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तेलंगाना पर पुनर्विचार नहीं : सुशील कुमार शिंदे PDF Print E-mail
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Friday, 11 October 2013 09:23

जनसत्ता ब्यूरो व एजंसियां
नई दिल्ली/हैदराबाद। केंद्र सरकार ने तेलंगाना के गठन के फैसले को वापस लेने की संभावना से इनकार कर दिया है। लेकिन वह यह बताने में नाकाम रही है कि नया राज्य कब तक अस्तित्व में आएगा। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने आंध्र प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने के विकल्प पर अभी विचार नहीं किया है। इस बीच, बिजली की कमी से जूझ रहे सीमांध्र के लोगों को राहत पहुंचाते हुए आंध्र प्रदेश के तटीय आंध्र और रायलसीमा क्षेत्रों में बिजलीकर्मियों चक्रवाती तूफान ‘फैलिन’ की चेतावनी के मद्देनजर अनिश्चितकालीन हड़ताल गुरुवार को ‘अस्थायी रूप से’ आज वापस ले ली। इस तूफान के शुक्रवार को बंगाल की खाड़ी पहुंचने की संभावना है।
केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने अपनी मासिक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि मुझे नहीं लगता कि तेलंगाना गठन पर फैसले से पीछे हटने की कोई संभावना है। हालांकि तेलंगाना विधेयक को संसद के शीतकालीन सत्र में पेश करने को लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई। उन्होंने कहा कि तेलंगाना के गठन पर विचार के लिए बना मंत्री समूह अपनी रिपोर्ट जल्द से जल्द देगा और आंध्र प्रदेश के साथ न्याय होगा। राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की संभावना पर शिंदे ने कहा कि अभी इस पर विचार नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए केंद्र ने अर्द्धसैनिक बलों के 7500 जवानों को आंध्र भेजा है।
यह पूछने पर कि मंगलवार को गठित मंत्री समूह में आंध्र प्रदेश से कोई प्रतिनिधि क्यों नहीं है, शिंदे ने कहा कि यदि यह कोई मुद्दा नहीं है। मंत्री समूह के अपना काम पूरा कर लेने के बाद केंद्र और राज्य स्तर पर कई कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि मंत्री समूह की सिफारिशों और सुझावों के आधार पर गृह मंत्रालय केंद्रीय मंत्रिमंडल के लिए पुनर्गठन विधेयक के साथ एक अन्य नोट तैयार करेगा और राज्य पुनर्गठन विधेयक को पास करने व विधेयक को राज्य विधानमंडल के विचारार्थ भेजने के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश करने का आग्रह करेगा। कैबिनेट की बैठक के बाद प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से सिफारिश करेंगे कि संविधान के अनुच्छेद-3 के तहत विधेयक के मसविदे को राज्य विधानमंडल की राय जानने के लिए 30 दिन के भीतर भेजा जाए। आंध्र प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद विधेयक पर विचार कर 30 दिन के भीतर अपनी राय देंगे।
शिंदे ने कहा कि राज्य विधानमंडल की सिफारिशों को मसविदा विधेयक में शामिल किया जाएगा। कानून मंत्रालय भी इस पर अपनी राय देगा। इसके बाद पुनर्गठन विधेयक के मसविदे के साथ एक तीसरा नोट तैयार किया जाएगा और उसे संसद में पेश करने


के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में पेश करने के लिए नोटिस दिया जाएगा। दोनों सदनों में विधेयक को पेश करने के बाद साधारण बहुमत से इसे पारित करना होगा। संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा और उसके बाद  नया राज्य तेलंगाना अस्तित्व में आ जाएगा। यह पूछने पर कि अगर राज्य विधानसभा पृथक राज्य के गठन के समर्थन में प्रस्ताव नहीं पारित करती तो तेलंगाना का क्या भविष्य होगा, शिंदे ने कहा कि राज्य विधान मंडलों ने पूर्व में भी इस तरह कि प्रस्तावों में विलंब किया है और संविधान के तहत (विधानसभा का प्रस्ताव) ऐसा अनिवार्य नहीं है।
उधर, अलग तेलंगाना के गठन के बारे में केंद्रीय कैबिनेट के फैसले के खिलाफ पांच दिन से जारी अनिश्चितकालीन हड़ताल वापस लेने के बाद हड़ताली कर्मियों के नेता साईबाबू ने बताया कि मुख्यमंत्री एन किरण कुमार रेड्डी की अपील पर बिजली कर्मचारी संयुक्त कार्रवाई समिति (जेएसी) हड़ताल वापस लेने के लिए राजी हो गई। उन्होंने बताया कि कर्मचारी गुरुवार सुबह काम पर लौट आए। रेड्डी ने गुरुवार दोपहर यहां सचिवालय में हड़ताली कर्मियों से बात की।
साईबाबू ने मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद कहा कि हमने अपनी हड़ताल पूरी तरह से वापस नहीं ली है। चक्रवात के खतरे के मद्देनजर इसे सिर्फ अस्थायी रूप से वापस लिया गया है। हालांकि उन्होंने कहा कि हम किसी और तरीके से अपना प्रदर्शन जारी रखेंगे। जेएसी नेता ने अनिश्चितकालीन हड़ताल में शामिल होने के लिए 30,000 नियमित और 15,000 अनुबंधित बिजलीकर्मियों का आभार जताया।
इस बीच, दिल्ली हाई कोर्ट ने सीमांध्र के कांग्रेस नेता व सांसद एल राजगोपाल की उस याचिका पर सुनवाई करने का फैसला किया जिसमें उन्होंने तेलंगाना के मुद्दे पर उनका इस्तीफा स्वीकार करने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की अपील की है। न्यायमूर्ति वीके जैन ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राजीव मेहरा से यह कहते हुए अदालत की मदद करने को कहा कि मामले में कानून का सवाल शामिल है।
राजगोपाल ने पृथक तेलंगाना के विरोध में दो अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को अपना इस्तीफा सौंपा था। उनकी ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत भूषण ने तर्क दिया कि इस्तीफे के बाद किसी सांसद को पद पर बने रहने के लिए इस तरह विवश करने के लिए संविधान में कोई प्रावधान नहीं है।

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