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उलझन का आधार PDF Print E-mail
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Monday, 07 October 2013 10:08

जनसत्ता 7 अक्तूबर, 2013 : हर नागरिक को विशिष्ट पहचान नंबर वाले कार्ड देने की योजना शुरू से विवाद में घिरी रही है। कई लोगों ने इसे निजता में दखल देने वाला मान कर इसके औचित्य पर सवाल उठाए थे।

यह बहस ठंडी पड़ी तो संसदीय समिति ने इसकी वैधानिकता का प्रश्न उठा दिया। फिर, गृह मंत्रालय ने यह कह कर दुविधा की हालत पैदा कर दी कि अगर उसकी ओर से तैयार किए जा रहे राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और आधार-योजना के आंकड़ों में फर्क होगा, तो किसे प्रामाणिक माना जाएगा। आखिरकार प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद गृह मंत्रालय ने अपनी शंका वापस ले ली। मगर पखवाड़े भर पहले एक बार फिर आधार-कार्ड योजना को लेकर उलझन की स्थिति पैदा हो गई। सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि किसी को भी केवल इसलिए किसी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके पास आधार-कार्ड नहीं है। न्यायालय के इस आदेश ने केंद्र के साथ-साथ राज्यों को भी परेशानी में डाल दिया और पूरी योजना को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई। यह फैसला ऐसे समय आया जब केंद्र के अलावा कई राज्य सरकारें भी सबसिडी और कल्याणकारी कार्यक्रमों को आधार से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी हैं। चालीस करोड़ से ज्यादा आधार-कार्ड वितरित किए जा चुके हैं और यह क्रम लगातार जारी है।
लेकिन यह भी सही है कि कई जगह जहां प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण यानी सबसिडी को नकद रूप में देने की योजना शुरू की गई है, बहुत-से लाभार्थियों के पास आधार-कार्ड नहीं हैं। वे पहचान के पुराने दस्तावेजों की बिना पर ही अपनी हकदारी जता सकते हैं। बहरहाल, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण कार्यक्रम में आई बाधा के मद््देनजर केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर स्पष्टीकरण और उसमें बदलाव की फरियाद की है। अदालत ने इस पर फिर सुनवाई करने का अनुरोध मान लिया है। यह उचित भी है। इसलिए कि पच्चीस सितंबर का उसका आदेश अंतरिम फैसला था, अंतिम नहीं। दूसरे, अगर सभी पहलुओं पर


विचार नहीं किया गया, तो इस योजना के पीछे लगी मेहनत और लागत बेकार चली जाएगी। आधार-योजना की तैयारी और इसे अमल में लाने के क्रम में जो भी गड़बड़ियां रही हों, इसके पीछे का मकसद गलत नहीं था। यह एक नवाचारी योजना है, जिसका उद््देश्य सबसिडी वितरण में पारदर्शिता लाना और इसे बिचौलियों के हाथ में जाने से रोकना है। राशन-कार्ड जैसे पहचान के पुराने तरीकों के साथ फर्जीवाड़े की शिकायत आम रही है। इसलिए विशिष्ट पहचान नंबर से जुड़े खातों में सबसिडी का लाभ सीधे भेजने की योजना के औचित्य से इनकार नहीं किया जा सकता।
मगर सबसिडी की सुविधा पाने के लिए आधार-कार्ड को अनिवार्य बनाने से पहले केंद्र और राज्य सरकारों ने क्या यह सुनिश्चित किया कि सभी लाभार्थियों को आधार-कार्ड मिल गए हैं? स्पष्टीकरण की जरूरत केवल सर्वोच्च अदालत की ओर से नहीं, सरकारों की ओर से भी है। अदालत ने पिछली सुनवाई में सरकार से यह भी पूछा था कि अवैध रूप से यहां आकर रह रहे लोगों को आधार-कार्ड न मिल सके, इसका क्या उपाय किया गया है। लेकिन गैर-कानूनी आप्रवासन तो तब भी अपराध था जब आधार-योजना नहीं थी। अगर पुलिस को वैसी सूचना मिले, तो संबंधित व्यक्ति के पास आधार-कार्ड होने के बावजूद उसे वापस भेज सकती है। एक मुद््दा इस योजना की वैधानिकता का भी उठता रहा है, क्योंकि इससे संबंधित प्रस्तावित विधेयक को अभी तक संसद की मंजूरी नहीं मिल पाई है। पर इसके लिए मुख्य रूप से भाजपा दोषी है जिसने संसदीय समिति में इसे उलझा दिया। समिति को अड़ंगा लगाने के बजाय कमियां दूर करने के बारे में अपने सुझाव देने चाहिए थे।

 

 

 

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