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आंकड़ों में गरीबी PDF Print E-mail
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Thursday, 25 July 2013 12:45

जनसत्ता 25 जुलाई, 2013: मंगलवार को योजना आयोग ने देश में गरीबों की तादाद के बारे में जो आंकड़े जारी किए, वे सचमुच उत्साहजनक होते, अगर इन्हें तर्कसंगत तरीके से हासिल किया गया होता। लेकिन ये आंकड़े उसी पुराने मापदंड का नतीजा हैं जिसे खारिज किया जा चुका है। आयोग के ताजा आकलन के मुताबिक देश की आबादी में गरीबी रेखा के नीचे के लोगों का अनुुपात घट कर बाईस फीसद रह गया है। वर्ष 2004-05 में भारत की जनसंख्या में बीपीएल का हिस्सा 37.2 फीसद था। तब से सात साल में बीपीएल आबादी में पंद्रह फीसद की कमी आई है, यानी औसतन सालाना दो फीसद से कुछ अधिक की दर से। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था और इसका हवाला देते हुए योजना आयोग गदगद है। लेकिन यह चमत्कारिक उपलब्धि आंकड़ों की बाजीगरी के अलावा कुछ नहीं है। आयोग ने पहले बताया था कि 2004-05 से पांच साल के दौरान बीपीएल आबादी में डेढ़ फीसद सालाना की गति से कमी दर्ज हुई और देश की जनसंख्या में बीपीएल अनुपात 2009-10 में करीब तीस फीसद पर आ गया। मगर यह आकलन सामने आने के साथ यह खुलासा भी हुआ कि गरीबी रेखा गांव में रोजाना छब्बीस रुपए और शहर में बत्तीस रुपए प्रतिव्यक्ति व्यय के आधार पर तय की गई है। हालांकि गरीबी को मापने का बेहद बेतुका मापंदड तमाम अर्थशास्त्रियों के एतराज के बावजूद लंबे समय से चला आ रहा था, मगर सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान लेने के कारण शायद पहली बार यह बड़े विवाद का विषय बना।
देश भर में हुई तीखी प्रतिक्रिया और न्यायालय के रुख के कारण योजना आयोग और सरकार को उस पैमाने को रद््द घोषित करना पड़ा। फिर नए सिरे से गरीबी की परिभाषा तय करने के लिए प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी रंगराजन की अगुआई में समिति गठित की गई। लेकिन समिति की रिपोर्ट का इंतजार न करके योजना आयोग


ने नए आंकड़े जारी कर दिए, जिसका कोई औचित्य नहीं है। इससे सिर्फ आयोग और सरकार की गरीबी घटने के बारे में बढ़-चढ़ कर दावे करने की बेचैनी का पता चलता है। क्या अगले आम चुनाव को ध्यान में रख कर यह आकलन पेश किया गया है? जो हो, नए आकलन में खारिज कर दिए गए मापंदड से भी ज्यादा चालाकी दिखती है। वर्ष 2011 में योजना आयोग ने सर्वोच्च अदालत को बताया था कि गरीबी रेखा का आधार गांव में छब्बीस रुपए और शहर में बत्तीस रुपए रोजाना प्रतिव्यक्ति का खर्च है। नए आकलन में आयोग ने इस पैमाने में एक-एक रुपए की बढ़ोतरी की है। यानी देहात में प्रतिदिन सत्ताईस रुपए और शहर में तैंतीस रुपए से कुछ भी ज्यादा खर्च करने वाला गरीब नहीं है।
अगर महंगाई को हिसाब में लें तो आयोग ने पहले के मापदंड को भी और कमजोर बना दिया है। क्या दो साल में एक गरीब व्यक्ति पर महीने में महज तीस रुपए अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ा है? अंतरराष्ट्रीय पैमाने के मुताबिक रोज सवा डॉलर पाने वाले को गरीब और एक डॉलर पाने वाले को अति गरीब की श्रेणी में माना जाता है। हमारे नीति नियंता कुछ सेवाओं को विश्व-स्तरीय बनाने का दम भरते रहते हैं। मगर गरीबी को परिभाषित करने के मामले में वे कभी भी अंतरराष्ट्रीय मापदंड लागू करने को राजी नहीं होते। इसलिए कि हकीकत कुछ भी हो, वे गरीबी में तेजी से कमी आने का दावा करते रहना चाहते हैं। असलियत को नजरअंदाज करने के दो खास कारण दिखते हैं। एक यह कि बीपीएल का दायरा कम दिखा कर सबसिडी और सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं में कटौती की जा सके। दूसरे, यह साबित किया जाता रहे कि मौजूदा आर्थिक नीतियों के काफी अच्छे नतीजे आ रहे हैं। लेकिन यह गरीबी उन्मूलन की नीति है या आंकड़ों का खेल?

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