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विरोध और विवेक PDF Print E-mail
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Friday, 26 July 2013 10:24

जनसत्ता 26 जुलाई, 2013: गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को वीजा न दिए जाने संबंधी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को लिखे पत्र पर विवाद स्वाभाविक है। अमेरिका तक में हैरानी जताई गई है कि भारतीय सांसदों ने अपने यहां के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप की अपील अमेरिकी सरकार से क्यों की। एक निर्दलीय सांसद ने मोदी को वीजा न देने संबंधी अपील पर विभिन्न पार्टियों के सांसदों से हस्ताक्षर कराया था, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को फैक्स के जरिए भेज दिया गया। अब कुछ सांसदों का कहना है कि उन्होंने उस पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया था। इससे भाजपा को कांग्रेस पर निशाना साधने का मौका हाथ लग गया है। इस प्रकरण को लेकर सांसदों की समझ और हल्की राजनीति करने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं। किसी व्यक्ति को वीजा देना या न देना संबंधित देश का फैसला हो सकता है, उसे राजनीति का विषय क्यों बनाया जाना चाहिए। गौरतलब है कि गुजरात दंगों के बाद जब अमेरिका ने मोदी को अपने यहां आने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद उसका विरोध किया था। क्योंकि मोदी पर दंगों के दाग जरूर गहरे थे, मगर वे संवैधानिक पद का निर्वाह कर रहे थे और फिर उन पर लगे आरोपों के लिए कोई दूसरा देश सजा मुकर्रर क्यों करे। मगर वह बात हमारे सांसदों को याद नहीं रही।
पत्र पर पचास से ऊपर सांसदों के हस्ताक्षर हैं। उनमें से करीब दस ने कहा है कि फर्जी तरीके से उनके दस्तखत का इस्तेमाल किया गया है। इसका अर्थ है कि बाकी सांसदों ने जानते-बूझते हस्ताक्षर किए। जिन्होंने इनकार किया है उनमें से भी कई का कहना है कि उन्हें याद नहीं कि हस्ताक्षर किया या नहीं। तो क्या यह माना जाना चाहिए कि हमारे सांसद या तो संवेदनशील मसलों पर भी लापरवाह बने रहते हैं या


फिर उन पर मोदी विरोध की ऐसी धुन सवार है कि वे उनके खिलाफ उठाए गए किसी भी कदम पर कोई तर्क नहीं करना चाहते। यह नहीं माना जा सकता कि पत्र का मजमून पढ़े या उसके बारे में जाने बगैर सबने उस पर हस्ताक्षर कर दिया होगा। तो क्या उनमें से किसी को नहीं सूझा कि ऐसा विरोध दूसरे देश के सामने अपनी दयनीयता जाहिर करना है। फिर ऐसा विरोध करके उन्हें किस तरह राजनीतिक लाभ मिल सकता है। मोदी अमेरिका जाएं या न जाएं इससे किसी पार्टी की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा। यों भी अमेरिका के अलावा कई यूरोपीय देशों ने मोदी को वीजा न देने का फैसला किया हुआ है। क्या इससे किसी दल को लाभ मिला! फिर अचानक यह हड़बड़ी क्यों!
पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में वाम दलों सहित विभिन्न पार्टियों के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम हैं। इनमें से कई नेता अपने यहां अमेरिकी हस्तक्षेप का खुला विरोध करते रहे हैं। उन्होंने भी इस मामले को हल्का कैसे माना, समझना मुश्किल है। अगर सचमुच सांसदों को धोखे में रख कर उनसे हस्ताक्षर कराए गए या पत्र पर उनकी नकल चिपकाई गई तो यह अक्षम्य होना चाहिए। क्योंकि यह केवल मोदी के विरोध का नहीं, देश के सम्मान से जुड़ा मामला है। सांसदों को अगर किसी नीतिगत मसले पर विचार और फैसला करना है तो संसद के पटल पर करना चाहिए न कि एक स्वतंत्र समूह के रूप में। अगर विचारधारा या फिर राजनीतिक मुद्दे के तौर पर मोदी का विरोध करना है तो देश के भीतर लोकतांत्रिक तरीके से ही किया जाना चाहिए, अमेरिका को पंच बना कर नहीं।

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