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बीमारी की खुराक PDF Print E-mail
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Thursday, 25 July 2013 12:44

जनसत्ता 25 जुलाई, 2013: अगर योजनाओं के संचालन पर ठीक से ध्यान न दिया जाए तो वे जल्दी ही बेअसर साबित हो जाती हैं। हरियाणा में बच्चों की सेहत सुधारने के मकसद से आयरन की गोलियों के मुफ्त वितरण की योजना का अंजाम भी कुछ ऐसा ही हो सकता है।

स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य संबंधी अध्ययन से जाहिर हुआ था कि ज्यादातर बच्चों में खून की कमी है। इसे दूर करने के लिए सभी स्कूलों में आयरन की गोलियों का वितरण शुरू किया गया। इसी के तहत मंगलवार को भी बच्चों को गोलियां खिलाई गर्इं। सैकड़ों बच्चों ने पेट में दर्द, उलटी और चक्कर आने की शिकायत की। उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भरती कराना पड़ा। गनीमत है, किसी बच्चे पर इसका गंभीर दुष्प्रभाव नहीं देखा गया। बाद में स्वास्थ्य विभाग ने दावा किया कि आयरन की गोलियों की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं थी, बच्चों की शिकायतों की वजह मनोवैज्ञानिक थी। मगर यह समझना मुश्किल है कि हिसार, जींद, सोनीपत, गुड़गांव, फरीदाबाद आदि राज्य के अनेक जिलों में करीब नौ सौ बच्चों पर इन गोलियों का मनोवैज्ञानिक असर एक साथ कैसे पड़ गया? इस घटना से अभिभावक इस कदर सशंकित हो उठे हैं कि उनमें से बहुतों ने अपने बच्चों को स्कूलों में दी जाने वाली गोलियां खाने से मना कर दिया है। छपरा में स्कूली मध्याह्न भोजन खाने के बाद तेईस बच्चों के दम तोड़ देने और फिर देश के विभिन्न हिस्सों से मिड-डे मील से बच्चों के बीमार पड़ने और एक-दो मौत भी हो जाने की खबरों से वे भयभीत हुए होंगे। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को मनोवैज्ञानिक असर वाला तर्क देना सुविधाजनक लगा होगा। उसे यह डर भी रहा होगा कि कोई और कारण सामने आने से लोगों की नाराजगी बेकाबू


हो सकती है। पर यह छिपी बात नहीं है कि दवाओं की सरकारी खरीद में अनियमितताएं होती हैं। उनकी गुणवत्ता की जांच-परख में कोताही की जाती है। पिछले दिनों दिल्ली में भी आयरन की गोलियां लेने के बाद कुछ बच्चों के बीमार पड़ने की खबर आई थी। दवाओं के दुष्प्रभाव की शिकायतें अनेक मौकों पर मिलती रही हैं। लिहाजा, मनोवैज्ञानिक प्रभाव की दलील टिकाऊ नहीं हो सकती।
भारत में कुपोषण की समस्या बहुत व्यापक है। इस बारे में हुए अनेक अध्ययन हुए हैं और उनके मुताबिक देश के चालीस से पैंतालीस फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। उचित पोषण न मिल पाने के कारण उनमें शारीरिक और मानसिक दुर्बलता स्थायी रूप ले लेती है। उनमें हड््िडयों की कमजोरी, याददाश्त क्षीण होने, पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में मन न लगने, चिड़चिड़ापन आदि परेशानियां आम बात हैं। बाल अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में भारत भी शामिल है। इस घोषणापत्र के मुताबिक बच्चों के स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों की रक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। इसी के तहत मध्याह्न भोजन, समय-समय पर बच्चों की स्वास्थ्य-जांच और रोग निवारक गोलियों के मुफ्त वितरण आदि की योजनाएं शुरू की गर्इं। मगर ये योजनाएं काफी हद तक भ्रष्टाचार और कुप्रबंध की शिकार हैं। इसी का नतीजा है कि मध्याह्न भोजन या स्वास्थ्यवर्धक दवाएं खाने से बच्चों के बीमार पड़ने की शिकायतें जब-तब आती रहती हैं। अगर इन योजनाओं को लेकर मुस्तैदी नहीं बरती गई, तो इनकी स्वीकार्यता ही खतरे में पड़ जाएगी।

 

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