी के तहत रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया को फिर कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। मार्च में पुलिस के एक डीएसपी की प्रतापगढ़ में हुई हत्या में संदेह की सुई राजा भैया की तरफ घूमने के कारण अखिलेश यादव ने उनसे इस्तीफा लिया था।
दरअसल विधानसभा चुनाव में पहली बार सपा को समाज के सभी तबकों का व्यापक समर्थन मिला था। खासकर राजपूत मतदाताओं ने पार्टी का खुलकर समर्थन किया था। लेकिन मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद सरधना के भाजपा विधायक संगीत सोम उत्तर प्रदेश के राजपूतों के नए नायक के तौर पर उभरे हैं। उन्हें अखिलेश सरकार ने दंगे के आरोप में रासुका के तहत बंद कर रखा है। इसी दंगे के आरोप में रासुका के तहत बंद मुजफ्फरनगर की थाना भवन सीट के विधायक सुरेश राणा भी राजपूत हैं। सूत्रों के मुताबिक अखिलेश यादव बाहुबली राजा भैया की अपनी सरकार में वापसी के कतई पक्ष में नहीं थे। बेशक डीएसपी हत्या कांड में सीबीआइ ने उन्हें क्लीनचिट दी है। पर राजपूतों की नाराजगी दूर करने के लिए मुलायम ने उनकी वापसी कराई है।
मुलायम को एक के बाद एक झटके सहने पड़ रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट यों पहले भी उनके मुरीद नहीं थे पर मुजफ्फरनगर की घटनाओं के बाद तो वे सपा के खिलाफ इस कदर गुस्से में हंै कि अब कोई जाट सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने का जोखिम लेना नहीं चाहता। बागपत में सोमपाल शास्त्री ने इसका अंदाज सबसे पहले लगाया। उन्हें मुलायम ने अजित के खिलाफ अपना उम्मीदवार घोषित कर रखा था। पर केंद्र की वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे सोमपाल ने न केवल सपा टिकट ठुकरा दिया बल्कि पार्टी को ही अलविदा कह दिया।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी सपा के उम्मीदवारों में बेचैनी है। कैसरगंज के उम्मीदवार बृजभूषण शरण सिंह ने भी पार्टी का लोकसभा टिकट ठुकरा दिया है। बाहुबली और कद्दावर राजपूत बृजभूषण शरण सिंह पहली बार 1991 में भाजपा टिकट पर गोण्डा से लोकसभा चुनाव जीते थे।


वे अब तक चार बार सांसद रह चुके हैं। एक बार टाडा में बंद थे तो भाजपा ने उनकी पत्नी केतकी सिंह को टिकट दे दिया था। बाहुबली ने जेल में रह कर भी अपने असर से अपनी पत्नी को चुनाव जितवा दिया था। उनका सपा से मोहभंग पार्टी के भविष्य पर आशंकाएं साबित करता है।
उधर मुलायम को अखिलेश सरकार का प्रदर्शन खरा नहीं होने के कारण लोकसभा चुनाव में होने वाले नुकसान का भी अंदाज है। इसीलिए वे गाहे-बगाहे अपने बेटे को नसीहतें देते रहते हैं। इतना ही नहीं पार्टी की तरफ से सरकार के खिलाफ एक तरह से विपक्ष की भूमिका अदा करने से भी नहीं चूकते। मसलन शनिवार को लोहिया की जयंती के एक समारोह में लखनऊ में उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि वे अखिलेश सरकार के मंत्रियों और विधायकों की गलतियों की सजा लोकसभा उम्मीदवारों को कतई न दें।
मुलायम ने पिछले साल अपने कार्यकर्ताओं के सामने लोकसभा की साठ सीट का लक्ष्य रखा था। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 80 लोकसभा सीटें हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा को 38 सीटों पर सफलता मिली थी। मुलायम चाहते हैं कि साठ न सही पर उनकी पार्टी कम से कम 40 सीटें तो जरूर जीते। अन्यथा प्रधानमंत्री पद के उनके दावे की हवा निकल जाएगी। एक तरफ वे अखिलेश के मंत्रियों से असंतुष्ट हैं तो दूसरी तरफ अखिलेश सरकार के राज्यमंत्री अपने कैबिनेट मंत्रियों से नाराज हैं। पंद्रह राज्यमंत्रियों ने तो बाकायदा मुलायम से मिलकर अपनी व्यथा जताई और कहा कि वे तो बस नाम के मंत्री हैं। उनके कैबिनेट मंत्री उन्हें चपरासी तक के तबादले का अधिकार देने को तैयार नहीं।
समाजवादी पार्टी के पास इस समय एक भी जाति का वोटबैंक पुख्ता नहीं है। मुलायम के धुरविरोधी रहे पूर्व मंत्री और जद (एकी) नेता अशोक यादव की मानें तो अब यादव भी उनसे नाराज हैं। खासकर लोकसेवा आयोग की नौकरियों में नियमानुसार आरक्षण नहीं मिलने से नौजवान गुस्से में हैं। इसी तरह विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मणों ने नारा लगाया था- ब्राह्मण शंख बजाएंगे, मुलायम दिल्ली जाएंगे। पर अब नरेंद्र मोदी के कारण अगड़े भाजपा के पक्ष में लामबंद होते दिख रहे हैं। नरेंद्र मोदी के पिछड़ी माली जाति का होने का भी अपनी पार्टी को नुकसान होने का मुलायम को डर सता रहा है।

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