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अशक्तों को मिलें तीन फीसद सरकारी नौकरियां: सुप्रीम कोर्ट PDF Print E-mail
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Tuesday, 08 October 2013 13:20

नई दिल्ली। नई दिल्ली। समाज के आम लोगों के बराबर हक पाने की विकलांगों या समाज के अशक्त लोगों की लंबी जंग आखिरकार रंग लाई। उनकी कानूनी लड़ाई को वाजिब ठहराते हुए मंगलवार को देश की आला अदालत ने केंद्र को आदेश दिया कि सरकारी नौकरियों में इस अशक्त वर्ग के लिए तीन फीसद स्थान आरक्षित रखे जाएं। सर्वोच्च न्यायालय के इस अहम फैसले से देश के चार करोड़ विकलांगों (अशक्तों) को फायदा होगा। अदालत ने कहा है कि यह आरक्षण कुल खाली स्थानों के आधार पर होना चाहिए। साथ ही इस बात पर नजर रखी जाएगी कि इस आरक्षण का उचित क्रियान्वयन हो रहा है कि नहीं।
न्यायालय का यह फैसला केंद्र और सभी राज्य सरकारों के लिए है। इसके मुताबिक उनके विभागों, कंपनियों-संस्थानों में अशक्त जनों को नौकरियों में तीन फीसद आरक्षण मुहैया कराया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह ‘खतरनाक हकीकत’ है कि विकलांग लोग सामाजिक और व्यावहारिक बाधाओं की वजह से रोजगार से महरूम हैं।
अपने फैसले में न्यायालय ने चेतावनी दी कि अशक्त जनों के लिए आरक्षण की व्यवस्था का पालन नहीं करने को ‘अवज्ञा’ का कृत्य माना जाएगा और संबद्ध नोडल अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
पीठ ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह भी निर्देश दिया कि वे सभी प्रतिष्ठानों में उपलब्ध रिक्तियों की गणना करें और तीन महीने के भीतर अशक्त के लिए पदों की पहचान करें और बिना किसी चूक के इसे लागू करें।        
तीन फीसद आरक्षण में से एक-एक फीसद दृष्टिहीनों, बधिरों और मूक लोगों और लोकोमोटर अशक्तता या सेरिब्रल पाल्सी के लिए होगा। न्यायालय ने साथ ही स्पष्ट किया कि अशक्त जनों को आरक्षण देते वक्त 50 फीसद से अधिक आरक्षण नहीं दिए जाने के सिद्धांत को लागू नहीं किया जाएगा।
प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम, न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने कहा, अशक्तजनों के सशक्तीकरण और


उनके समावेश के लिए रोजगार एक महत्त्वपूर्ण कारक है। यह खतरनाक हकीकत है कि अशक्त लोग नौकरियों से दूर हैं, इसलिए नहीं कि उनकी विकलांगता उनके कामकाज में आड़े आती है, बल्कि यह सामाजिक और व्यावहारिक बाधाएं हैं जो कार्यशक्ति में उन्हें शामिल करने से रोकती हैं।
पीठ ने कहा, ‘समाज के रवैए के कारण अनेक अशक्त लोग गरीबी और दयनीय स्थितियों में रहते हैं। उन्हें उनके अपने जीवन और अपने परिवार और समुदाय के जीवन में उपयोगी योगदान के अधिकार से वंचित किया जाता है।’
इस वर्ग के लिए पदों की पहचान का निर्देश देते हुए पीठ ने कहा, केंद्र को सभी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों, सरकारी कंपनियों को निर्देश जारी करना चाहिए जिसमें यह घोषणा करनी चाहिए कि अशक्त जनों के लिए आरक्षण की योजना का पालन नहीं करने को अवज्ञा का कृत्य माना जाएगा। साथ ही अशक्त जनों के लिए आरक्षण को सख्ती से लागू करने के लिए जिम्मेदार विभाग, पीएसयू , सरकारी कंपनियों के नोडल अधिकारी के खिलाफ चूक के लिए विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
एनजीओ- नेशनल फेडरेशन आॅफ द ब्लाइंड ने अशक्त जन (समान अवसर, अधिकारों के संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 33 को लागू करने की मांग करते हुए आरोप लगाया था कि केंद्र और राज्य सरकारें दृष्टिहीनों और दृष्टि बाधितों को आरक्षण प्रदान करने में विफल रहे हैं और वस्तुत: उन्हें सरकारी पदों पर भर्ती की प्रक्रिया से बाहर रखा गया है।
अदालत में अशक्त जनों का पक्ष रखने वाले वरिष्ठ वकील एसके रूंगटा की बात को कायम रखत हुए पीठ ने साफ किया कि सरकार के विभिन्न विभागों में तीन फीसद आरक्षण को ए, बी, सी, डी चार वर्गों में रखा जाएगा।

(ईएनएस,भाषा)

 

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