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मुसीबत की बरसात PDF Print E-mail
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Friday, 26 July 2013 10:22

जनसत्ता 26 जुलाई, 2013: बरसात के मौसम में दिल्ली की सड़कों पर और गली-मुहल्लों में जलजमाव नई बात नहीं है। मगर विभिन्न सरकारी महकमों को इससे सबक लेकर कोई कारगर उपाय करना जरूरी नहीं लगता। जल निकासी के उचित इंतजाम के प्रति लापरवाही का नतीजा है कि इस बार सामान्य बरसात के बाद न केवल दिल्ली की सड़कों पर, बल्कि कई अतिविशिष्ट और संभ्रांत माने जाने वाले इलाकों में भी पानी भर गया। ऐसे में बुधवार को एक स्वयंसेवी संगठन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने उचित ही दिल्ली सरकार, नगर निगम और अन्य संबंधित निकायों को फटकार लगाते हुए कहा कि जब जजों के घरों में और विशिष्ट इलाकों का यह हाल है तो दूसरे इलाकों की स्थिति कितनी भयानक होगी। अदालत ने अगले एक हफ्ते में राजधानी के सभी नालों की सफाई का आदेश दिया है, लेकिन इस पर कितना अमल हो पाएगा, देखने की बात है। दूसरी ओर, सरकारी रवैए का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि खुद को मुस्तैद साबित करने के लिए साफ किए गए एक नाले की ही अलग-अलग कोणों से खींची गई तस्वीर अदालत में पेश कर दी गई। यह अपने बचाव में झूठ का सहारा लेकर अदालत की आंख में धूल झोंकने जैसा है। हालांकि किसी भी सरकार या प्रशासन के लिए यह शर्मिंदगी का विषय होना चाहिए कि बरसात की वजह से सड़कों पर जलजमाव जैसी समस्या पर अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ रहा हो। मगर यह समझना मुश्किल है कि अपनी जिम्मेदारी तय कर उस पर ईमानदारी से अमल करने के बजाय दिल्ली सरकार, नगर निगम और दूसरे महकमे एक दूसरे पर दोषारोपण करने में क्यों लगे हैं। जहां दिल्ली के तीनों नगर निगमों ने जलभराव के लिए लोक निर्माण विभाग पर निशाना साधा, वहीं सरकार ने नगर निगमों पर नालों की सफाई


में सहयोग न करने का आरोप लगाया। अगर यह सही भी है तो सवाल है कि सरकार और संबंधित महकमों के बीच तालमेल के अभाव का खमियाजा आम नागरिक क्यों भुगतें?
विडंबना है कि मुख्यमंत्री को जहां समस्या से निपटने के उचित इंतजामों को लेकर सक्रियता दिखानी चाहिए, वे लोगों को सलाह दे रही हैं कि भगवान से मनाओ कि बरसात कम हो। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने के लिए सरकार किस हद तक जा सकती है। बारिश के मौसम में कई बार निचले इलाकों में बाढ़ जैसी स्थिति क्या केवल ज्यादा बरसात की वजह से होती है? अगर सहज रूप से पानी निकलने का उचित इंतजाम हो तो शायद यह नौबत न आए। यह मूल रूप से जल निकासी की उचित व्यवस्था न होने या फिर नालों की समय पर सफाई न हो पाने का नतीजा है। सही है कि दिल्ली के ज्यादातर इलाकों में अनियोजित तरीके से विकास हुआ है। लेकिन इसके लिए भी आखिरी तौर पर कौन जिम्मेदार है? जरूरत के मुताबिक ज्यादा सुव्यवस्थित इंतजाम किए जाने चाहिए। लेकिन सच यह है कि अगर जल निकासी की पुरानी व्यवस्था की ही सफाई और उसके रखरखाव का काम ठीक से हो तो समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। लेकिन सरकार के नगर निगम और दूसरे संबंधित महकमों के पास नालों की सफाई या पानी निकलने की समुचित व्यवस्था करने की जिम्मेदारी है, वे शायद सिर्फ आपात स्थिति में या अदालतों की फटकार के बाद ही थोड़ी हरकत में आते हैं।

 

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