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सरकार पर भारी पड़े राहुल, केंद्र पलटा, दागियों पर लाया अध्यादेश वापस PDF Print E-mail
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Thursday, 03 October 2013 09:00

जनसत्ता ब्यूरो,
नई दिल्ली। वही हुआ जिसकी उम्मीद थी। राहुल गांधी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भारी साबित हुए। नतीजतन बुधवार को सरकार ने न केवल विवादास्पद अध्यादेश को वापस लेने का फैसला कर लिया,

बल्कि उस विधेयक की वापसी का भी फैसला लगे हाथ कर लिया जो इस समय राज्यसभा की स्थायी समिति के विचाराधीन है। विधेयक के विचाराधीन रहते हुए भी सरकार ने अध्यादेश का फैसला किया था। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे पर मचे घमासान के बाद बुधवार शाम अपने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई और अध्यादेश व विधेयक दोनों वापस लेने के फैसले पर मुहर लगा दी।
इससे पहले दिन भर सियासी हलकों में गहमागहमी दिखी। शुरुआत राहुल गांधी की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात के साथ हुई। उसके बाद कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक हुई। फिर प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की। मंत्रिमंडल की बैठक बुलाने से पहले उन्होंने सहयोगी दलों के दिल्ली में उपलब्ध नेताओं से भी मंत्रणा की। तभी साफ हो गया था कि फैसला राहुल गांधी के मनमाफिक होगा। दिन में ही कांग्रेस के कई नेताओं और मंत्रियों तक के बयान आ गए थे। यानी मंत्रिमंडल की बैठक महज औपचारिकता भर बची थी। जिसे शाम को निभा दिया गया।
एक हफ्ते की अमेरिका यात्रा से लौटे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार को अध्यादेश पर जिस तरह के तेवर दिखाए थे उससे उम्मीद बंधी थी कि वे शायद राहुल गांधी को समझाने में सफल हो जाएंगे। लेकिन ऐसा न होना था और न हुआ। सुबह राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह से मुलाकात कर समझा दिया कि अध्यादेश वापस लेने के सिवा अब कोई विकल्प नहीं है। उसके बाद कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक हुई। कोर ग्रुप ने इस मुद्दे पर चर्चा की। कोर ग्रुप में सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री  के अलावा गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे व सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल शामिल थे। समझा जाता है कि इस बैठक में महसूस किया गया कि अध्यादेश के खिलाफ जनता की भावनाओं को देखते हुए सरकार के लिए यह बेहतर होगा कि इसे वापस ले लिया जाए।
कोर ग्रुप की बैठक में विचार-विमर्श के बाद प्रधानमंत्री ने


राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की। उन्हें इस मुद्दे पर सरकार के सोच से अवगत कराया। राष्ट्रपति बुधवार दोपहर को ही दो देशों की यात्रा पर रवाना हो गए। वे तो इस अध्यादेश पर पहले ही असहमति के संकेत दे चुके थे। उनसे मिल कर भाजपा ने अध्यादेश को मंजूरी नहीं देने का आग्रह किया था। उसके बाद राष्ट्रपति ने सरकार के तीन प्रमुख मंत्रियों को जैसे ही राष्ट्रपति भवन तलब किया, संकेत साफ नजर आ गए थे कि वे आसानी से मंजूरी नहीं देंगे। दरअसल इसी मामले में सरकार ने संसद में जब पहले ही विधेयक पेश कर दिया था तो अध्यादेश जारी करने का कोई तुक था ही नहीं। हां, इस कवायद से यह संदेश जरूर गया था कि सरकार लालू यादव और रशीद मसूद को बचाने की हड़बड़ी में है। इससे सारे देश में सरकार और कांग्रेस दोनों की किरकिरी हुई थी।
राष्ट्रपति भवन के एतराज के अगले ही दिन प्रेस क्लब में अचानक पहुंच कर राहुल गांधी ने पार्टी प्रवक्ता अजय माकन के संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि यह अध्यादेश ‘बकवास’ है और इसे ‘फाड़कर फेंक देना चाहिए।’ यह स्पष्ट करते हुए कि वे प्रधानमंत्री की सत्ता को किसी भी तरह से कमतर नहीं कर रहे हैं, राहुल ने उसी दिन प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा था और कहा था कि उनके नेतृत्व के प्रति उनका बहुत सम्मान है।
मंत्रिमंडल की बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने यही कहा कि विभिन्न तबकों की तरफ से जताई गई चिंता का संज्ञान लेते हुए सरकार ने अध्यादेश की वापसी का फैसला किया है। इतना ही नहीं इस बाबत विचाराधीन विधेयक को भी वापस ले लिया जाएगा। साथ ही सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने पत्रकारों से कहा कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि जन प्रतिनिधित्व कानून के कुछ पहलुओं से संबंधित अध्यादेश और साथ ही साथ विधेयक (संसद में लंबित) को वापस लिया जाता है।

 

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