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खतरे के तार PDF Print E-mail
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Tuesday, 08 October 2013 10:02

जनसत्ता 8 अक्तूबर, 2013 : किसी भी घनी बस्ती या गली-मुहल्ले में यह देखा जा सकता है कि सिर के ऊपर बिजली के खुले तार किस तरह मौत के दूत बन कर लटके रहते हैं। किसी छोर से टूटे या फिर बहुत नीचे से गुजरते तार से छूकर लोगों के मारे जाने की खबरें भी आती रहती हैं। निश्चित रूप से यह प्रबंधन में घोर लापरवाही का मामला है। लेकिन शायद ही कभी बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनी ऐसी घटनाओं की जिम्मेदारी लेती है। फिर, पीड़ित या उसके परिवार को कंपनी की ओर से मुआवजा मिलने की उम्मीद भी कैसे की जाए? अगर कभी मामला तूल पकड़ता है तो मामूली रकम देकर उसे रफा-दफा करने की कोशिश की जाती है। लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस तरह की एक घटना के संदर्भ में सख्त रुख अख्तियार किया है। सवा तीन साल पहले बिजली के नंगे तार की चपेट में आकर मारे गए दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र के परिवार को अदालत ने आठ लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश बीएसइएस यमुना पॉवर लिमिटेड को दिया है। गौरतलब है कि कश्मीरी गेट इलाके में एक संकरे रास्ते से गुजरते हुए वह छात्र काफी नीचे लटके बिजली के खुले तार के संपर्क में आए एक लोहे के दरवाजे से छू गया था और करंट लगने से उसकी मौत हो गई। मामला दर्ज किए जाने के बाद विद्युत निरीक्षक ने भी अपनी जांच में कंपनी को बिजली के तारों को खतरनाक हालत में छोड़ देने के लिए जिम्मेवार ठहराया था। यही नहीं, जमीन से सिर्फ दो-तीन फुट ऊपर लटका हुआ उच्च क्षमता के धारा-प्रवाह वाला तार सड़क पर जमा बरसाती पानी के सीधे संपर्क में था। जाहिर है, अदालत का ताजा फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि खुले तारों के चलते या रखरखाव में लापरवाही की स्थिति में होने वाले हादसे की जवाबदेही से बिजली


आपूर्तिकर्ता कंपनी बच नहीं सकती।
यह छिपा नहीं है कि न सिर्फ घनी बस्तियों में बिजली आपूर्ति के लिए बिछाए गए, बल्कि सड़कों, सार्वजनिक स्थलों, पार्कों, बाजारों आदि में रोशनी के लिए लगाए गए खंभों आदि के आसपास भी काफी नीचे तक तार लटकते रहते हैं। किसी खराबी की शिकायत पर जब कर्मचारी आते हैं तो गड़बड़ी को दुरुस्त करने के बाद कई बार वे तारों को बगैर ढके छोड़ जाते हैं। इसके अलावा, वोल्टेज के उतार-चढ़ाव की स्थिति में प्लास्टिक की कमजोर परत वाले तारों के पिघल कर आपस में चिपकने या उनके जोड़ खुले होने के चलते रास्तों के किनारे नाली या फिर किन्हीं वजहों से जमा पानी में बिजली प्रवाहित होने से भी खतरा मंडराता रहता है। लेकिन खुले तारों से होने वाले हादसों को आमतौर पर लोग दुर्भाग्य मान कर या फिर संबंधित महकमे के अधिकारियों-कर्मचारियों के दबाव में आकर चुप रह जाते हैं। जबकि इसकी जिम्मेदारी सीधे बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों पर होती है। बहुत सारी जगहों पर रबड़े चढ़े तारों के बजाय खुले तारों से बिजली की आपूर्ति की जाती है। जबकि रबड़ चढ़े तार जानलेवा दुर्घटनाओं के साथ-साथ बिजली-चोरी पर काबू पाने में भी मददगार साबित हो सकते हैं। राजस्थान इसका उदाहरण है। दिल्ली में तमाम सुनहरे वादों के साथ बिजली आपूर्ति की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को सौंपी गई थी। लेकिन बिजली की दरें भले मनमाने ढंग से बढ़ाई जाती रही हों, ये कंपनियां आपूर्ति-प्रबंधन में सुरक्षा की गारंटी भी नहीं दे सकी हैं।

 

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