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तृणमूल की ताकत PDF Print E-mail
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Wednesday, 31 July 2013 10:08

जनसत्ता 31 जुलाई, 2013: पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों के जरिए तृणमूल कांग्रेस ने राज्य के ग्रामीण इलाकों में एक बार फिर अपनी मजबूत पकड़ साबित की है। यों एक समय लग रहा था कि सत्ताधारी दल को बहुत कुछ खोना पड़ सकता है। शारदा चिटफंड घोटाला, जिसके लाखों लोग शिकार हुए, आम चर्चा का विषय बना हुआ था। तृणमूल के कई नेताओं पर आरोपियों को संरक्षण देने के आरोप थे। लेकिन ठगे गए लोगों की जमा पूंजी वापस करने का वादा कर आखिरकार राज्य सरकार ने उनकी नाराजगी दूर करने की तरकीब निकाल ली। दो साल पहले मां माटी मानुष के नारे पर सत्ता में आई तृणमूल कांग्रेस को सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने भी राहत पहुंचाई। न्यायालय ने कहा कि टाटा को सिंगूर की जमीन अपने कब्जे में रखने का कोई अधिकार नहीं है। पंचायत चुनावों को प्रभावित करने वाले बहुत सारे स्थानीय कारक भी रहे होंगे। पर यह बेहद अफसोस की बात है कि पांच चरणों में इन चुनावों में हिंसा की काफी घटनाएं हुर्इं और कई लोगों की जान गई।
तृणमूल कांग्रेस ने इन चुनावों में जबर्दस्त कामयाबी दर्ज की है। पंचायतों के नतीजों को देखते हुए सत्रह में से तेरह जिला परिषदों पर उसका कब्जा हो जाएगा। वाम मोर्चे को सिर्फ जलपाईगुड़ी की जिला परिषद हाथ लगी है। हालांकि यहां भी तृणमूल ने अपनी अच्छी उपस्थिति दर्ज कराई है। कांग्रेस भी सिर्फ मुर्शिदाबाद के अपने गढ़ को बचाए रख सकी है, वाम से मामूली बढ़त के साथ। जबकि मालदा और उत्तरी दिनाजपुर के उसके दो गढ़ों में त्रिशंकु परिणाम आया है। लिहाजा, ये नतीजे वाम मोर्चे के साथ-साथ कांग्रेस के लिए भी चिंता का विषय हैं। लोकसभा और फिर विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ मिल कर लड़ा था। इसी कारण यह मानने वाले लोगों की कमी नहीं रही है


कि तृणमूल को अकेले चुनाव में उतरने पर वैसी कामयाबी नहीं मिल पाएगी; संभव है वाम मोर्चे की वापसी हो जाए। लेकिन यह धारणा फिलहाल गलत साबित हुई है। यह भी गौरतलब है कि तृणमूल को सबसे शानदार सफलता बर्दवान और हुगली जैसे माकपा के पुराने गढ़ों में मिली है। दक्षिण बंगाल के बाकी हिस्सों में भी उसने विपक्ष का सफाया कर दिया। हालांकि यह कोई हैरत की बात नहीं है, क्योंकि विधानसभा चुनावों में ही ये इलाके तृणमूल के पाले में आ चुके थे। अलबत्ता खास बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस ने अपने गठन के बाद पहली बार उत्तर बंगाल में पैठ बनाई है; कूचबिहार और दक्षिण दिनाजपुर में उसने बहुमत हासिल किया है।
उत्तर बंगाल में उपेक्षित किए जाने का अहसास अरसे से रहा है। रेलमंत्री रहते हुए ममता बनर्जी ने इस क्षेत्र को ध्यान में रख कर जो परियोजनाएं घोषित कीं और यहां के लिए जनवरी से अलग सचिवालय स्थापित करने का जो वादा उन्होंने किया हुआ है उससे भी यहां पांव पसारने में उन्हें मदद मिली होगी। इस तरह तृणमूल ने जहां अपना भौगोलिक विस्तार किया है वहीं दूसरे दलों के पारंपरिक जनाधार में भी सेंध लगाई है। ऐसे समय जब लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है, इन नतीजों की अहमियत बढ़ जाती है। तृणमूल कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की बयालीस में से उन्नीस सीटें मिली थीं। अब वह इसमें और बढ़ोतरी की उम्मीद कर रही है। उसकी यह आस पूरी होगी या नहीं, यह तो वक्त बताएगा, पर यह साफ है कि किसी नए मोर्चे के गठन या अगले आम चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए होने वाली जोड़-तोड़ में तृणमूल कांग्रेस की अहम भूमिका हो सकती है।

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