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ज्वालामुखी के मुहाने पर है पश्चिमी उत्तर प्रदेश PDF Print E-mail
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Monday, 09 September 2013 09:02

अनिल बंसल
नई दिल्ली। मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा की आग में जल रहा है। इस आग से पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के झुलसने का खतरा है। राज्य सरकार इन घटनाओं को लेकर न संवेदनशील दिख रही है, न गंभीर। इस वजह से अबतक लगभग दो दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है। मुजफ्फरनगर की आंच पड़ोस के शामली जिले में तो पहुंच ही चुकी है, मेरठ को भी अपनी चपेट में ले लिया है। स्थिति की गंभीरता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस, पीएसी और अर्द्धसैनिक बलों को भी कामयाबी न मिलती न देख सेना बुलाई गई।
उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा कोई नई बात नहीं है। आजादी के बाद से ही सूबे में कई दंगे हुए हैं। लेकिन इस बार मुजफ्फरनगर की सांप्रदायिक हिंसा का आयाम अलग है। पहले आमतौर पर दंगे शहरी इलाकों में होते रहे हैं। जिन पर देर-सवेर पुलिस प्रशासन काबू कर लेता था। लेकिन इस बार हिंसा और नफरत की चपेट में ग्रामीण इलाकें हैं, जहां न कर्फ्यू कारगर होता है और न पुलिस के जवान। गांवों में सांप्रदायिकता का जहर फैलना देश की एकता और अखंडता पर भी गंभीर असर डालता है।
मुजफ्फरनगर में दंगे की शुरुआत एक लड़की को छेड़ने की मामूली घटना से हुई थी। जानसठ के पास कवाल गांव में 27 अगस्त को स्कूल जाती एक जाट लड़की से कवाल के अल्पसंख्यक समुदाय के लड़कों ने छेड़खानी की। लड़की के भाई ने इसका विरोध किया तो भी वे बाज नहीं आए। इस पर उन्होंने अपने चचेरे भाई को बुला लिया। प्रतिशोध की आग में जल रहे दोनों भाइयों ने छेड़खानी करने वाले लड़के पर चाकुओं से हमला कर दिया। यह खबर कवाल गांव में आग की तरह फैली। अल्पसंख्यक बहुल इस गांव के लोगों ने दोनों हमलावर लड़कों को घेर कर वहीं हत्या कर दी। इस वजह से घटना ने सांप्रदायिक रंग ले लिया।
दरअसल दोनों जाट लड़कों की हत्या के बाद एक एमएमएस ने आग में घी का काम किया। यह एमएमएस किसने और कब जारी किया, इसकी पुख्ता तस्दीक तो अभी तक नहीं हो पाई है। लेकिन क्लिप जरूर लोग एक-दूसरे को मोबाइल पर दिखा रहे हैं। इसने सांप्रदायिक वैमनस्य ने वीभत्स रूप ले लिया। राज्य सरकार ने हालांकि इस क्लिप को किसी और घटना की बताते हुए लोगों से आवेश में न आने की अपील की है। लेकिन उसका कोई असर नहीं है। 27 अगस्त की घटना के बाद मुजफ्फरनगर के कलेक्टर सुरेंद्र सिंह और पुलिस कप्तान मंजिल सैनी का तबादला कर दिया गया। इससे लोगों का गुस्सा और बढ़ा क्योंकि सुरेंद्र सिंह जाट हैं। जाटों को लगता है कि मुलायम सिंह यादव उनके प्रति द्वेष भाव रखते हैं। हालांकि अखिलेश सरकार ने जाट राजेंद्र चौधरी को कैबिनेट मंत्री बना रखा है और सपा से जुड़े दूसरे कई नेताओं को मंत्री जैसी हैसियत भी दे रखी है। लेकिन हकीकत यह भी है कि समाजवादी पार्टी का पिछले चुनाव में एक भी जाट उम्मीदवार


नहीं जीत पाया था।
मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में हुई घटना के बाद पास के गांव में इसके विरोध में एक महापंचायत हुई तो प्रतिक्रिया में मुजफ्फरनगर शहर में जुमे की नमाज के बाद प्रशासन के रोकने के बाद भी हजारों लोग सड़कों पर उतर पड़े। पुलिस प्रशासन तो नाकारा साबित हुआ उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी ८ ही, जनप्रतिनिधि भी चुप्पी साध गए। अलबत्ता सियासी रोटियां सेंकने का सिलसिला जरूर शुरू हो गया। सात सितंबर को कवाल के पास हुई पंचायत में भाजपा विधायक दल के नेता हुकुम सिंह, उन्हीं के विधायक संगीत सोम और कई और नेता शामिल हुए। इसमें दोनों जाट युवकों की हत्या पर शोक और उनके हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई न होने पर रोष जताया गया। महापंचायत में चेतावनी दी गई कि जो भी उनकी बहू-बेटियों की इज्जत पर हाथ डालेगा उसे वे लोग खुद सजा देंगे।
हैरानी की बात है कि पुलिस प्रशासन इस पंचायत को नहीं रोक पाया। अलबत्ता पंचायत में जा रहे कुछ लोगों पर रास्ते में दूसरे समुदाय की तरफ से हमले हुए तो पंचायत में और रोष बढ़ा। नतीजतन जिले में अफवाहें फैलीं और लोगों में असुरक्षा का भाव बढ़ा। प्रतिक्रिया मेरठ जिले के मवाना इलाके में भी हुई। वहां एक आदमी की हत्या कर दी गई। मुजफ्फरनगर में तो हिंसा का नंगा नाच शनिवार को शुरू होकर रविवार को भी जारी रहा। मुजफ्फरनगर में कर्फ्यू लगाकर सेना बुलानी पड़ी है।
भाजपा ने जहां उत्तर प्रदेश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा के लिए समाजवादी पार्टी की मुसलिम तुष्टिकरण की नीति को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं सपा इन दंगों को भड़काने में भाजपा की भूमिका देख रही है। बसपा सुप्रीमो मायावती को लगता है कि इस मामले में सपा और भाजपा की साठगांठ है। वहीं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह अखिलेश यादव की सरकार से बेहतर मायावती की सरकार को बता रहे हैं। कांग्रेस के इकलौते जाट विधायक पंकज मलिक भी मुजफ्फरनगर के ही हैं। जबकि मुजफ्फरनगर शहर के सपा विधायक चितरंजन स्वरूप इस समय राज्य सरकार में मंत्री हैं। जिले में जब नफरत की आग फैली तो वे वाराणसी में थे। प्रदेश कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप माथुर दंगा प्रभावित इलाकों में जाना चाहते थे। लेकिन शामली में ही पकड़ लिए गए।
अब लाख टके का सवाल यह है कि हिंसा बढ़ क्यों रही है? दरअसल जब से अखिलेश सरकार सत्ता में आई है, राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की दो दर्जन से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं। ज्यादातर जगहों पर शुरुआत कानून व्यवस्था के मुद्दे से ही हुई। गौतमबुद्ध नगर जिले में आइएएस अफसर दुर्गा नागपाल को जिस मंशा से निलंबित किया गया, उसने भी आग में घी का काम किया। यह धारणा फैल रही है कि सपा सरकार अल्पसंख्यकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करना चाहती। भले वे किसी भी अपराध में लिप्त क्यों न हों?

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