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सदन में पेश हुई निमेष आयोग की रिपोर्ट: एसटीएफ के दावे पर उठे सवाल PDF Print E-mail
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Monday, 16 September 2013 15:27

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद, वाराणसी और लखनऊ कचहरियों में नवम्बर 2007 में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोट मामलों में स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) द्वारा खालिद मुजाहिद तथा तारिक कासमी की बाराबंकी में गिरफ्तारी की सत्यता की जांच के लिये गठित आर. डी. निमेष आयोग की रिपोर्ट आज राज्य विधानसभा में पेश की गयी।
इस रिपोर्ट में एसटीएफ द्वारा मुजाहिद तथा कासमी की बाराबंकी में गिरफ्तारी की सत्यता पर संदेह जाहिर करते हुए कई सवाल उठाये गये हैं और आतंकवाद से जुड़े मामलों में होने वाली गिरफ्तारियों के बारे में कई सुझाव भी दिये गये हैं। साथ ही इस घटनाक्रम में सक्रिय भूमिका निभाकर ‘विधि विरुद्ध’ कार्य करने वाले अधिकारियों तथा कर्मचारियों को चिह्नित करके उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी की है।
आयोग ने रिपोर्ट में कहा है कि तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की 22 दिसम्बर 2007 की जिस घटना की आड़ में बाराबंकी से गिरफ्तारी दिखायी गयी है उसमें इन दोनों की संलिप्तता ‘संदेहजनक’ प्रतीत होती है।
तेईस नवम्बर 2007 को हुए कचहरी बम धमाकों के आरोपी कासमी और मुजाहिद की गिरफ्तारी की न्यायिक जांच की लगातार मांग के मद्देनजर तत्कालीन मायावती सरकार ने 14 मार्च 2008 को गठित निमेष आयोग ने यह भी कहा है ‘‘चूंकि मामला बाराबंकी जिला न्यायालय में विचाराधीन है। इसलिये इस स्तर पर इस घटना के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति के विरुद्ध दायित्व निर्धारित नहीं किये जा सकते।’’
आयोग ने अपनी रिपोर्ट पिछले साल अगस्त में ही राज्य सरकार को सौंप दी थी। लगभग 237 पन्नों की इस रिपोर्ट के मुताबिक बचाव पक्ष की तरफ से तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद समेत 35, अभियोजन पक्ष की तरफ से तत्कालीन पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह और अपर पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) बृजलाल समेत 37 तथा 61 तटस्थ लोगों ने आयोग के समक्ष हलफनामे दाखिल किये हैं।
आयोग ने कहा है, ‘‘सभी तथ्यों के आधार पर कथित आरोपी खालिद मुजाहिद तथा तारिक कासमी की दिनांक 22 दिसम्बर 2007 को सुबह छह बजकर 20 मिनट पर आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है और अभियोजन के साक्षी के बयानों पर पूर्ण रूप से विश्वास नहीं किया जा सकता।’’
ज्ञातव्य है कि मुजाहिद की गुजरे मई में फैजाबाद से पेशी से वापस लाये जाते समय संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी थी।
आयोग की इस रिपोर्ट के बाद राज्य पुलिस की एसटीएफ की कार्यप्रणाली पर गम्भीर सवाल खड़े हुए हैं। आयोग ने कासमी और मुजाहिद की गिरफ्तारी के दावे की सत्यता पर संदेह जाहिर करते हुए 14 महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।
आयोग ने रिपोर्ट में कई सुझाव भी दिये हैं। आयोग ने आतंकवादी घटना में पुलिस से अलग विभाग के किसी राजपत्रित स्तर के अधिकारी को बरामदगी का गवाह बनाने, आरोपियों से पूछताछ की वीडियो रिकार्डिंग करने, पुलिस की किसी दूसरी शाखा के राजपत्रित अधिकारी से ही जांच कराने


तथा ऐसी घटनाओं के निस्तारण के लिये विशेष अदालतें गठित करने के सुझाव दिये हैं। आयोग ने आतंकवादी घटना से जुड़े मामलों का अधिकतम दो साल में निस्तारण की व्यवस्था करने तथा हर स्तर की कार्यवाही की समयसीमा तय करने, समय पर निस्तारण नहीं होने पर सम्बन्धित कर्मी के खिलाफ कार्यवाही करने, पीड़ित पक्षों को समुचित मुआवजे का प्रावधान करने, निर्दोष लोगों को झूठे आरोप लगाकर फंसाने पर दायित्व निर्धारित करके सजा दिये जाने का प्रावधान करने की भी संस्तुति की है।
कासमी ने आयोग के समक्ष प्रस्तुत अपने शपथपत्र में आरोप लगाया है कि उसे 12 दिसम्बर 2007 को आजमगढ़ जिले के शंकरपुर रानी की सराय चेकपोस्ट के पास टाटा सूमो सवार नौ-दस लोगों ने अगवा करके लखनऊ ले जाया गया जहां उसे ‘थर्ड डिग्री’ की प्रताड़ना दी गयी और खुद को आतंकवादी बताने वाले बयान जबरन रटाये गये, जबर्दस्ती झूठे बयान दिलवाये गये तथा सादे कागज पर दस्तखत कराये गये।
बाद में एसटीएफ ने उसकी तथा खालिद मुजाहिद की बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास से गिरफ्तारी का दावा कर दिया।
कासमी ने अपने शपथपत्र में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह, अपर पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) बृजलाल और सीतापुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अमिताभ यश का नाम भी बतौर षड्यंत्रकारी लिया है।
मुजाहिद ने अपने शपथपत्र में आरोप लगाया है कि वह 16 दिसम्बर 2007 को जौनपुर जिले के मड़ियाहूं स्थित उसके घर के नजदीक वाले बाजार में नील वापस करने गया था तभी वहां पहुंची गाड़ी से निकले कुछ लोगों ने उसे जबरन अपने वाहन में लाद लिया और रास्ते में उसके हाथ-पैर बांध दिये।
मुजाहिद ने शपथपत्र में आरोप लगाया है कि उसे लखनऊ में किसी अज्ञात जगह पर रखा गया और निहायत अमानवीय प्रताड़नाएं दी गयीं। बाद में एसटीएफ ने उसकी तथा तारिक कासमी की बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास से गिरफ्तारी का दावा कर दिया।
हालांकि, रिपोर्ट में किसी विशेष पुलिस अधिकारी को कठघरे में खड़ा नहीं किया गया है। आयोग ने कहा है कि 12 दिसम्बर 2007 को मुजाहिद को अगवा किये जाने के बाद और उसी साल 22 दिसम्बर को मुजाहिद और कासमी की बाराबंकी से गिरफ्तारी के दावे से पहले के घटनाक्रम में एसटीएफ के अलावा अन्य पुलिस दल का शामिल होना प्रतीत होता है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘लेकिन साक्ष्यों से यह स्पष्ट नहीं है कि कथित आरोपियों खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी को जिन व्यक्तियों ने उठाया, निरुद्ध कर प्रताड़ित किया वे किस दल के व्यक्ति थे और उन्होंने क्या-क्या किया। ऐसे में उन लोगों को चिह्नित करने के बाद ही उनका उत्तरदायित्व निर्धारित किया जा सकता है।’’
(भाषा)


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