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बिजली के झटके PDF Print E-mail
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Monday, 29 July 2013 12:00

जनसत्ता 29 जुलाई, 2013: दिल्ली में बिजली की दरों में लगातार बढ़ोतरी पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन कभी संतोषजनक जवाब सामने नहीं आया। अब एक बार फिर डीइआरसी यानी दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग ने बिजली की कीमतों में पांच फीसद तक की बढ़ोतरी की घोषणा कर दी है। सही है कि ताजा बढ़ोतरी से बिजली की दरों में कोई बड़ा अंतर नहीं आएगा। डीइआरसी की ओर से दरें बढ़ाए जाने की घोषणा के बाद सरकार ने र्इंधन-सरचार्ज के तौर पर ली जाने वाली राशि न लेने का फैसला किया है। नतीजतन, बीस-तीस या पचास पैसे के इजाफे के अलावा दो सौ एक से चार सौ यूनिट तक बिजली खर्च करने की स्थिति में यह दर थोड़ी सस्ती भी हो जाएगी। अभी तक केवल दो सौ यूनिट तक प्रति महीने की खपत पर एक रुपए प्रति यूनिट की सबसिडी दी जाती थी। लेकिन सवाल है कि दरों में ताजा बढ़ोतरी का तर्क क्या है? सरकार को अपनी ओर से सबसिडी देने की घोषणा क्यों करनी पड़ी?
जाहिर है, यह पहले की कई बढ़ोतरी से पैदा हो रहे जन-असंतोष को थोड़ा कम करने, मध्यवर्ग को लुभाने और अगले विधानसभा चुनावों में विपक्ष के इसे मुद्दा बनाने के मद्देनजर सरकार ने यह कवायद की है। दिल्ली में बिजली का वितरण निजी कंपनियों को सौंपते हुए यह दावा किया गया था कि इससे बिजली की चोरी रुकेगी और पारेषण क्षति में कमी आएगी। नतीजतन, बिजली की दरें कम होंगी। लेकिन सच्चाई यह है कि तभी से बिजली की कीमतों में बेलगाम इजाफा होना शुरू हुआ। हालांकि कंपनियां घाटे का रोना रोती रही हैं, पर यह बहानेबाजी के अलावा कुछ नहीं है। तथ्य यह है कि दिल्ली के लोग दो से तीन गुना महंगी दर पर बिजली खरीद रहे


हैं और कंपनियां लगातार काफी मुनाफा बटोर रही हैं। अगर घाटे की दलील सही है तो सरकार को बिजली वितरण कंपनियों से सही ब्योरा पेश करने को कहना चाहिए था। साथ ही कैग से उनके हिसाब-किताब की जांच कराई जाती। लेकिन बार-बार मांग उठने के बावजूद शीला दीक्षित सरकार इसके लिए कभी राजी नहीं हुई। उलटे वह उन्हें सैकड़ों करोड़ रुपए के सहायता-पैकेज मुहैया कराना ज्यादा जरूरी समझती है। चुनाव को ध्यान में रख कर जो सबसिडी दी जाएगी, उसकी भरपाई आखिरकार दूसरे मदों में लोगों से वसूले गए करों से ही होगी। यह राहत है या सरकारी खजाने से कंपनियों पर मेहरबानी की तरकीब?
पिछले दिनों कई खुलासे हो चुके हैं कि बिजली की दरें किस तरह मनमाने ढंग से तय की जाती रही हैं। खासतौर पर आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने इस बारे में बहुत सारे तथ्य पेश करते हुए सरकार पर बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों के साथ मिलीभगत के आरोप लगाए थे। लेकिन इस तरह के आरोपों के बाद सरकार हमेशा चुप्पी साध लेती है और लोगों पर एक और बढ़ोतरी थोप दी जाती है। यह समझने के लिए अर्थशास्त्री होने की जरूरत नहीं है कि कोई भी परिवार अपनी आय के मुताबिक ही दूसरे खर्चों के साथ-साथ बिजली की खपत भी नियंत्रित करता है। लेकिन करीब पांच महीने पहले मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्लीवासियों को महंगी बिजली से बचने के लिए खपत में कमी करने की सलाह दे डाली थी। लेकिन कंपनियों को कोई हिदायत देने की जरूरत उन्होंने कभी नहीं समझी। जहां जायज शिकायतों पर शासन का यह रवैया हो, वहां उम्मीद भी क्या की जा सकती है!

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