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तेलंगाना का पक्ष PDF Print E-mail
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Monday, 29 July 2013 12:01

जनसत्ता 29 जुलाई, 2013: बीते शुक्रवार को कांग्रेस महासचिव और आंध्र प्रदेश के पार्टी प्रभारी दिग्विजय सिंह ने एलान किया कि तेलंगाना के मसले पर विचार-विमर्श का क्रम पूरा हो गया है; अब बस कांग्रेस कार्यसमिति और केंद्र सरकार का औपचारिक निर्णय बाकी है। पिछले हफ्ते हुए मशविरे में पार्टी और केंद्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व की शिरकत ने यह उम्मीद जगाई कि फैसला तेलंगाना के पक्ष में होगा। क्या ऐसा हो पाएगा? यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि राज्य के बाकी हिस्से के पार्टी विधायक, सांसद और मंत्री राज्य के विभाजन के प्रस्ताव का विरोध करते रहे हैं। इस निर्णायक मौके पर रायलसीमा और तटीय आंध्र में कांग्रेस के भीतर विरोध के स्वर और तेज हो गए हैं। मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड््डी भी इस मुखालफत में शामिल हैं। पार्टी के कई नेताओं ने विद्रोह की चेतावनी भी दी है। क्या केंद्रीय नेतृत्व इसकी अनदेखी कर पाएगा? तेलंगाना को अलग राज्य बनाने की बात आते ही रायलसीमा और तटीय आंध्र में किसी हद तक प्रतिकूल प्रतिक्रिया होगी, यह सबको मालूम था। मगर कांग्रेस ने टालमटोल का रवैया न अपनाया होता तो वाइएस राजशेखर रेड््डी के रहते ही वह निर्णय पर पहुंच जाती और तब प्रदेश में अपने घर को संभालने की इतनी जद््दोजहद उसे न करनी पड़ती, न जगन मोहन रेड््डी का भय सता रहा होता। मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन और माकपा को छोड़ कर बाकी पार्टियां तेलंगाना के पक्ष में हैं। जगन मोहन ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं। यों पहले उन्होंने कहा था कि इस मामले को केंद्र के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। मगर रायलसीमा और तटीय आंध्र में वे कांग्रेस में दिख रहेअसंतोष का फायदा उठाने के लिए उलट रुख भी अपना लें तो हैरत की बात नहीं होगी।
बहरहाल, यह मुद््दा दो तकाजों से ताल्लुक रखता है। एक यह कि तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के पक्ष में


इस क्षेत्र में जन-समर्थन बराबर बढ़ता गया है। इसकी अनदेखी करना लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। दूसरे, तेलंगाना राज्य का गठन इस क्षेत्र के लोगों से कांग्रेस का वादा था। इस वादे को टालते रहने की वजह से ही आज कांग्रेस आंध्र प्रदेश में मुश्किलों से घिरी दिखती है। वर्ष 2004 का लोकसभा और विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ मिल कर लड़ा था। यह गठबंधन कांग्रेस के इसी वादे पर हुआ था कि अगर सत्ता में आने का मौका मिला तो तेलंगाना को राज्य बनाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। कांग्रेस को आंध्र की भी सत्ता हासिल हो गई और केंद्र की भी। मगर उसने टीआरएस से किए वादे को ठंडे बस्ते में डाल दिया। शायद इसलिए कि राज्य में सरकार चलाने के लिए वह टीआरएस के समर्थन पर निर्भर नहीं थी। नतीजतन, दोनों का गठजोड़ टूट गया। लेकिन टीआरएस नेता चंद्रशेखर राव ने इस मुद््दे को गरमाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अलग राज्य की मांग ने जनांदोलन की शक्ल ले ली और तेलंगाना क्षेत्र की कांग्रेस भी इसके पक्ष में हो गई। 
तेलंगाना की मंजूरी मिलने के आसार दिखते ही विदर्भ, बुंदेलखंड, बोडोलैंड, गोरखालैंड आदि अलग राज्य की कई और मांग उठने की संभावना जताई जा रही है। केंद्र के दुविधा में रहने की एक वजह यह भी रही होगी। लेकिन इस परेशानी या चुनौती को एक अवसर में भी बदला जा सकता है। बहुत बड़े राज्य न प्रशासकीय दृष्टि से उपयुक्त हैं न विकास के लिहाज से। दूसरी ओर, अधिकतर छोटे राज्यों ने कहीं तेजी से प्रगति की है। पंजाब से अलग कर बनाए गए हिमाचल प्रदेश और हरियाणा इसके उदाहरण हैं। लिहाजा, नई मांगों के औचित्य और व्यावहारिकता पर विचार करने के लिए नए राज्य पुनर्गठन आयोग की पहल की जा सकती है।

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