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त्रासद कार्रवाई PDF Print E-mail
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Tuesday, 30 July 2013 10:19

जनसत्ता 30 जुलाई, 2013: राजधानी दिल्ली के अति महत्त्वपूर्ण माने जाने वाले इलाके विंडसर प्लेस में शनिवार को देर रात पुलिस की गोली ने एक युवा मोटरसाइकिल सवार की जान ले ली। पुलिस की इस कार्रवाई ने सभी को स्तब्ध कर दिया है। सही है कि मोटरसाइकिल पर करतबबाजी के शौकीन युवकों ने अराजकता की हालत पैदा कर दी थी और इस पर नियंत्रण पाना पुलिस का कर्तव्य था। मगर इसका तरीका ऐसा नहीं होना चाहिए था मानो पुलिस आतंकवादियों से लोहा ले रही हो। उसे उपद्रवी युवकों पर काबू पाने के दूसरे तरीके आजमाने चाहिए थे। गोली चलाना यह बताता है कि पुलिस के प्रशिक्षण में गहरी खामी है। क्या उसे यह नहीं पता कि गोली किन परिस्थितियों में चलाई जानी चाहिए? जवाबदेही तय न होने की परिपाटी भी ऐसी त्रासदी को जन्म देती रहती है। आखिर गोली किसके आदेश पर चलाई गई? घटना के संबंध में पुलिस की दलील है कि पचास मोटरसाइकिलों पर सवार युवा उसके मना करने के बावजूद सड़कों पर खतरनाक स्टंट करते रहे और फिर पत्थरों-र्इंटों से हमला कर दिया। फिर भी, उन सबको रोकना क्या इतना मुश्किल था? खबरों के मुताबिक कम से कम तीन पीसीआर वाहन घटनास्थल पर पहुंच चुके थे। अगर मोटरसाइकिल सवारों के उत्पात से स्थिति गंभीर हो रही थी तो नाकाबंदी करके या बैरियर लगा कर उन्हें रोका या फिर ज्यादा पुलिस बल बुला कर पकड़ा जा सकता था, मोटर वाहन अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत उन पर कार्रवाई की जा सकती थी। गोली चला देने के लिए उनकी ओर से की गई पत्थरबाजी की दलील अपनी जवाबदेही से बचने की ही कोशिश लगती है।
सही है कि दिल्ली में करीब पांच दर्जन मोटरसाइकिल सवारों के समूहों में से कुछ सड़कों पर


इसका प्रदर्शन करते समय नियमों का भी ध्यान रखते हैं। लेकिन पिछले पांच-छह सालों के दौरान रोमांच का यह शौक शहरों-महानगरों के उन लोगों के लिए दहशत का पर्याय बन गया है जिन्हें रोजगार या किन्हीं वजहों से देर रात को सड़क पर निकलना पड़ता है। ऐसी खबरें आती रही हैं कि मोटरसाइकिल सवारों के समूह ने सड़कों पर उत्पात मचाया, लोगों से छीना-झपटी, मारपीट या महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की। पिछले दिनों कुछ पुलिसकर्मियों ने जब ऊधम मचाते युवकों को रोकने की कोशिश की तो उन्हें भी टक्कर मार कर घायल कर दिया गया। हाल में पुलिस ने इनके खिलाफ अभियान चलाया था और बीती चार-पांच जुलाई को एक सौ अठारह लोगों पर खतरनाक तरीके से वाहन चलाने के आरोप में कार्रवाई की। इन सबका हवाला एक नई प्रवृत्ति के निदान के लिए जरूरी है, पर यह गोली चलाने का बचाव नहीं हो सकता। दरअसल, समस्या की जडेÞं घरों से शुरू होती हैं। लाखों रुपए कीमत वाली मोटरसाइकिलों पर सवार ये युवक देर रात को सड़कों पर जो कुछ कर रहे होते हैं, क्या उनके अभिभावकों को इसकी खबर होती है? दूसरी ओर, पुलिस और प्रशासन उन पर वाजिब तरीके से काबू पाने में नाकाम रहता है। ऐसी स्थिति में अगर करतब दिखाने का रोमांच एक सामाजिक समस्या पैदा कर देता हो तो आश्चर्य की बात नहीं है। सवाल है कि कुछ युवकों को अगर स्टंट करने में रुचि है तो क्या उनके लिए अलग से कोई जगह तय नहीं की जा सकती है जहां वे इसे बतौर खेल ही पेश करें? आखिर जोखिम से भरी मोटरसाइकिल या कार रेसिंग की प्रतियोगिताएं आयोजित की ही जाती हैं।

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